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बगिया का आखिरी फूल

गांव के एक कोने में बने पुराने घर के आंगन में एक सुंदर सा गुलाब का पौधा था जिसकी देखभाल दादाजी वर्षों से करते थे। समय के साथ दादाजी की सेहत बिगड़ने लगी और वे उस पौधे को ज्यादा समय नहीं दे पाए, जिससे उस पर सिर्फ एक ही आखिरी फूल बचा था। सबको लगा कि अब यह पौधा सूख जाएगा और यह फूल भी मुरझा जाएगा। लेकिन पोते ने अपने दादाजी के प्यार को जीवित रखने के लिए उस पौधे की रोजाना खुद सिंचाई करनी शुरू कर दी। उसकी मेहनत रंग लाई और न केवल वह आखिरी फूल खिला रहा, बल्कि पौधे पर नए कोपल भी फूट पड़े।

कागज की नाव और उम्मीद

सावन के महीने में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से गलियों में पानी भर गया था। मोहल्ले के सारे बच्चे अपने घरों की छतों से कागज़ की नावें बनाकर नीचे बहते पानी में छोड़ रहे थे। छोटा अभी एक कोने में खड़ा होकर अपनी बनाई हुई सबसे सुंदर नाव को देख रहा था। उसने उस पर नीले रंग से एक उम्मीद शब्द भी लिखा था। जैसे ही उसने उसे पानी में उतारा, एक तेज लहर के साथ वह नाव बाकी नावों से आगे निकल गई। कुछ दूर जाकर वह एक पत्थर से टकराकर रुक गई। अभी का दिल बैठ गया, लेकिन तभी एक छोटी सी चिड़िया आई और अपनी चोंच से उस नाव को हल्का सा धक्का देकर आगे बढ़ा दिया। अभी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। उसने समझ लिया कि मुश्किलें चाहे जितनी भी बड़ी हों, मदद किसी न किसी रूप में आ ही जाती है।

लोहे की पुरानी अलमारी

शहर के एक कोने में स्थित कबाड़ की दुकान में रखी लोहे की एक बड़ी और पुरानी अलमारी किसी अपने की तलाश में थी। उसकी पपड़ी उखड़ी हुई थी और ताला जंग खा चुका था। रोज़ सुबह दुकानदार उसे बाहर धूप में रखता और शाम को अंदर खींच लेता। एक दिन एक बुजुर्ग अपनी पोती के साथ दुकान पर आए। उन्होंने उस अलमारी को देखते ही पहचान लिया। यह वही अलमारी थी जिसे उन्होंने बरसों पहले अपने पहले घर से विदा करते समय बेच दिया था। बुजुर्ग की आँखों में नमी आ गई और पोती हैरान रह गई। उन्होंने कबाड़ी को पैसे दिए और उसे घर वापस ले जाने का फैसला किया। अलमारी के दरवाज़े की चीखती हुई आवाज़ अब उदासी की नहीं, बल्कि अपनों से मिलने की खुशी की गवाही दे रही थी।

घड़ी की सुई और उम्मीद

अजय की घड़ी की टिक-टिक उसकी धड़कनों के साथ चल रही थी। इंटरव्यू का वक्त नजदीक आ रहा था और ट्रैफिक जाम ने उसकी सारी योजना पर पानी फेर दिया था। वह ऑटो से उतरकर बारिश के बीच पैदल ही दौड़ पड़ा क्योंकि यह नौकरी उसके परिवार के भविष्य के लिए बेहद जरूरी थी। कीचड़ में उसके जूते सन चुके थे और सांस फूल रही थी लेकिन हार मानने का सवाल ही नहीं था। जब वह ऑफिस के गेट पर पहुंचा, तो घड़ी ने ठीक इंटरव्यू का आखिरी मिनट दिखाया। रिसेप्शनिस्ट ने उसे अंदर जाने से मना कर दिया क्योंकि कड़ा नियम था। तभी कंपनी के मालिक ने उसे आते देख लिया और उसके संघर्ष भरे चेहरे को पढ़कर अंदर बुला लिया। मेहनत और समय की पाबंदी ने आखिरकार उसकी किस्मत का दरवाजा खोल ही दिया।

समुद्र का संदेश

लहरें जब बार-बार किनारे से आकर टकराती थीं, तो ऐसा लगता था मानो वे रेत को कुछ समझाना चाह रही हों। रमित रोज़ शाम को समुद्र किनारे टहलने जाता और इन लहरों को देखता। उसके जीवन में उथल-पुथल मची हुई थी और वह अपने व्यापार में भारी नुकसान के कारण पूरी तरह टूट चुका था। उसने समुद्र की ओर देखकर सोचा कि यह अंतहीन पानी कभी हार नहीं मानता, फिर वह क्यों इतनी जल्दी घबरा गया। उसने अपनी पुरानी गलतियों से सीख लेने का फैसला किया और नए सिरे से शुरुआत करने की योजना बनाई। कुछ महीनों की कड़ी मेहनत के बाद उसका व्यवसाय फिर से पटरी पर लौट आया। आज जब वह समुद्र तट पर खड़ा था, तो उसे लहरों का शोर किसी संगीत जैसा मधुर लग रहा था जिसने उसके जीवन को एक नई दिशा दी थी।