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ताज़ा रचनाएँ (Latest Stories)

सपनों का नया सवेरा

सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से अंदर आई, तो राहुल की आँखें खुल गईं। आज उसका इंटरव्यू था, जिसके लिए उसने महीनों से रात-दिन एक कर दिए थे। उसके पिता की साइकिल की दुकान से लेकर इस शहर के बड़े दफ्तर तक का सफर आसान नहीं था। अचानक रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गई और उसे लगा कि आज सब खत्म हो गया है। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और दौड़कर समय पर दफ्तर पहुँच गया। जब इंटरव्यू के बाद उसे चयन का पत्र मिला, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और हर नई सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है।
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अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।
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बचपन की गुल्लक और पुराना कर्ज

दुकान के कोने में धूल फांक रही पुरानी लकड़ी की गुल्लक देखकर मदन को अपने बचपन के वे दिन याद आ गए जब उसने एक-एक सिक्का जोड़कर अपनी बहन की शादी के लिए पैसे बचाए थे। आज मदन खुद एक बड़े बैंक का मैनेजर था, जिसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह अंदर से बहुत अकेला हो चुका था। उसने जब उस गुल्लक को खोला, तो उसके अंदर से बचपन की एक पर्ची निकली जिस पर लिखा था- मेरा सबसे बड़ा धन मेरा परिवार है। इस एक वाक्य ने उसकी आंखों से अहंकार का पर्दा हटा दिया। उसी रात उसने अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकाला और फोन उठाकर अपने बिछड़े हुए भाई को गले मिलने के लिए आमंत्रित किया।
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अंधेरे में जलती उम्मीद की लौ

रोहित की जिंदगी में जब से उसकी आंखों की रोशनी कम हुई थी, तब तक उसके सारे सपने मानो दम तोड़ चुके थे। वह एक प्रतिभाशाली चित्रकार था और अब कैनवास पर रंग बिखेरना उसके लिए असंभव सा हो गया था। निराशा के इस काले साये में उसकी छोटी बहन नीना ने उसका हाथ थामा और उसे टेक्सचर पेंटिंग की नई दुनिया से परिचित कराया। शुरुआत में रोहित का गुस्सा और हताशा फूट पड़ती थी, लेकिन नीना ने हार नहीं मानी। एक दिन अंधेरे कमरे में उसने रंगों को टटोलकर एक ऐसी अनोखी तस्वीर बनाई जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया। उस दिन रोहित को अहसास हुआ कि दृष्टि केवल आंखों से नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों और मजबूत इच्छाशक्ति से होती है।
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घर वापसी का अनचाहा सफर

सालों बाद जब सोहन अपने पैतृक गांव की धूल भरी पगडंडी पर उतरा, तो उसके कदम खुद-ब-खुद उस टूटे हुए घर की तरफ बढ़ गए जिसे वह कभी छोड़कर भागा था। शहर की चमक-धमक में उसने सब कुछ पा लिया था, सिवाय उस सुकून के जो उसे अपनी माँ के आंचल में मिलता था। जब उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो दिल जोर से धड़क रहा था। अंदर से बूढ़े हाथों ने दरवाजा खोला और सामने उसकी माँ खड़ी थी। बिना किसी उलाहना या शिकायत के, माँ ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। उस एक आलिगन में शहर की सारी थकान और वर्षों का अकेलापन पल भर में काफूर हो गया। सोहन को समझ आ गया कि सफलता की ऊंची इमारतें उस मिट्टी के घर के आगे बिल्कुल फीकी हैं जहाँ माँ का प्यार बसता है।
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रात का पहरा और जलता हुआ दिया

अंधेरी रात चारों तरफ अपनी चादर फैला चुकी थी और गांव की सूनी सड़क पर केवल एक ही घर की खिड़की रोशन थी। अंदर एक बूढ़ी मां अपनी पलकें बिछाए दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी थीं। शहर गए उनके बेटे को लौटेत-लौटते आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी और आंधी-तूफान के कारण फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह ठप था। मां के मन में अजीबोगरीब आशंकाएं घर कर रही थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दीया देहरी से बुझने नहीं दिया। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और बेटे को सीने से लगाते ही मां की आंखों से राहत के आंसू छलक पड़े।
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चाय के कप और अनकही बातें

ऑफिस की व्यस्त दिनचर्या से वक्त निकालकर हम दोनों उस नुक्कड़ की पुरानी चाय की दुकान पर बैठे थे। कई सालों बाद हुई इस मुलाकात में शुरुआत में शब्दों की भारी कमी महसूस हो रही थी। कुल्हड़ में चाय की भाप उठ रही थी और दोनों तरफ एक अजीब सा संकोच पसरा हुआ था। फिर अचानक किसी पुरानी बात पर एक हल्की सी हंसी गूंजी और सारी दूरियां एक पल में पिघल गईं। वक्त ने हमारे चेहरे पर भले ही लकीरें खींच दी हों, लेकिन दिलों का रिश्ता आज भी पहले जैसा ही गहरा था। चाय का आखिरी घूंट लेते हुए हमने वादा किया कि अब इतनी लंबी खामोशी फिर कभी नहीं होगी।
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कागज की नाव और उम्मीद का समंदर

