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Shayari, quotes, wishes and stories worth keeping.

सफर का अनजाना साथी

ट्रेन की खड़खड़ाहट के बीच, सामने वाली सीट पर बैठी वृद्ध महिला ने चुपचाप मुझे एक भुना हुआ चना बढ़ाया। शुरुआत में मैंने संकोच किया, पर उनकी आंखों की ममता ने मुझे वह लेने पर मजबूर कर दिया। बातों का सिलसिला शुरू हुआ और उन्होंने अपनी जिंदगी के कई अनकहे पन्ने खोल दिए। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपने सपनों को मारकर अपने बच्चों को पाला, और आज सब अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। उनके चेहरे पर कोई शिकवा नहीं था, बस एक सुकून था। अचानक रेलवे स्टेशन आया और उन्हें उतरना था। जाते-जाते उन्होंने मेरा हाथ थामा और बोलीं कि हर अजनबी में अपनापन तलाशना ही जीवन का असली सफर है। वह ट्रेन से उतर गईं, पर उनके शब्द मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गए।

अंतिम पन्नों की दास्तान

अमित को अपने दादा जी की अलमारी से एक डायरी मिली जिसके आखिरी पन्ने पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं। दादा जी हमेशा कम बोलते थे और अपने कमरे में अकेले रहना पसंद करते थे, इसलिए अमित उन्हें कभी समझ नहीं पाया था। जब उसने डायरी के वो पन्ने पढ़े, तो उसे पता चला कि दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ परिवार को संवारने के लिए अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपना पुश्तैनी मकान भी बच्चों की पढ़ाई के लिए बेच दिया था, पर कभी किसी को जुबान से शिकवा नहीं किया। अमित की आँखों से पछतावे के आंसू बहने लगे क्योंकि उसने कई बार अपने दादा जी से ऊंची आवाज में बात की थी। वह दौड़कर दादा जी के कमरे में गया, उन्हें कसकर गले लगा लिया और पहली बार उन्हें एहसास कराया कि वह उनसे कितना प्यार करता है।

बक्से में बंद ख्वाब

मीरा ने जब घर की सफाई के दौरान अलमारी के सबसे निचले हिस्से में लकड़ी का वह पुराना बक्सा खोला, तो धूल की एक परत के साथ कई दबे हुए अरमान भी बाहर आ गए। उस बक्से में उसके कॉलेज के दिनों के स्केच, अधूरे गीत और कुछ रंग-बिरंगे धागे थे। एक वक्त था जब वह चित्रकार बनना चाहती थी, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों और सामाजिक बंधनों ने उसके सारे सपने एक बक्से में कैद करवा दिए। उसने उन कागजों को अपने हाथों से छुआ और उसकी आँखें नम हो गईं। तभी उसकी पोती दौड़ती हुई आई और उसने मीरा के पुराने रंगों को देखकर पेंटिंग बनाने की जिद पकड़ ली। मीरा ने अपनी पोती का हाथ थामा और ब्रश उठाया, मानो उसका टूटा हुआ सपना आज किसी नई रोशनी के साथ फिर से जिंदा हो उठा हो।

गुमशुदा यादों का शहर

रमेश बाबू कई वर्षों बाद उस शहर लौटे थे जहाँ उन्होंने अपनी जवानी के सुनहरे दिन बिताए थे। शहर की हर गली बदल चुकी थी, ऊँची इमारतें और चौड़ी सड़कें बन चुकी थीं। उनके कदम खुद-ब-खुद उस पुराने बाजार की तरफ बढ़े जहाँ कभी उनकी चाय की दुकान हुआ करती थी। दुकान की जगह अब एक बड़ा शॉपिंग मॉल खड़ा था, जिसे देखकर उनका दिल भर आया। अचानक उनकी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी जो कोने में बैठकर पेंटिंग बेच रहे थे। वह और कोई नहीं, उनका कॉलेज के दिनों का जिगरी यार सोहन था, जिससे किसी गलतफहमी के कारण पचास साल पहले रिश्ता टूट गया था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे कसकर गले लग गए। समय ने उनके चेहरे पर झुर्रियाँ भले ही डाल दी थीं, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक और अपनेपन का एहसास आज भी जिंदा था।

खिड़की पर बैठा परिंदा

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अलोक अपने काम में इतना उलझ चुका था कि उसे प्रकृति की खूबसूरती देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। पिछले कुछ दिनों से उसकी दफ्तर वाली खिड़की के पास एक घायल कबूतर आकर बैठ जाता था। शुरुआत में अलोक ने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी बेबस आँखें देखकर अलोक का दिल पिघल गया। वह रोज सुबह उस परिंदे के लिए दाना और पानी रखने लगा। धीरे-धीरे उस परिंदे के पंख ठीक होने लगे और वह थोड़ी देर उड़कर वापस उसी खिड़की पर आने लगा। इस रोजमर्रा के सिलसिले ने अलोक के अकेलेपन को पूरी तरह से मिटा दिया। उसे महसूस हुआ कि यह बेजुबान परिंदा उसे यह सिखाने आया था कि जिंदगी सिर्फ काम का नाम नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे जीवों की देखभाल करने में ही असली सुकून छुपा हुआ है।

मिट्टी के दीये और उम्मीद की लौ

दीपावली की रात थी और पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। लेकिन शहर के एक कोने में बूढ़े मंगेश चाचा अभी भी अपनी टूटी हुई झोपड़ी के बाहर अंधेरे में बैठे मिट्टी के दीये बेच रहे थे। महंगाई के इस दौर में अब चाइनीज लड़ियों के आगे किसी को मिट्टी के दीये कहां भाते हैं। मंगेश चाचा की आँखें सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देख रही थीं कि शायद कोई तो उनके बनाए दीये खरीदेगा ताकि घर में चूल्हा जल सके। तभी वहां एक छोटा बच्चा अपने माता-पिता के साथ आया और उसने चाचा की टोकरी के सारे दीये खरीदने की जिद पकड़ ली। बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो इन्हीं दीयों से होती है। उस बच्चे की बात सुनकर मंगेश चाचा के बुझते हुए दिल में उम्मीद की एक नया दीया जल उठा और उनकी आँखें खुशी से छलक आईं।

