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"मुसाफिर" के लिए परिणाम

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कुल 22 परिणाम मिले खोज शब्द: मुसाफिर

बरसात की शाम

झमाझम बारिश हो रही थी और ऑफिस से घर लौटते वक्त विक्रम की गाड़ी अचानक बीच रास्ते में खराब हो गई। वह छाता भूल आया था और पूरी तरह भीग चुका था। पास ही एक छोटी सी चाय की टपरी खुली थी जहाँ उसने शरण ली। वहाँ एक बूढ़ा आदमी सुरीली आवाज में पुराना गजल गुनगुना रहा था और आने जाने वाले हर मुसाफिर को अदरक वाली गरमागरम चाय पिला रहा था। विक्रम ने जब चाय की चुस्की ली, तो उसकी सारी थकान और दिनभर का तनाव पल भर में गायब हो गया। बारिश की वो शाम उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।
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रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।
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अंतिम ट्रेन का मुसाफिर

सोहन रात की आखिरी लोकल ट्रेन से अपने गाँव लौट रहा था। डिब्बा पूरी तरह खाली था और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। तभी एक अजीब सी ठंडी हवा का झोंका आया और उसके सामने वाली सीट पर एक महिला आकर बैठ गई, जिसका चेहरा सफेद चादर से ढंका हुआ था। सोहन ने डरते हुए उससे पूछा कि आप कहाँ जा रही हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जब ट्रेन एक सुनसान सुरंग में पहुँची, तो महिला ने अपनी चादर हटाई। उसके चेहरे की जगह केवल एक धधकता हुआ गड्ढा था। ट्रेन की ब्रेक फेल हो चुकी थी और उस वीरान सुरंग में सोहन की चीखें हमेशा के लिए खो गईं।
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अंधेरे कमरे में रखा एक दिया

एक पुराने खंडहर जैसे घर में रहने वाले वृद्ध मोहन ने हर शाम एक छोटा सा दिया जलाने का नियम बनाया था। हवा के तेज झोंके उसे बुझाने की कोशिश करते, लेकिन वह हर बार उसे बचा लेता था। पड़ोसियों ने उससे पूछा कि इस सुनसान और अंधेरे घर में इस एक दीये से क्या फर्क पड़ता है? मोहन ने मुस्कुराकर कहा कि यह दीया पूरे घर को रोशन न सही, लेकिन मुझे रास्ता दिखाने के लिए काफी है और यही उम्मीद मुझे जिंदा रखती है। कुछ दिनों बाद, उस रास्ते से गुजरने वाले कई मुसाफिरों ने उस रोशनी को देखकर अपना सही रास्ता पा लिया।
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रेगिस्तान का हरा सफर

एक समय की बात है, असीम रेत के समंदर में एक छोटा सा बबूल का पौधा अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। चारों तरफ तपती धूप और पानी का नामोनिशान तक नहीं था, जिससे हर कोई यही सोचता था कि यह पौधा कुछ ही दिनों में सूख जाएगा। लेकिन उस पौधे ने अपनी जड़ों को जमीन में बहुत गहराई तक उतार लिया, ताकि वह नमी की तलाश कर सके। कई आंधियां आईं, उसकी पत्तियां झड़ीं और तना झुलस गया, पर उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। एक दिन, अचानक तेज बारिश हुई और रेगिस्तान में एक छोटी सी धारा बह निकली। उस छोटे से पौधे की मेहनत रंग लाई और देखते ही देखते उसने एक बड़े पेड़ का रूप ले लिया, जो आज कई मुसाफिरों को अपनी घनी छांव देता है। यह कहानी सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी यदि अटूट विश्वास रखा जाए, तो सफलता अवश्य मिलती है।
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सफर का आखिरी मुसाफिर

एक ठंडी शाम को एक बूढ़ा यात्री एक अनजान गाँव में पहुँचा। उसके पास केवल एक कंबल और थोड़ा सा भोजन था। रास्ते में उसे एक काँपता हुआ बच्चा मिला जिसने ठंड से बचने के लिए मदद माँगी। बूढ़े ने बिना एक पल गंवाए अपना कंबल बच्चे को ओढ़ा दिया और खुद ठंड सहने लगा। लोगों ने पूछा कि आपने अपना इकलौता कंबल क्यों दे दिया? बूढ़े ने कहा कि असली धन वह नहीं जो तिजोरी में बंद रहे, बल्कि वह है जो किसी जरूरतमंद के काम आ सके। उस रात उसे जो आंतरिक शांति मिली, उसने उसकी सारी ठंड दूर कर दी।
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रेगिस्तान की रेत और ओस की बूंद

रेगिस्तान की झुलसा देने वाली धूप में एक अकेला मुसाफिर अपनी राह भटक गया था। दूर-दूर तक फैली पीली रेत और प्यास से सूखता गला, उसका इम्तिहान ले रहे थे। तभी उसे एक पुराने कारवां के खंडहर के पास एक छोटी सी छाया मिली, जहाँ एक स्थानीय युवती पानी का मटका लेकर बैठी थी। उसने बिना किसी सवाल के उस अजनबी को अपनी हथेली पर पानी की बूंदें दीं, मानो रेगिस्तान में कोई ओस उतर आई हो। उस एक पल की नजरों ने दोनों के बीच के सारे फासले मिटा दिए। मुसाफिर ने अपनी मंजिल भूलकर वहीं ठहर जाने का फैसला कर लिया। रेत के उस समंदर में दिल की धड़कनों ने एक ऐसी धुन छेड़ी जो सदियों तक गूँजती रही।
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आत्मविश्वास का दीया

खुद पर विश्वास की एक चिंगारी ही काफी है, बुझे हुए अरमानों में जान फूंकने के लिए। रास्तों की परवाह मत करो ऐ मुसाफिर, इरादे काफी हैं मंजिल तक पहुँचने के लिए।
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