बरसात की पहली फुहार के साथ ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में कागज की नावें तैराने लगे थे। नन्हें हाथों द्वारा बनाई गई वे रंगबिरंगी नावें पानी के तेज बहाव के साथ आगे बढ़ रही थीं। एक कोने में खड़े होकर मैं अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा जब हर छोटी सी जीत पर दिल खुशी से झूम उठता था। तभी एक छोटी सी नाव भंवर में फंसकर डूबने लगी, जिसे देखकर मेरा दिल बैठ गया। लेकिन अगले ही पल पानी के एक शांत बहाव ने उसे फिर से उबार लिया। जीवन की कसौटी भी कुछ ऐसी ही है, जहां हार के डर के बाद ही असली जीत का रास्ता दिखाई देता है।
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रेडियो की खड़खड़ाहट और पुराना संगीत

पुरानी लकड़ी की अलमारी के पीछे छुपा हुआ वह ट्रांजिस्टर रेडियो सालों बाद आज अचानक मिल गया था। उसके एंटीना पर धूल की एक मोटी परत जमी थी और बैटरी का डिब्बा पूरी तरह जंग खा चुका था। जैसे ही मैंने उसे साफ करके चालू किया, एक जानी-पहचानी धुन कमरे में गूंज उठी। यह वही संगीत था जिसे सुनकर हम दोनों ने कभी भविष्य के सुनहरे सपने बुने थे। वक्त ने दूरियां बढ़ा दीं और रास्ते जुदा हो गए, लेकिन उस सुरीली आवाज ने अतीत के सारे पन्ने पलटा दिए। अब हवा में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक मीठी सी खामोशी थी जो दिल को सुकून दे रही थी।
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दीवार पर टंगी तस्वीर

घर के ड्राइंग रूम की दीवार पर बरसों से धूल फांक रही उस तस्वीर को आज मैंने साफ करने की सोची। वह तस्वीर मेरे कॉलेज के दिनों के सबसे पक्के दोस्त की थी, जिससे किसी छोटी सी गलतफहमी के कारण सालों पहले अनबन हो गई थी। तस्वीर पोछते हुए उसकी आंखें जैसे मुझसे कुछ कह रही थीं। अहंकार और जिद के इन लंबे सालों में हमने न जाने कितनी खूबसूरत शामें गंवा दी थीं। मैंने बिना एक पल गंवाए फोन उठाया और उसका नंबर डायल किया। घंटी बजी और दूसरी तरफ से वही जाना-पहचाना स्वर गूंजा। पुरानी कड़वाहट एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई और सिर्फ दोनों की पुरानी हँसी बाकी रह गई।
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बगीचे का आखिरी फूल

पिताजी के जाने के बाद उनके द्वारा लगाए गए बगीचे की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। सारे पौधे सूख चुके थे और मिट्टी अपनी नमी खो चुकी थी। एक दिन अचानक मेरी नजर कोने में खिले एक छोटे से पीले फूल पर पड़ी, जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी पूरी ताकत से खिला हुआ था। उसे देखकर मुझे पिताजी की वह सीख याद आ गई जो वे अक्सर दिया करते थे कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कभी हार मत मानो। मैंने तुरंत पानी उठाया और सूखे पौधों की सिंचाइ शुरू कर दी। वह आखिरी फूल मेरे लिए एक संदेश बन गया, जिसने मुझे जीवन की हर चुनौती का डटकर सामना करने की नई ऊर्जा और हौसला दे दिया।
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पुरानी छत और नए सपने

शहर की चकाचौंध से दूर जब मैं अपने पुस्तैनी घर लौटा, तो छत की ईंटें मुझे अपनी दास्तान सुनाने लगीं। यहीं बैठकर कभी मैंने खुले आसमान में ऊंचे उड़ने के सपने देखे थे। वक्त के साथ जिम्मेदारियों के बोझ ने उन सपनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। आज जब मैंने धूल जमी छत पर कदम रखा, तो बचपन की पतंगबाजी की यादें ताजा हो गईं। मेरे बेटे ने मेरे हाथ में एक कच्ची डोर थमाई और खुद पतंग आसमान में लहराने लगा। उस उड़ती हुई पतंग को देखकर मुझे एहसास हुआ कि सपने कभी मरते नहीं, बस उनका रंग बदल जाता है। पुरानी छत ने मुझे मेरे बचपन से दोबारा मिला दिया और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई।
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