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Shayari, quotes, wishes and stories worth keeping.

बचपन की वह नीली साइकिल

गरीबी के दिनों में सोहन का एकमात्र सपना एक नीली साइकिल खरीदने का था। उसके पिता ने दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे पैसे जोड़े और उसके जन्मदिन पर उसे वही साइकिल तोहफे में दी। सोहन की खुशी का ठिकाना नहीं था, उसने उस साइकिल को हमेशा अपनी जान से ज्यादा संभाला। वक्त बदला, सोहन बड़ा हुआ और शहर की एक नामी कंपनी में अफसर बन गया। आज उसके पास बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन जब भी वह पुरानी साइकिल को गैराज में देखता है, उसे अपने पिता के माथे का वह पसीना याद आ जाता है जो उन्होंने उसकी खुशी के लिए बहाया था। भौतिक सुखों से परे उस साइकिल में उसके पिता का आशीर्वाद और त्याग बसता था।

माँ के हाथ की आखिरी चाय

नौकरी के सिलसिले में महानगर आए रोहन को हमेशा से अपनी व्यस्त जीवनशैली पर गर्व था। माँ जब भी गांव से फोन करतीं, वह काम का बहाना बनाकर बात टाल देता था। एक दिन अचानक माँ का स्वास्थ्य बिगड़ने का समाचार मिला और वह तुरंत गांव के लिए रवाना हुआ। जब वह घर पहुंचा, तो माँ की सांसें थम चुकी थीं, लेकिन उनके पलंग के पास चायदानी और एक कप गरम चाय रखी थी, जिसे उन्होंने शायद बेटे के आने की आस में बनाया था। उस ठंडी हो चुकी चाय को देखकर रोहन का अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। उसे समझ आया कि सफलता की दौड़ में वह अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो चुका था।

पुरानी डायरी और अधूरा खत

बरसों बाद जब अमित ने अपने पुराने बक्से को टटोला, तो उसे कॉलेज के दिनों की एक भूली-बिसरी डायरी मिली। पन्ने पलटते ही एक सूखा हुआ गुलाब और कागज का मुड़ा हुआ टुकड़ा नीचे गिर गया। वह किसी और का नहीं, बल्कि उसकी बचपन की मित्र का लिखा हुआ अंतिम संदेश था, जिसे वह कभी पढ़ नहीं पाया था। उस वक्त की गलतफहमी ने दोनों को हमेशा के लिए अलग कर दिया था। आज उम्र के इस पड़ाव पर जब अतीत की परछाइयां धुंधली हो चुकी हैं, उस खत के हर एक शब्द ने अमित की आंखें नम कर दीं। उसने महसूस किया कि वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, सिवाय उन अनकहे एहसासों के जो दिल के किसी कोने में आज भी जिंदा रहते हैं।

काली झील का साया

शहर से दूर पहाड़ों के बीच स्थित काली झील का पानी हमेशा शांत और काला रहता था, जिसके पास जाने से लोग डरते थे। सोहन को फोटोग्राफी का शौक था और वह एक शाम खूबसूरत तस्वीरें लेने के लिए उसी झील के किनारे पहुंच गया। कैमरे के लेंस से देखते हुए उसे पानी की सतह पर एक सुंदर स्त्री तैरती हुई दिखाई दी, जो उसे अपनी ओर बुला रही थी। सोहन सम्मोहित सा झील की तरफ बढ़ता चला गया, तभी उसे एहसास हुआ कि पानी में केवल उसका अपना ही प्रतिबिंब नहीं, बल्कि कोई दूसरा साया भी है। जैसे ही उसने पीछे मुड़ना चाहा, पानी के भीतर से कई ठंडे हाथों ने उसके पैरों को जकड़ लिया। वह मदद के लिए चिल्लाना चाहता था, लेकिन उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली और वह धीरे-धीरे काले पानी में समाता चला गया। सुबह उसका कैमरा झील के किनारे पर लावारिस मिला, लेकिन सोहन का कोई अता-पता नहीं था।

लाल दरवाजे वाला कमरा

गांव के एक पुराने घर में हमेशा बंद रहने वाले लाल दरवाजे के पीछे से हर रात पायल की छनक सुनाई देती थी। रमित को इस बात की बड़ी उत्सुकता थी कि उस कमरे के अंदर आखिर क्या है। एक अमावस्या की रात, जब पूरा घर गहरी नींद में था, रमित ने हिम्मत जुटाई और धीरे से उस लाल दरवाजे की कुंडी खोल दी। कमरे के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था और बीचों-बीच एक पुरानी खाट पर धूल जमी थी। तभी अचानक खिड़की से आई ठंडी हवा ने दरवाजा बंद कर दिया और कमरे का तापमान शून्य तक गिर गया। रमित ने मुड़कर देखा तो कोने में रखी अलमारी का शीशा धुंधला हो गया था और उस पर किसी छोटे बच्चे के हाथ के छाप उभर रहे थे। उसने तुरंत भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजे का हैंडल अंदर से लॉक हो चुका था और पीछे से एक ठंडी फुसफुसाहट सुनाई दी, अब तुम कभी बाहर नहीं जा सकते।

