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रेलवे स्टेशन की बेंच

व्यस्त रेलवे स्टेशन की एक ठंडी लोहे की बेंच पर पिछले दो घंटे से एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी डायरी में कुछ लिख रहा था। चारों ओर यात्रियों की भारी भीड़ थी, ट्रेनें आ-जा रही थीं और लाउडस्पीकर की आवाज गूँज रही थी। उसी बेंच के दूसरे कोने पर एक छोटा बच्चा अपनी माँ का हाथ पकड़कर उदास बैठा था क्योंकि उसकी पसंदीदा गेंद पटरी पर गिरकर खो गई थी। बूढ़े व्यक्ति ने लिखना बंद किया, अपनी जेब से एक नई चमकीली गेंद निकाली और मुस्कुराते हुए बच्चे की ओर बढ़ा दी। बच्चे का चेहरा खुशी से खिल उठा और उसने झटपट उसे गले लगा लिया। उस एक छोटी सी मुस्कान और मासूमियत ने रेलवे स्टेशन के उस थकान भरे माहौल को पलभर में एक खूबसूरत और जीवंत पलों में बदल दिया।

गाँव की धूल भरी सड़क पर कदम

शहर की चकाचौंध से थक कर सोहन पंद्रह साल बाद अपने पैतृक गाँव लौटा था। कंक्रीट के जंगलों में भागते-भागते वह अपनी जड़ों को भूल चुका था। जैसे ही उसने गाँव की सीमा में कदम रखा, वही पुरानी सोंधी मिट्टी की महक और दूर खेतों से आती बांसुरी की धुन ने उसका स्वागत किया। उसे डर था कि शायद अब उसे कोई पहचानेगा भी नहीं। लेकिन तभी पेड़ की छांव में बैठे ताऊजी ने उसे दूर से ही पहचान लिया और दौड़कर गले लगा लिया। गाँव के लोगों का वह अपनापन देखकर सोहन की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि दुनिया चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, असली सुकून अपने लोगों के बीच और अपनी मातृभूमि की गोद में ही मिलता है। उस शाम उसने चैन की सांस ली और शहर वापस जाने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया।

अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।

खोई हुई चाबी और नया दरवाज़ा

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक बढ़ई रहता था। वह अपनी पुरानी कार्यशैली से तंग आ चुका था क्योंकि लोग अब आधुनिक डिज़ाइन पसंद करने लगे थे। सोहन को लगा कि उसकी कला का अंत आ गया है और उसने अपनी दुकान की चाबी एक पुराने संदूक में हमेशा के लिए बंद कर दी। कुछ दिनों तक वह निराश बैठा रहा, लेकिन फिर उसने सोचा कि क्यों न समय के साथ बदला जाए। उसने आधुनिक औजार चलाना सीखा और नए जमाने के फर्नीचर बनाने का अभ्यास शुरू किया। कुछ ही महीनों में उसकी मेहनत रंग लाई और उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ फिर से जुटने लगी। सोहन समझ गया कि पुरानी चाबी खोने से दरवाजे बंद नहीं होते, बल्कि नए दरवाजों की तलाश शुरू होती है। असफलता केवल एक पड़ाव है, अंत नहीं।

रेलवे स्टेशन का आखिरी डिब्बा

सांध्यकालीन वेला में जब स्टेशन पर एक्सप्रेस ट्रेन की सीटी गूंजी, तो राधिका की धड़कनें तेज हो गईं। वह पिछले पाँच सालों से इस प्लेटफार्म पर कबीर का इंतज़ार कर रही थी। कबीर एक चित्रकार था जो कला की तलाश में शहर छोड़कर किसी दूर पहाड़ी वादी में बस गया था। दोनों के बीच कभी कोई वादा नहीं हुआ था, बस एक मौन समझौता था कि एक दिन सफर यहीं आकर थमेगा। ट्रेन रुकी और भीड़ के बीच से एक शख्स बाहर निकला, जिसके कंधे पर वही पुराना भूरा झोला था। कबीर ने जब राधिका को देखा, तो उसके चेहरे पर बरसों पुरानी थकान एक पल में गायब हो गई। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी डायरी निकाली, जिसके पन्नों पर राधिका के अनदेखे चित्र उकेरे हुए थे। उस शाम हवा में पुरानी यादों की महक थी और दोनों की नम आँखें बिना कुछ कहे सब कुछ कह रही थीं। जीवन के इस सफर में अब कोई बिछड़ने का डर नहीं बचा था, क्योंकि मंजिल खुद उनके सामने आकर खड़ी हो गई थी।

रेलवे ट्रैक और तुम्हारी हँसी

स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा से भीड़भाड़ वाला था, लेकिन मेरे लिए वहाँ केवल एक ही आवाज़ गूँजती थी - तुम्हारी हँसी। ट्रेन आने में अभी एक घंटा बाकी था और हम दोनों प्लेटफॉर्म की आखिरी बेंच पर बैठकर भविष्य के सपने बुन रहे थे। तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में था और मुझे लग रहा था कि यह ट्रैक कभी खत्म न हो। आज जब भी इस स्टेशन से गुजरता हूँ, वह हँसी हवा में तैरती हुई मुझे आज भी थाम लेती है।

