अंधेरे में जलती उम्मीद की लौ

अंधेरे में जलती उम्मीद की लौ

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रोहित की जिंदगी में जब से उसकी आंखों की रोशनी कम हुई थी, तब तक उसके सारे सपने मानो दम तोड़ चुके थे। वह एक प्रतिभाशाली चित्रकार था और अब कैनवास पर रंग बिखेरना उसके लिए असंभव सा हो गया था। निराशा के इस काले साये में उसकी छोटी बहन नीना ने उसका हाथ थामा और उसे टेक्सचर पेंटिंग की नई दुनिया से परिचित कराया। शुरुआत में रोहित का गुस्सा और हताशा फूट पड़ती थी, लेकिन नीना ने हार नहीं मानी। एक दिन अंधेरे कमरे में उसने रंगों को टटोलकर एक ऐसी अनोखी तस्वीर बनाई जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया। उस दिन रोहित को अहसास हुआ कि दृष्टि केवल आंखों से नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों और मजबूत इच्छाशक्ति से होती है।
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दीवार पर टंगी पेंटिंग और खामोश रिश्ते

बैठक कक्ष की दीवार पर सजी वह अधूरी पेंटिंग बरसों से किसी के आने का इंतजार कर रही थी। पिता और पुत्र के बीच अनबन ऐसी थी कि दोनों एक छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जीते थे। बेटा कला में नाम कमाना चाहता था, जबकि पिता को लगता था कि यह सब वक्त की बर्बादी है। एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। जब बेटा उनके कमरे की सफाई कर रहा था, तब उसने मेज की दराज में अपनी बनाई हुई वे सारी तस्वीरें पाईं जिन्हें उसने बचपन में कभी फेंका था। हर तस्वीर के पीछे पिता ने गर्व से कुछ शब्द लिख रखे थे। उस पल बेटे को अहसास हुआ कि खामोशी के पीछे कितनी गहरी ममता छिपी थी। उसने अस्पताल जाकर पिता का हाथ थामा और दोनों की आंखें नम थीं, बिना कुछ कहे सब कुछ समझ चुकी थीं।

छत पर टंगे लालटेन की रोशनी

सांझ ढलते ही गाँव के उस पुराने घर की छत पर एक लालटेन टंग जाती थी। यह परंपरा पिछले बीस सालों से चली आ रही थी। बूढ़े माधव जी हर शाम अपनी धुंधली आँखों से दूर सड़क की तरफ देखते, इस उम्मीद में कि उनका बेटा शहर से लौट आएगा। बरसों बीत गए, न बेटा आया और न ही लालटेन जलना बंद हुई। गाँव वाले कहते कि यह महज़ जिद है, पर माधव जी की निगाहों में इंतजार की एक ऐसी पवित्र लौ थी जो कभी धीमी नहीं पड़ती थी। एक सर्द शाम जब हवाएं तेज़ थीं, तभी एक कार आकर रुकी। दरवाजे से एक युवक उतरा और सीधे छत की सीढ़ियों की तरफ भागा। माधव जी ने जब उसे देखा, तो उनकी आँखों से बहते आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो डाले। उस रात वह लालटेन हमेशा के लिए बुझा दी गई, क्योंकि अब इंतजार की जरूरत नहीं थी।

अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।