पहाड़ की ढलान पर नन्हा पौधा
हिमालय की ऊँची और ठंडी पहाड़ियों के बीच एक बहुत बड़ा पत्थर था। उस कठोर पत्थर की एक छोटी सी दरार में जाने कहाँ से एक नन्हे पौधे का बीज आ गिरा था। आसपास की मिट्टी नाममात्र की थी और सर्द हवाएं लगातार उस पर थपेड़े मार रही थीं। बड़े-बड़े पेड़ों ने उस पौधे को देखकर कहा कि यहाँ तुम्हारा जीवित रहना असंभव है, क्योंकि न तो तुम्हें पर्याप्त धूप मिलेगी और न ही पानी। लेकिन उस नन्हे बीज ने हार मानने के बजाय चुपचाप अपनी जड़ें उस पत्थर की गहराई में उतरनी शुरू कर दीं। उसने अपनी छोटी सी पत्तियों से हर बूंद ओस को सहेजना सीखा। साल बीतते गए, मौसम कई बार बदले, आंधियाँ आईं और बर्फबारी भी हुई। धीरे-धीरे उस पौधे की जड़ें इतनी मजबूत हो गईं कि उन्होंने उस बड़े पत्थर को भीतर से थाम लिया। कुछ सालों बाद वही नन्हा पौधा एक मजबूत और सुंदर वृक्ष बन गया, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। उसने साबित कर दिया कि जीवन की परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि आगे बढ़ने की सच्ची लगन हो, तो कोई भी रुकावट आपको रोक नहीं सकती है।
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