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कुल 18 परिणाम मिले खोज शब्द: अकेले

पहाड़ की चोटी और संकल्प

रोहन और सोहन दोनों दोस्तों ने हिमालय के एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ने का दृढ़ संकल्प लिया। यात्रा के शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक था, लेकिन जैसे-जैसे वे ऊंचाई पर पहुंचे, ऑक्सीजन की कमी और बर्फीली हवाओं ने उनकी परीक्षा लेनी शुरू कर दी। सोहन ने ठंड और थकान से हार मानकर बीच रास्ते से ही वापस लौटने का फैसला किया। रोहन ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन सोहन नहीं माना। रोहन ने अकेले ही आगे बढ़ने का कठिन निर्णय लिया। हर कदम पर उसका शरीर जवाब दे रहा था, लेकिन उसका मानसिक दृढ़ संकल्प उसे आगे खींच रहा था। आखिरकार, कई दिनों के संघर्ष के बाद रोहन पहाड़ की चोटी पर पहुंच गया। वहां से उसने जो सूर्योदय देखा, उसने उसकी सारी थकान मिटा दी। घर लौटकर उसने पाया कि केवल मजबूत इरादे ही नामुमकिन को मुमकिन बना सकते हैं।
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नदी किनारे की सच्ची सीख

सुमनपुर गाँव के पास एक गहरी और शांत नदी बहती थी। गाँव के सभी लोग अपनी प्यास बुझाने और कपड़े धोने के लिए उसी नदी पर जाते थे। एक बार गाँव में भयंकर सूखा पड़ा, जिससे नदी का पानी सूखने लगा और कुएं भी जवाब देने लगे। ऐसे में गाँव के एक बुजुर्ग ने सभी को समझाया कि अगर हम सब मिलकर एक बड़ा तालाब खोदें, तो आने वाली पीढ़ियों को कभी पानी की कमी नहीं होगी। शुरुआत में कुछ स्वार्थी लोगों ने इस बात का मजाक उड़ाया और अकेले ही पानी खोजने की कोशिश करते रहे। लेकिन बुजुर्ग की बात मानकर युवाओं की एक टोली ने मिलकर दिन-रात मेहनत करके एक विशाल तालाब की खुदाई शुरू कर दी। कुछ ही हफ्तों में जब बारिश की पहली बूंदें गिरीं, तो वह नया तालाब पानी से भर गया। जिन लोगों ने स्वार्थ दिखाया था, उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने सबक सीखा कि एकता और दूरदर्शिता ही समाज को बचा सकती है।
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अंधेरे कमरे में जलता हुआ दीया

एक पुराने खंडहर नुमा घर में एक छोटा सा दीया रहता था जो रोज रात को अपनी रोशनी से उस अंधेरे कोने को रोशन करता था। एक दिन हवा के तेज झोंके ने उससे कहा कि तुम अकेले इस बड़े अंधेरे को कभी हरा नहीं सकते, इसलिए तुम्हें बुझ जाना चाहिए। दीया मुस्कुराया और बोला कि मेरा काम बस जलते रहना है, चाहे अंधेरा कितना भी बड़ा क्यों न हो। उसकी इस जिद्द को देखकर आसपास के अन्य छोटे दीये भी हिम्मत जुटाकर जल उठे और पूरा कमरा रोशनी से जगमगा उठा। छोटी सी कोशिश भी बड़ा बदलाव ला सकती है।
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बंजर ज़मीन पर खिलता गुलाब

शहर से दूर उस धूलभरी बंजर ज़मीन पर कोई भी पेड़ उगने की उम्मीद नहीं करता था, सिवाय आलोक के। आलोक एक ऐसा शख्स था जो असंभव को संभव बनाने की जिद रखता था। रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले वह पानी की दो बाल्टियाँ लेकर वहाँ पहुँच जाता और उस सूखी मिट्टी को सींचता। लोग उसे पागल कहते, पर उसकी आँखों में एक अजीब सा सपना था। एक दिन उस वीरान रास्ते से गुजरते हुए मीरा की नजर उस पर पड़ी। मीरा एक पर्यावरणविद् थी और उसकी आँखों में भी प्रकृति के प्रति वही अगाध प्रेम था। मीरा ने जब आलोक को अकेले मेहनत करते देखा, तो वह खुद को रोक नहीं पाई और उसकी मदद करने के लिए आगे आ गई। शुरुआत में दोनों के बीच सिर्फ काम को लेकर बातें होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे सूखी मिट्टी में पौधे की तरह उनके दिलों में भी भावनाएँ पनपने लगीं। वे दोनों घंटों पौधे लगाने और भविष्य के हरे-भरे जंगलों के सपने देखने लगे। कुछ महीनों की कड़ी मेहनत और दोनों के साझा प्यार का नतीजा यह हुआ कि वह बंजर ज़मीन छोटे-छोटे हरे पौधों से लहलहा उठी। पौधे बड़े हुए और उनमें लाल गुलाब के फूल खिल गए। उस दिन मीरा ने आलोक के हाथ में अपना हाथ रखा और समझ गई कि असली प्यार वही है जो मुश्किलों में भी जीवन सींचना जानता है।
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पुरानी मीनार की सीढ़ियाँ

शहर के बीचों-बीच खड़ी वह पुरानी मीनार पर्यटकों के लिए सिर्फ एक खंडहर थी, पर कबीर और मीरा के लिए वह उनका निजी इतिहास थी। कबीर हर इतवार को वहाँ अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करने आता और मीरा शहर के इतिहास पर शोध करने। एक दिन अचानक हुई बारिश से बचने के लिए दोनों एक ही मेहराब के नीचे आ गए। बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि इतिहास के पन्ने कब इश्क में बदल गए, किसी को पता ही नहीं चला। जब मीनार की घंटी ने शाम ढलने का ऐलान किया, तो दोनों समझ चुके थे कि उनका सफर अब अकेले का नहीं रहा।
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संगीत की सरगम

कबीर को शास्त्रीय संगीत से बेहद लगाव था और वह हर शाम पार्क में अकेले बैठकर बांसुरी बजाया करता था। एक दिन उसने महसूस किया कि कोई और भी उसके सुरों में अपनी गिटार की धुन मिला रहा है। पलटकर देखा तो सामने सिमरन खड़ी थी, जिसकी आँखों में संगीत के प्रति वही गहरा जुनून था जो कबीर के भीतर था। दोनों ने कभी एक दूसरे से अपने नाम नहीं पूछे थे, बस उनकी धुनें ही उनका परिचय बन गई थीं। समय बीतता गया और उनके साज़ आपस में इस कदर घुलमिल गए कि दो अलग-अलग धुनें अब एक ही सुर में ढल चुकी थीं, जो जीवनभर का साथ बन गया।
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