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घड़ी की सुई और उम्मीद

अजय की घड़ी की टिक-टिक उसकी धड़कनों के साथ चल रही थी। इंटरव्यू का वक्त नजदीक आ रहा था और ट्रैफिक जाम ने उसकी सारी योजना पर पानी फेर दिया था। वह ऑटो से उतरकर बारिश के बीच पैदल ही दौड़ पड़ा क्योंकि यह नौकरी उसके परिवार के भविष्य के लिए बेहद जरूरी थी। कीचड़ में उसके जूते सन चुके थे और सांस फूल रही थी लेकिन हार मानने का सवाल ही नहीं था। जब वह ऑफिस के गेट पर पहुंचा, तो घड़ी ने ठीक इंटरव्यू का आखिरी मिनट दिखाया। रिसेप्शनिस्ट ने उसे अंदर जाने से मना कर दिया क्योंकि कड़ा नियम था। तभी कंपनी के मालिक ने उसे आते देख लिया और उसके संघर्ष भरे चेहरे को पढ़कर अंदर बुला लिया। मेहनत और समय की पाबंदी ने आखिरकार उसकी किस्मत का दरवाजा खोल ही दिया।

संगीत के सुर

अमित को बचपन से ही बांसुरी बजाने का शौक था, लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। उसके पास एक पुरानी और टूटी हुई बांसुरी थी, जिससे मधुर आवाज निकालना बेहद कठिन था। हर शाम वह गाँव के बाहर बैठकर अपनी टूटी बांसुरी से सुर साधने की कोशिश करता, और आसपास के लोग उसका मजाक उड़ाते थे। एक शाम वहाँ से एक प्रसिद्ध संगीतकार गुजर रहे थे। उन्होंने अमित की धुन में छिपे उस दर्द और सच्चे जुनून को महसूस किया। संगीतकार ने आगे बढ़कर उसे अपनी एक बेहतरीन बांसुरी भेंट की। उस दिन अमित को यकीन हो गया कि सच्ची लगन और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती, बस सही समय का इंतजार करना पड़ता है।

सफलता का शिखर

अमित ने अपने छोटे से गांव से निकलकर महानगर की इस बड़ी कंपनी में इंटरव्यू दिया था। उसके पास महंगे कोट-पैंट नहीं थे, न ही अंग्रेजी का कोई भारी-भरकम अनुभव। उसके पास केवल उसकी मेहनत और मजबूत इरादे थे। पैनल के अधिकारी उसकी सादगी देखकर थोड़ा मुस्कुराए। अमित ने बिना किसी झिझक के अपने हुनर और सीखने की ललक के बारे में खुलकर बात की। उसने बताया कि कैसे अभावों में भी उसने अपने सपनों को जिंदा रखा है। इंटरव्यू के बाद हफ्तों तक कोई जवाब नहीं आया, तो उसका दिल बैठने लगा। उसे लगा कि शायद शहर की चकाचौंध में उसकी आवाज कहीं खो गई है। लेकिन तभी एक सुबह उसके फोन पर एक ईमेल आया, जिसमें उसे कंपनी का मुख्य प्रबंधक नियुक्त करने की बात कही गई थी। अमित की आँखों में खुशी के आंसू थे, उसने साबित कर दिया कि काबिलियत किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती।

सपनों का आकाश

छोटे से गाँव के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला रमन हमेशा रात को छत पर लेटे हुए तारों को निहारा करता था। उसके दोस्तों ने उसे कई बार समझाया कि आसमान छूना गरीबों के बस की बात नहीं है। लेकिन रमन ने हार नहीं मानी। उसने अपनी मेहनत और लगन से दिन-रात एक करके एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को आसान बना सके। आज वही रमन एक सफल उद्यमी था और उसने अपने गाँव के स्कूल का कायाकल्प कर दिया था। उसने साबित कर दिया कि सपने देखने वालों के लिए कोई सीमा नहीं होती।

नदी किनारे का पत्थर

पहाड़ों से निकलकर जब एक चिकना पत्थर नदी के साथ बहता हुआ गाँव के पास पहुँचा, तो उसने खुद को बहुत अकेला महसूस किया। उसे लगता था कि वह किसी काम का नहीं है क्योंकि उसका आकार गोल और चिकना हो चुका था। एक दिन गाँव का एक मूर्तिकार उधर से गुजरा। उसकी नजर उस पत्थर पर पड़ी। उसने पत्थर को उठाया और अपने स्टूडियो ले गया। कुछ ही दिनों की मेहनत के बाद उस साधारण से पत्थर ने भगवान की एक सुंदर मूर्ति का रूप ले लिया। अब उस पत्थर के सामने हर कोई सिर झुकाता था। संघर्ष ही इंसान को सही आकार देता है।

मिट्टी के खिलौने

सूरज की पहली किरण के साथ ही मदन अपनी छोटी सी दुकान के बाहर बैठकर मिट्टी के खिलौने बनाने बैठ जाता था। उसके हाथों का जादू ऐसा था कि बेजान मिट्टी भी सुंदर घोड़ों, हाथियों और पक्षियों का रूप ले लेती थी। शहर के बड़े बाजारों में प्लास्टिक और चीनी मिट्टी के चमकते खिलौने बिकते थे, जिससे मदन की दुकान पर ग्राहक कम ही आते थे। एक दिन एक मशहूर चित्रकार उसकी दुकान पर आया। उसने मदन की कला को देखा और उसकी सादगी का कायल हो गया। चित्रकार ने न केवल उसके सारे खिलौने खरीदे, बल्कि शहर की एक बड़ी कला प्रदर्शनी में मदन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। मदन की वर्षों की मेहनत और उसकी कला को आखिरकार वह पहचान मिल ही गई जिसकी उसे तलाश थी।