रंगों का बंधन

होस्टेल के उस कमरे में रंगों की खुशबू फैली हुई थी और हर तरफ गुलाल बिखरा हुआ था। अनमोल इस बात से डरता था कि कोई उसके करीब आकर उसे रंग न लगा दे, क्योंकि वह भीड़ से दूर रहना पसंद करता था। तभी नयना हाथ में नीले और गुलाबी रंग की थाली लेकर तेजी से कमरे में घुसी और सीधे अनमोल के गालों पर रंग मल दिया। अनमोल ने चौंककर देखा तो सामने नयना की खिलखिलाती हुई हँसी थी, जिसमें किसी प्रकार का कोई छल नहीं था। उस दिन रंगों की आड़ में अनमोल के दिल की वो हिचक हमेशा के लिए खत्म हो गई जो वह वर्षों से छुपाए बैठा था। होली के उस जीवंत उत्सव ने दोनों की दुनिया को एक नए और रंगीन रिश्ते में पिरो दिया, जो सातों जन्मों तक रहने का वादा कर गया।

शाम की चौखट

सूरज ढल रहा था और पुरानी हवेली के सामने वाली चाय की दुकान पर लोगों की भीड़ कम हो रही थी। कबीर हर शाम अपनी साइकिल वहीं रोकता था क्योंकि उसे पता था कि उस वक्त शिखा अपनी बालकनी से पौधे को पानी देने जरूर आएगी। दोनों के बीच सिर्फ नजरों का संवाद होता था, जो शब्दों से कहीं ज्यादा बयां कर देता था। एक दिन हवा इतनी तेज चली कि शिखा के हाथ से गमला छूटकर नीचे गिरने ही वाला था कि कबीर ने फुर्ती से आगे बढ़कर उसे थाम लिया। उस मामूली सी घटना ने दोनों के बीच के सारे संकोच को तोड़ दिया और पहली बार उनके बीच सीधी बातचीत हुई। ढलते सूरज की रोशनी में दोनों ने महसूस किया कि उनका यह मौन प्यार अब एक मुखर हकीकत बन चुका था।

रेलवे स्टेशन का आखिरी बेंच

शहर के मुख्य रेलवे स्टेशन के आखिरी बेंच पर हर शाम रोहन अपनी ट्रेन का इंतज़ार करता था, हालांकि उसे कहीं जाना नहीं होता था। यह वह जगह थी जहाँ एक साल पहले उसकी मुलाक़ात सिमरन से हुई थी। सिमरन अपने सपनों की तलाश में दूसरे शहर जा रही थी और उस छोटे से पल ने रोहन की पूरी दुनिया बदल दी थी। दोनों ने वादा किया था कि वे हर परिस्थिति में जुड़े रहेंगे। महीनों तक खतों और संदेशों का सिलसिला चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे दूरियां बढ़ती गईं और संवाद कम होने लगे। रोहन को लगा कि शायद सब खत्म हो चुका है और सिमरन उसे भूल चुकी है। लेकिन आज जब उसने उसी बेंच पर बैठकर उदास होना चाहा, तो किसी ने पीछे से उसकी आँखों को अपने हाथों से ढक लिया। वह खुशबू सिमरन की थी। सिमरन ने अपनी नौकरी छोड़कर हमेशा के लिए वापस लौटने का फैसला कर लिया था। उस शाम स्टेशन की भीड़भाड़ में दोनों की खामोश आँखें सब कुछ कह गईं और अधूरा लगने वाला किस्सा एक खूबसूरत शुरुआत में बदल गया।

घड़ी की टिक-टिक

रेलवे स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा की तरह भीड़भाड़ से भरा हुआ था। आलोक की ट्रेन छूटने में बस कुछ ही मिनट बाकी थे और स्नेहा अपनी भावनाओं को आंसुओं में छिपाने की कोशिश कर रही थी। दोनों ने कभी अपने दिल की बात एक-दूसरे को नहीं बताई थी, और आज विदाई का वक्त आ चुका था। ट्रेन ने सीटी बजाई और पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे। तभी आलोक ने खिड़की से झुककर अपना हाथ बढ़ाया और स्नेहा के हाथ में एक छोटी सी घड़ी रख दी जिस पर लिखा था कि वक्त कभी भी हमें अलग नहीं कर सकता। स्नेहा मुस्कुराई और समझ गई कि शब्दों के बिना भी प्यार का इजहार मुमकिन है।

खुद की पहचान

भीड़ का हिस्सा बनना हमारी आदत में नहीं, हम अकेले ही काफी हैं महफिल की शान बढ़ाने के लिए। लोग नाम याद रखते हैं, हम सीधे दिल पर राज करते हैं।