ShayariForYou

Stories

Shayari, quotes, wishes and stories worth keeping.

रेत पर बने पदचिह्न

सुबह के समय समुद्र तट पर टहलना सोहन का पुराना शौक था। वह रोज लहरों के साथ बहकर आने वाली सीपियों को देखता और अपने ख्यालों में खो जाता। एक दिन उसे रेत पर एक बहुत ही सुंदर और अनोखे आकार का पत्थर मिला। पत्थर पर प्राकृतिक रूप से एक फूल की आकृति उभरी हुई थी। सोहन ने सोचा कि यह किसी मूर्तिकार का अधूरा काम होगा जो लहरों में बहकर यहाँ आ गया। उसने उस पत्थर को अपनी जेब में रख लिया और घर लौट आया। घर आकर उसने जब उसे साफ किया, तो पाया कि उसके पीछे कुछ शब्द खुदे हुए थे। वे शब्द थे - जो तुम्हारा है, वह कभी न कभी तुम्हें ढूंढ ही लेगा। उस एक वाक्य ने सोहन के जीवन का नजरिया ही बदल दिया। उसे समझ आ गया कि सफलता और खुशी के लिए ज्यादा भागने की जरूरत नहीं होती, बस सही वक्त का इंतजार करना पड़ता है। आज सोहन हर सुबह उसी तट पर जाता है, लेकिन अब वह किसी चीज की तलाश नहीं करता, बल्कि जीवन के हर पल का आनंद लेता है।

दीवार पर टंगी पेंटिंग और खामोश रिश्ते

बैठक कक्ष की दीवार पर सजी वह अधूरी पेंटिंग बरसों से किसी के आने का इंतजार कर रही थी। पिता और पुत्र के बीच अनबन ऐसी थी कि दोनों एक छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जीते थे। बेटा कला में नाम कमाना चाहता था, जबकि पिता को लगता था कि यह सब वक्त की बर्बादी है। एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। जब बेटा उनके कमरे की सफाई कर रहा था, तब उसने मेज की दराज में अपनी बनाई हुई वे सारी तस्वीरें पाईं जिन्हें उसने बचपन में कभी फेंका था। हर तस्वीर के पीछे पिता ने गर्व से कुछ शब्द लिख रखे थे। उस पल बेटे को अहसास हुआ कि खामोशी के पीछे कितनी गहरी ममता छिपी थी। उसने अस्पताल जाकर पिता का हाथ थामा और दोनों की आंखें नम थीं, बिना कुछ कहे सब कुछ समझ चुकी थीं।

छत पर टंगे लालटेन की रोशनी

सांझ ढलते ही गाँव के उस पुराने घर की छत पर एक लालटेन टंग जाती थी। यह परंपरा पिछले बीस सालों से चली आ रही थी। बूढ़े माधव जी हर शाम अपनी धुंधली आँखों से दूर सड़क की तरफ देखते, इस उम्मीद में कि उनका बेटा शहर से लौट आएगा। बरसों बीत गए, न बेटा आया और न ही लालटेन जलना बंद हुई। गाँव वाले कहते कि यह महज़ जिद है, पर माधव जी की निगाहों में इंतजार की एक ऐसी पवित्र लौ थी जो कभी धीमी नहीं पड़ती थी। एक सर्द शाम जब हवाएं तेज़ थीं, तभी एक कार आकर रुकी। दरवाजे से एक युवक उतरा और सीधे छत की सीढ़ियों की तरफ भागा। माधव जी ने जब उसे देखा, तो उनकी आँखों से बहते आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो डाले। उस रात वह लालटेन हमेशा के लिए बुझा दी गई, क्योंकि अब इंतजार की जरूरत नहीं थी।

अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।

माटी के दीये और उम्मीद की रात

दीपावली की रौनक हर तरफ थी, लेकिन कुम्हार मंगेश के घर में अंधेरा पसरा था। उसके बनाए हुए एक भी दीये इस बार नहीं बिके थे, क्योंकि लोग अब चाइनीज लड़ाइयों और मोमबत्तियों के दीवाने हो चुके थे। मंगेश मायूस होकर अपने चाक के पास बैठा सोच रहा था कि इस बार बच्चों को क्या जवाब देगा। तभी पड़ोस के छोटे से बच्चे ने आकर उसकी सारी उम्मीद जगा दी। उस बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो माटी के दीयों में ही होती है, मशीन के बने सामान में कहां जान होती है। बच्चे के उन मासूम शब्दों ने मंगेश के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी थकान भूला दी और फिर से दीयों को सजाने लगा। उस रात मंगेश के घर के दीये भले ही कम जले, लेकिन उसके दिल में जलती उम्मीद की लौ ने पूरे मोहल्ले को रोशन कर दिया था।

रेलवे क्रॉसिंग का इंतजार

शाम के वक्त जब फाटक बंद होता है, तो वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। मोहन रोज़ इसी समय अपनी स्कूटी पर बैठकर ट्रेन के गुजरने का इंतज़ार करता है। आज भी वह वहीं खड़ा था, तभी उसकी नज़र एक बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी जो बड़े प्यार से पटरी के उस पार देख रहा था। मोहन ने पूछा कि बाबा आप किसे देख रहे हैं। उस बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए बताया कि इसी ट्रेन से बरसों पहले उनका बेटा शहर गया था जो आज तक नहीं लौटा, लेकिन हर शाम उनका दिल कहता है कि वह शायद आज वापस आ जाएगा। यह सुनकर मोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने महसूस किया कि इंतज़ार सिर्फ एक समय की बात नहीं है, बल्कि यह किसी की उम्मीद और जीवन का वो धागा है जो कभी कमज़ोर नहीं पड़ता। उस दिन से मोहन का नज़रिया बदल गया।