रेत पर बने पदचिह्न

सुबह के समय समुद्र तट पर टहलना सोहन का पुराना शौक था। वह रोज लहरों के साथ बहकर आने वाली सीपियों को देखता और अपने ख्यालों में खो जाता। एक दिन उसे रेत पर एक बहुत ही सुंदर और अनोखे आकार का पत्थर मिला। पत्थर पर प्राकृतिक रूप से एक फूल की आकृति उभरी हुई थी। सोहन ने सोचा कि यह किसी मूर्तिकार का अधूरा काम होगा जो लहरों में बहकर यहाँ आ गया। उसने उस पत्थर को अपनी जेब में रख लिया और घर लौट आया। घर आकर उसने जब उसे साफ किया, तो पाया कि उसके पीछे कुछ शब्द खुदे हुए थे। वे शब्द थे - जो तुम्हारा है, वह कभी न कभी तुम्हें ढूंढ ही लेगा। उस एक वाक्य ने सोहन के जीवन का नजरिया ही बदल दिया। उसे समझ आ गया कि सफलता और खुशी के लिए ज्यादा भागने की जरूरत नहीं होती, बस सही वक्त का इंतजार करना पड़ता है। आज सोहन हर सुबह उसी तट पर जाता है, लेकिन अब वह किसी चीज की तलाश नहीं करता, बल्कि जीवन के हर पल का आनंद लेता है।

अटेरे में रखी धूल भरी ट्रंक

जब रोहन ने अपने पुरखों के घर की सफाई शुरू की, तो अटारी के एक कोने में उसे लोहे की भारी ट्रंक मिली। उस पर समय की धूल और जंग की परतें जमी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से जब उसने उसका ताला खोला, तो अंदर बचपन की कई अनमोल चीजें और उसकी माँ की साड़ियां रखी मिलीं। साड़ियों की तहों के बीच से एक लिफाफा गिरा जिस पर रोहन का नाम लिखा था। वह खत उसकी माँ ने उसके बोर्ड परीक्षा के दिनों में लिखा था, जिसमें उसकी सफलता के लिए दुआएं और अगाध प्रेम था। उस खत को पढ़ते ही रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। वह समझ गया कि माँ भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद आज भी उसके साथ है। इस अनपेक्षित उपहार ने उसके भीतर एक अजीब सी शांति भर दी और उसने ट्रंक की हर चीज़ को सीने से लगा लिया।

रेलवे ट्रैक के किनारे बसा आशियाना

हर गुजरती ट्रेन के साथ सोहन के घर की दीवारें कांप उठती थीं। वह सालों से रेलवे लाइन के ठीक पास बनी झुग्गी में रहता था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर इंसान बनाना था। दिनभर धूप में मजदूरी करने के बाद भी उसकी आँखों में एक चमक होती थी। एक दिन, जब उसकी बेटी ने राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया, तो सोहन की आँखें खुशी के आंसुओं से भर गईं। उसे अहसास हुआ कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर नीयत साफ हो और सपने सच्चे हों, तो गरीबी की दीवारें भी एक दिन ढह जाती हैं। उस शाम उसने अपनी बेटी के साथ बैठकर सूखी रोटियां खाईं, लेकिन वो खाना किसी दावत से कम नहीं था।

सपनों का नया सवेरा

सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से अंदर आई, तो राहुल की आँखें खुल गईं। आज उसका इंटरव्यू था, जिसके लिए उसने महीनों से रात-दिन एक कर दिए थे। उसके पिता की साइकिल की दुकान से लेकर इस शहर के बड़े दफ्तर तक का सफर आसान नहीं था। अचानक रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गई और उसे लगा कि आज सब खत्म हो गया है। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और दौड़कर समय पर दफ्तर पहुँच गया। जब इंटरव्यू के बाद उसे चयन का पत्र मिला, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और हर नई सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है।

घर वापसी का अनचाहा सफर

सालों बाद जब सोहन अपने पैतृक गांव की धूल भरी पगडंडी पर उतरा, तो उसके कदम खुद-ब-खुद उस टूटे हुए घर की तरफ बढ़ गए जिसे वह कभी छोड़कर भागा था। शहर की चमक-धमक में उसने सब कुछ पा लिया था, सिवाय उस सुकून के जो उसे अपनी माँ के आंचल में मिलता था। जब उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो दिल जोर से धड़क रहा था। अंदर से बूढ़े हाथों ने दरवाजा खोला और सामने उसकी माँ खड़ी थी। बिना किसी उलाहना या शिकायत के, माँ ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। उस एक आलिगन में शहर की सारी थकान और वर्षों का अकेलापन पल भर में काफूर हो गया। सोहन को समझ आ गया कि सफलता की ऊंची इमारतें उस मिट्टी के घर के आगे बिल्कुल फीकी हैं जहाँ माँ का प्यार बसता है।

माँ के हाथ की आखिरी चाय

नौकरी के सिलसिले में महानगर आए रोहन को हमेशा से अपनी व्यस्त जीवनशैली पर गर्व था। माँ जब भी गांव से फोन करतीं, वह काम का बहाना बनाकर बात टाल देता था। एक दिन अचानक माँ का स्वास्थ्य बिगड़ने का समाचार मिला और वह तुरंत गांव के लिए रवाना हुआ। जब वह घर पहुंचा, तो माँ की सांसें थम चुकी थीं, लेकिन उनके पलंग के पास चायदानी और एक कप गरम चाय रखी थी, जिसे उन्होंने शायद बेटे के आने की आस में बनाया था। उस ठंडी हो चुकी चाय को देखकर रोहन का अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। उसे समझ आया कि सफलता की दौड़ में वह अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो चुका था।