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घड़ी की टिक-टिक

घड़ी की टिक-टिक

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रेलवे स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा की तरह भीड़भाड़ से भरा हुआ था। आलोक की ट्रेन छूटने में बस कुछ ही मिनट बाकी थे और स्नेहा अपनी भावनाओं को आंसुओं में छिपाने की कोशिश कर रही थी। दोनों ने कभी अपने दिल की बात एक-दूसरे को नहीं बताई थी, और आज विदाई का वक्त आ चुका था। ट्रेन ने सीटी बजाई और पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे। तभी आलोक ने खिड़की से झुककर अपना हाथ बढ़ाया और स्नेहा के हाथ में एक छोटी सी घड़ी रख दी जिस पर लिखा था कि वक्त कभी भी हमें अलग नहीं कर सकता। स्नेहा मुस्कुराई और समझ गई कि शब्दों के बिना भी प्यार का इजहार मुमकिन है।
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