अल्मारी के कोने में रखी पुरानी घड़ी

दीपावली की सफाई के दौरान जब अनाहिता ने घर के पुराने स्टोर रूम की सफाई शुरू की, तो उसकी नजर लकड़ी की एक पुरानी संदूकची पर पड़ी। उसने धूल झाड़कर उसे खोला तो अंदर उसके दादाजी की कलाई पर बंधने वाली वह पुरानी टिक-टिक करती घड़ी मिली, जो सालों पहले बंद हो गई थी। अनाहिता ने उसे उठाया और जैसे ही उसने उसकी चाबी घुमाने की कोशिश की, अचानक से घड़ी की सुइयां हिलने लगीं और उसकी पुरानी टिक-टिक की आवाज गूंज उठी। उस आवाज के साथ ही बचपन की वे तमाम यादें ताजा हो गईं जब दादाजी उसे पार्क ले जाया करते थे और अपनी कलाई की घड़ी दिखाकर उससे समय पूछा करते थे। अनाहिता की पलकें नम हो गईं और उसने घड़ी को अपने सीने से लगा लिया। उस एक पल में बीता हुआ पूरा बचपन जैसे फिर से लौट आया हो।

रेलवे स्टेशन का आखिरी फेरा

शाम ढल रही थी और प्लेटफार्म नंबर दो पर लोगों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। राघव पिछले दस सालों से इसी स्टेशन पर एक छोटी सी चाय की दुकान चला रहा था। हर शाम ठीक साढ़े सात बजे एक लड़की आती थी, एक कप ब्लैक टी लेती थी और खिड़की से बाहर दूर तक देखती थी। राघव कभी उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया, बस उसकी पसंद की चाय बना देता था। आज जब वह लड़की आई, तो उसके हाथ में एक लिफाफा था। उसने चाय की चुस्की ली और लिफाफा राघव की तरफ बढ़ा दिया। राघव ने हैरानी से देखा तो उस पर लिखा था, 'शुक्रिया, मेरी तन्हाई बांटने के लिए।' ट्रेन की सीटी बजी और वह चल दी। राघव ने लिफाफा खोला तो उसके भीतर एक पुरानी तस्वीर और एक छोटा सा नोट था, जिसमें लिखा था कि अब वह शहर छोड़कर हमेशा के लिए जा रही है। राघव की आँखें भर आईं।

पहली बारिश का पहला खत

आसमान में काले बादल छाए थे और मिट्टी की सौंधी खुशबू हवा में घुल रही थी। कॉलेज के दिनों में लिखी गई एक पुरानी डायरी के पन्नों को पलटते समय अनामिका को एक मोड़ पर मिला वह गुलाब का सूखा हुआ फूल मिल गया। उसके साथ एक खत था जो उसने कभी किसी को नहीं भेजा था, डर था कि कहीं रिश्ता न टूट जाए। आज जिंदगी के इस पड़ाव पर जब सब कुछ पा लेने के बाद भी कुछ अधूरा सा लगता था, उसने उस खत को दोबारा पढ़ा। उसने सोचा कि क्यों न आज अपने पुराने मित्र को फोन करके हालचाल पूछा जाए जिसके बिना कभी एक पल भी नहीं कटता था। जैसे ही उसने नंबर मिलाया, दूसरी तरफ से वही पुरानी जानी-पहचानी आवाज गूंजी, मानो वक्त वहीं का वहीं ठहर गया हो।

बरगद की छांव और पुराना दोस्त

गांव के चौराहे पर खड़े पुराने बरगद के पेड़ के नीचे मोहन और सोहन हर शाम अपनी जवानी के दिनों की बातें किया करते थे। दोनों ने साथ में स्कूल की पढ़ाई की और एक ही सपने के साथ बड़े हुए थे। समय के पहिए ने ऐसी करवट ली कि सोहन शहर का बड़ा व्यापारी बन गया और मोहन गांव में ही खेती-किसानी से जुड़ा रहा। मतभेदों के कारण दोनों के बीच बीस साल तक बातचीत बंद रही। एक दिन सोहन का बेटा उसी गांव में एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आया और उसे अपने पिता के पुराने दोस्त के बारे में पता चला। सोहन बिना देर किए गांव भागा और बरगद के नीचे बैठे मोहन को देखते ही दौड़कर गले मिल गया। सारे गिले-शिकवे पलभर में हवा हो गए और पुरानी दोस्ती फिर से जीवंत हो उठी।

सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

रेगिस्तान में खिलता हुआ गुलाब

रमेश बाबू ने अपनी जिंदगी के पचास साल एक वीरान रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हुए बिता दिए थे। उनके दोनों पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। वह हर महीने अपनी कमाई का आधा हिस्सा पास के अनाथालय में दान कर देते थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे अपने बुढ़ापे के लिए क्यों नहीं बचाते, तो रमेश ने कहा कि दूसरों के चेहरों पर खुशी देखना ही उनका असली बैंक बैलेंस है। एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ा अधिकारी उतरा, जिसने बचपन में रमेश के दिए पैसों से ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस अधिकारी ने रमेश को गले लगाया और उनकी सालों की मेहनत रंग लाई। रमेश की आंखें भर आईं और उन्हें महसूस हुआ कि उनका जीवन वास्तव में सार्थक हो गया था।