आधी रात का आईना

नताशा ने अपने नए घर के बेडरूम में एक पुराना एंटीक आईना लगाया था, जिसकी फ्रेम पर बारीक नक्काशी की गई थी। वह अक्सर रात को सोने से पहले उस आईने में अपने बाल संवारती थी। एक रात, जब उसने घड़ी में बारह बजते देखे, तो उसने महसूस किया कि आईने में उसका अक्स उसकी नकल नहीं कर रहा है। उसका अक्स अपनी जगह पर स्थिर था, जबकि नताशा बिस्तर पर पीछे हट रही थी। अचानक आईने के भीतर से एक ठंडी हवा का झोंका आया और कांच पर धुंध जम गई। उस धुंध पर किसी ने अपनी उंगली से लिखा - अब मैं बाहर आ रही हूं। नताशा ने चीखने की कोशिश की लेकिन उसकी आवाज गले में ही घुट गई और चारों ओर घना अंधेरा छा गया।

रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।

जंगलों के बीच का पुराना कुआं

गांव के छोर पर स्थित एक सूखे कुएं के बारे में बुजुर्गों का कहना था कि वहां शाम के बाद मत जाना। शहर से आया आलोक इस अंधविश्वास को दूर करने की चुनौती मान बैठा। एक अमावस्या की रात वह उस कुएं के पास पहुंचा और टॉर्च की रोशनी अंदर डाली। कुएं की गहराई से एक मीठी और जानी-पहचानी आवाज ने उसे पुकारा, आओ मुझे बाहर निकालो। जैसे ही वह कुएं की मुंडेर के और करीब गया, उसे एहसास हुआ कि वह आवाज उसकी अपनी ही थी, जो किसी मरे हुए गले से निकल रही थी। वह डर के मारे पीछे हटा और गांव की ओर भागा। आज भी वह उस रात को याद करके कांप उठता है, क्योंकि उसने खुद अपनी लाश कुएं के भीतर तैरते हुए देखी थी।

सुदूर पहाड़ियों का अकेला केबिन

पहाड़ियों के उस ठंडे और कोहरे से ढके इलाके में रोहन ने एक अकेला लकड़ी का केबिन किराए पर लिया था। वह अपनी किताब पूरी करने की शांति चाहता था। पहले दो दिन सब ठीक रहा, लेकिन तीसरे दिन से अजीब घटनाएं होने लगीं। रात को रसोईघर से बर्तन गिरने की आवाजें आतीं, और जब वह देखने जाता, तो वहां कोई नहीं होता। मोड़ तब आया जब उसने अपने कमरे के बंद शीशे पर खुद को नहीं, बल्कि एक धुंधले चेहरे को अपने पीछे खड़े देखा। उसने तुरंत भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजे बाहर से बंद थे। सुबह जब सूरज निकला, तो केबिन बिल्कुल शांत था, और उसके लैपटॉप पर केवल एक वाक्य लिखा था - तुम कभी अकेले नहीं थे।

गुमशुदा डायरी का पन्ना

लाइब्रेरी के सबसे अंधेरे कोने में प्रिया को धूल से सनी एक डायरी मिली, जिसका पन्ना खोलने पर केवल एक ही वाक्य लिखा था - आज रात तुम्हारा आखिरी दिन है। उसने हँसकर उसे मजाक समझा और डायरी अपने साथ घर ले आई। रात को जब उसने पढ़ाई करते समय उस डायरी को दोबारा खोला, तो उसने देखा कि लिखा हुआ वाक्य बदल चुका था और अब वहाँ लिखा था - तुम अब बिस्तर के नीचे हो। डर के मारे उसका दिल जोर से धड़कने लगा, और तभी बिस्तर के नीचे से किसी ठंडे हाथ ने उसके पैर को मजबूती से पकड़ लिया।

पुरानी हवेली की परछाइयां

गांव के छोर पर बनी खंडहर नुमा हवेली में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था, लेकिन कबीर ने एक शर्त के तहत वहां जाने का फैसला किया। उसने हाथ में टॉर्च ली और लकड़ी के चरमराते दरवाजे को धक्का देकर अंदर कदम रखा। अंदर कदम रखते ही उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सैकड़ों आंखें एक साथ उसी को घूर रही हों। उसने टॉर्च की रोशनी दीवारों पर डाली, जहाँ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं और हर तस्वीर की आंखें उसकी तरफ घूम रही थीं। अचानक एक भारी आवाज गूंजी कि यहाँ से कभी कोई वापस नहीं गया, और दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

सपनों का खौफनाक सफर

अमित को पिछले कुछ दिनों से एक ही सपना बार-बार आ रहा था, जिसमें एक सुनसान सड़क पर कोई उसका पीछा कर रहा था। शुरुआत में उसने इसे महज एक आम सपना समझकर नजरअंदाज कर दिया, लेकिन एक रात उसने सपने में खुद को उस सड़क पर सचमुच दौड़ते हुए पाया। जब उसकी नींद खुली, तो उसके पैरों में असली धूल और मिट्टी जमी हुई थी। अगली रात, उसने तय किया कि वह सपने के अंत तक जाएगा और उस पीछा करने वाले का चेहरा देखेगा। जैसे ही वह मुड़ा, उसने पाया कि वह भयानक साया कोई और नहीं बल्कि उसका अपना ही अतीत था।