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हाल की खोजें: उदासी आंखें बेवफा
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लोहे की पुरानी अलमारी

शहर के एक कोने में स्थित कबाड़ की दुकान में रखी लोहे की एक बड़ी और पुरानी अलमारी किसी अपने की तलाश में थी। उसकी पपड़ी उखड़ी हुई थी और ताला जंग खा चुका था। रोज़ सुबह दुकानदार उसे बाहर धूप में रखता और शाम को अंदर खींच लेता। एक दिन एक बुजुर्ग अपनी पोती के साथ दुकान पर आए। उन्होंने उस अलमारी को देखते ही पहचान लिया। यह वही अलमारी थी जिसे उन्होंने बरसों पहले अपने पहले घर से विदा करते समय बेच दिया था। बुजुर्ग की आँखों में नमी आ गई और पोती हैरान रह गई। उन्होंने कबाड़ी को पैसे दिए और उसे घर वापस ले जाने का फैसला किया। अलमारी के दरवाज़े की चीखती हुई आवाज़ अब उदासी की नहीं, बल्कि अपनों से मिलने की खुशी की गवाही दे रही थी।

अंधेरे कोने का दिया

दीवाली की रात पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। शहर के सबसे पुराने और वीरान कोने में एक छोटा सा घर था, जहाँ बुजुर्ग दीनानाथ अकेले रहते थे। उनके पास दीये खरीदने के भी पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने घर के कोने में सिर्फ एक पुराना मिट्टी का दीया जला रखा था। रास्ते से गुजरने वाले लोग उस वीरान घर को देखकर आगे बढ़ जाते थे। तभी पड़ोस के कुछ बच्चे हाथों में मिठाइयां और ढेरों दीये लेकर दीनानाथ के दरवाजे पर आ पहुंचे। उन्होंने न केवल उस बुजुर्ग के घर को रोशन किया, बल्कि उनके साथ बैठकर दीवाली की खुशियां भी बांटीं। उस छोटे से दीये की रोशनी अब पूरे घर में फैल चुकी थी और दीनानाथ की उदासी हमेशा के लिए दूर हो गई थी।

रेत पर बने कदमों के निशान

समुद्र के किनारे टहलना रमित को बेहद पसंद था। एक शाम जब वह उदास मन से टहल रहा था, तो उसने देखा कि तेज लहरें उसके पीछे बनते जा रहे कदमों के निशानों को पल भर में मिटा रही हैं। रमित ने गुस्से में रेत पर जोर से पैर पटका और सोचा कि हमारे कर्मों का भी क्या मोल है, जब समय सब कुछ मिटा देता है। तभी एक वृद्ध व्यक्ति उसके पास आए और बोले कि लहरें केवल बाहरी निशान मिटाती हैं, तुम्हारे द्वारा किए गए अच्छे कार्यों की छाप हमेशा के लिए दिलों पर अंकित रहती है। रमित को बात समझ आ गई। उसने अपनी उदासी को पीछे छोड़ा और जरूरतमंदों की मदद करने का संकल्प लिया।

अंधेरे कमरे का असली दीया

एक नगर में एक धनवान व्यापारी रहता था जिसके पास अपार संपत्ति थी, लेकिन उसके घर में हमेशा उदासी छाई रहती थी। एक दिन एक संत उसके घर आए। संत ने व्यापारी को एक छोटा सा मिट्टी का दीया दिया और कहा कि यह साधारण दीया नहीं है, बल्कि यह तुम्हारे घर के सारे अंधकार को मिटा सकता है बशर्ते इसे किसी जरूरतमंद के घर जलाया जाए। व्यापारी ने संत की बात मानी और उस दीये को शहर के एक गरीब अंधे व्यक्ति की झोपड़ी में जला आया। जैसे ही उस गरीब के घर में रोशनी हुई, उसके चेहरे पर जो सच्ची मुस्कान आई, उसे देखकर व्यापारी के मन का अज्ञान रूपी अंधकार भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया। उसे समझ आ गया कि दूसरों के जीवन में खुशियां बांटने से ही असली सुख और आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है।

मिट्टी के दीये और साँझ का पहरा

दीपावली की शाम थी और पूरा गाँव रोशनी से जगमगा रहा था। सुमित अपने हाथों से बनाए मिट्टी के दीये बाज़ार में बेच रहा था, लेकिन उसकी उदासी इस बात से थी कि इस बार एक भी दीया नहीं बिका। तभी वहाँ अनघा आई, जिसने सुमित की आँखों में छिपी निराशा को भांप लिया। उसने बिना मोलभाव किए सारे दीये खरीद लिए और कहा कि असली रोशनी तो कला की कद्र करने में है। अनघा की इस सादगी ने सुमित के वीरान दिल में उम्मीद के कई दीये एक साथ जला दिए। उस शाम से अंधेरा दोनों की जिंदगी से हमेशा के लिए विदा हो गया और एक नया रिश्ता आकार लेने लगा।

दर्द की शाम

सूरज ढलते ही ये दिल उदास हो जाता है, हर एक जख्म फिर से ताजा खास हो जाता है। कोई पूछे तो कह देते हैं सब ठीक है, पर अकेले में हर शख्स बेबस हो जाता है।

रंगों भरा संसार

दुनिया एक खूबसूरत कैनवास की तरह है, इसमें अपने कर्मों के रंग भरते चलो। उदासी को छोड़कर उम्मीद का दामन थामो, यह जीवन एक अनमोल उपहार है।