गाँव की धूल भरी सड़क पर कदम

शहर की चकाचौंध से थक कर सोहन पंद्रह साल बाद अपने पैतृक गाँव लौटा था। कंक्रीट के जंगलों में भागते-भागते वह अपनी जड़ों को भूल चुका था। जैसे ही उसने गाँव की सीमा में कदम रखा, वही पुरानी सोंधी मिट्टी की महक और दूर खेतों से आती बांसुरी की धुन ने उसका स्वागत किया। उसे डर था कि शायद अब उसे कोई पहचानेगा भी नहीं। लेकिन तभी पेड़ की छांव में बैठे ताऊजी ने उसे दूर से ही पहचान लिया और दौड़कर गले लगा लिया। गाँव के लोगों का वह अपनापन देखकर सोहन की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि दुनिया चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, असली सुकून अपने लोगों के बीच और अपनी मातृभूमि की गोद में ही मिलता है। उस शाम उसने चैन की सांस ली और शहर वापस जाने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया।

धुंधली खिड़की से झांकता सूरज

सर्दी की ठंडी सुबह थी और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। अलोक अपनी खिड़की के पास बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। उसका मन पिछले कुछ महीनों से उपजे अकेलेपन से भारी था, क्योंकि उसका बेटा विदेश जा चुका था और पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत उसे नहीं मिली थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। अलोक ने दरवाजा खोला तो सामने एक छोटा सा पिल्ला ठंड से कांप रहा था, जिसे किसी ने उसकी देहरी पर छोड़ दिया था। पहले तो उसने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी मासूम आँखों को देखकर अलोक का दिल पिघल गया। उसने उसे अंदर बुलाया और गर्म दूध पिलाया। उस बेजुबान के आने से अलोक का सूना घर अचानक खिलखिला उठा। उसने महसूस किया कि प्यार और साथ पाने की कोई उम्र नहीं होती और जीवन किसी भी मोड़ पर नया सवेरा दिखा सकता है।

अटेरे में रखी धूल भरी ट्रंक

जब रोहन ने अपने पुरखों के घर की सफाई शुरू की, तो अटारी के एक कोने में उसे लोहे की भारी ट्रंक मिली। उस पर समय की धूल और जंग की परतें जमी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से जब उसने उसका ताला खोला, तो अंदर बचपन की कई अनमोल चीजें और उसकी माँ की साड़ियां रखी मिलीं। साड़ियों की तहों के बीच से एक लिफाफा गिरा जिस पर रोहन का नाम लिखा था। वह खत उसकी माँ ने उसके बोर्ड परीक्षा के दिनों में लिखा था, जिसमें उसकी सफलता के लिए दुआएं और अगाध प्रेम था। उस खत को पढ़ते ही रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। वह समझ गया कि माँ भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद आज भी उसके साथ है। इस अनपेक्षित उपहार ने उसके भीतर एक अजीब सी शांति भर दी और उसने ट्रंक की हर चीज़ को सीने से लगा लिया।

बंजर ज़मीन पर खिला गुलाब

गाँव के बुजुर्ग मोहन लाल ने जब उस सूखी और बंजर ज़मीन पर पौधे लगाने की सोची, तो पूरे गाँव ने उसका मजाक उड़ाया। लोगों का कहना था कि इस कंकड़-पत्थर वाली ज़मीन पर घास का एक तिनका भी नहीं उग सकता। लेकिन मोहन लाल की जिद के आगे कुदरत को भी झुकना पड़ा, वह रोज सुबह मीलों दूर से पानी ढोकर लाता और पौधों को सींचता। साल बीत गए, मोहन लाल की उम्र ढलने लगी और उसकी पीठ झुक गई, लेकिन उसकी मेहनत में कोई कमी नहीं आई। एक दिन जब भीषण गर्मी के बाद पहली बारिश हुई, तो उसी बंजर ज़मीन के बीचों-बीच एक लाल गुलाब खिल उठा। उस लाल गुलाब को देखकर पूरा गाँव हैरान रह गया और जिन लोगों ने कभी उसका मजाक उड़ाया था, वे आज उसके सामने नतमस्तक थे। मोहन लाल ने मुस्कुराते हुए अपनी झुर्रियों भरे हाथों से उस फूल को छुआ और समझ गया कि पक्की श्रद्धा और अटूट मेहनत से कुछ भी संभव है।

पिता की पुरानी साइकिल की घंटी

सुबह के ठीक छह बजे जब भी गली में साइकिल की घंटी बजती थी, सोहन समझ जाता था कि उसके पिता काम से लौट आए हैं। वह घंटी सिर्फ एक साइकिल का हिस्सा नहीं थी, बल्कि उसके सुरक्षित बचपन का एक प्रतीक थी। समय बीता, पिता का साया उठ गया और वह पुरानी साइकिल जंग खाकर कबाड़ बन गई। सोहन ने उस साइकिल को कबाड़ में बेचने का फैसला किया और मैकेनिक को बुला लिया। जैसे ही मैकेनिक उसे ले जाने लगा, सोहन का बेटा दौड़कर आया और उसने उस टूटी हुई घंटी को निकाल कर अपने हाथ में रख लिया। उसने जैसे ही घंटी बजाई, उसकी आवाज़ ने सोहन के भीतर दबे बचपन के सारे अहसासों को फिर से जीवंत कर दिया। सोहन की आंखें भर आईं और उसने मैकेनिक को पैसे देकर साइकिल वापस रखवा ली। उस घंटी की खनक ने उसे याद दिलाया कि पिता कहीं नहीं गए, वे आज भी उसकी हर सुबह में मौजूद हैं।