बगीचे का आखिरी फूल

बगीचे का आखिरी फूल

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पिताजी के जाने के बाद उनके द्वारा लगाए गए बगीचे की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। सारे पौधे सूख चुके थे और मिट्टी अपनी नमी खो चुकी थी। एक दिन अचानक मेरी नजर कोने में खिले एक छोटे से पीले फूल पर पड़ी, जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी पूरी ताकत से खिला हुआ था। उसे देखकर मुझे पिताजी की वह सीख याद आ गई जो वे अक्सर दिया करते थे कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कभी हार मत मानो। मैंने तुरंत पानी उठाया और सूखे पौधों की सिंचाइ शुरू कर दी। वह आखिरी फूल मेरे लिए एक संदेश बन गया, जिसने मुझे जीवन की हर चुनौती का डटकर सामना करने की नई ऊर्जा और हौसला दे दिया।
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अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।