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रेत के टीले पर उगता विश्वास

एक समय की बात है, राजस्थान के एक सूखे और बंजर इलाके में सोहन नाम का एक किसान रहता था। वहाँ पानी की भारी कमी थी और चारों तरफ केवल रेत के ऊँचे टीले दिखाई देते थे। लोग मानते थे कि उस बंजर जमीन पर कुछ भी नहीं उगाया जा सकता। सभी किसानों ने हार मानकर उस जगह को छोड़ना शुरू कर दिया था। लेकिन सोहन के मन में कुछ अलग ही करने की जिद्द थी। उसने अपने बुजुर्गों से सुनी हुई कहानियों पर भरोसा किया कि जमीन के भीतर कहीं न कहीं मीठे पानी का स्रोत छिपा हुआ है। उसने बिना किसी की परवाह किए अपने बलबूते पर कुआं खोदना शुरू किया। दिन-रात उसकी मेहनत जारी रही, धूप की तपिश ने उसकी खाल झुलसा दी थी पर उसने काम नहीं रोका। महीने बीत गए और एक दिन अचानक उसके फावड़े से पानी की नमी टकराई। थोड़ी ही देर में वहाँ ठंडे और मीठे पानी का सोता फूट पड़ा। उस एक बूंद ने न केवल उस बंजर जमीन को हरा-भरा कर दिया, बल्कि आसपास के सभी लोगों को यह सिखा दिया कि अगर पक्का इरादा हो, तो सूखी रेत से भी पानी निकाला जा सकता है।

पेड़ के सूखे पत्ते और नई कोपलें

एक पुराने बरगद के पेड़ पर जब पतझड़ आया, तो उसके सारे पुराने पत्ते पीले पड़कर ज़मीन पर बिखर गए। पेड़ एकदम सूना और बेजान सा दिखने लगा। आसपास के छोटे पौधे उस पर हंसने लगे कि अब इस पेड़ का अंत नजदीक है और यह कभी हरा-भरा नहीं हो पाएगा। लेकिन उस पुराने पेड़ को अपने जड़ों की ताकत पर पूरा भरोसा था। उसने चुपचाप उस कठिन मौसम को सहन किया और अंदर ही अंदर अपनी ऊर्जा को संचित करता रहा। जब वसंत ऋतु आई, तो उसी ठूंठ जैसे तने से नई, हरी-भरी और कोमल कोपलें फूट पड़ीं। कुछ ही दिनों में वह पेड़ फिर से अपने पूरे वैभव के साथ खड़ा हो गया। जीवन का पतझड़ भी ऐसा ही होता है, जो पुरानी कमियों को गिराकर नई शुरुआत का अवसर देता है।

लोभी चरवाहा और जादुई पत्थर

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक चरवाहा रहता था। वह अपनी भेड़ों को चराने के लिए प्रतिदिन दूर जंगल में जाया करता था। एक दिन, उसे जंगल में एक चमकता हुआ पत्थर मिला जिसके बारे में मान्यता थी कि वह इच्छाएं पूरी कर सकता है। सोहन ने उस पत्थर से अपार धन और महल की मांग की। रातोंरात उसका जीवन बदल गया और वह बहुत अमीर बन गया। उसके पास सब कुछ था, लेकिन उसका लालच दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया। वह अपने पुराने मित्रों और परिवार से दूर हो गया और किसी पर भरोसा नहीं करता था। धीरे-धीरे उसका अहंकार और लोभ इतना बढ़ गया कि उसने गरीबों की मदद करना बिल्कुल बंद कर दिया। एक दिन अचानक एक बड़ी आपदा आई और उसका सारा वैभव एक ही झटके में नष्ट हो गया। महल ढह गया और धन भी समाप्त हो गया। तब सोहन को समझ आया कि अत्यधिक लालच हमेशा बर्बादी का कारण बनता है। वह अपनी गलतियों पर बहुत पछताया और उसने दोबारा मेहनत से ईमानदारी का जीवन जीने का संकल्प लिया। अंततः उसने सीखा कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है और सादा जीवन ही वास्तविक सुख देता है।

रेलवे ट्रैक के पास की चाय

छोटे से स्टेशन की उस छोटी सी टपरी पर मिलने वाली अदरक वाली चाय के स्वाद में कुछ तो खास बात थी, या शायद वह जादू कबीर और सिमरन की मुलाकातों का था। हर शाम ठीक पांच बजे ट्रेन गुजरने से पहले वे दोनों वहीं मिलते। कबीर अपनी डायरी में कुछ लिखता और सिमरन रेलवे ट्रैक के उस पार डूबते सूरज को देखती। एक दिन सिमरन ने बिना बताए जाने का फैसला किया क्योंकि उसका ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया था। आखिरी शाम उसने कबीर को चाय का कप देते हुए अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश की। कबीर ने उसका हाथ थामा और कहा कि दूरी चाहे जितनी हो, चाय की खुशबू उन्हें हमेशा जोड़े रखेगी। ट्रेन की सीटी बजी और दोनों की आंखें नम हो गईं, पर भरोसा मजबूत रहा।

कागजी कश्ती

भावनाओं के समंदर में एक कश्ती उतारी थी,
जिसे सिर्फ भरोसे की हवाओं का सहारा था।
मगर एक ही झटके में सब तबाह हो गया,
वो किनारा भी आज हमें पराया लगा।

टूटा विश्वास

भरोसे की नींव पर जो आशियाना बनाया था, एक ही झटके में वो सब ढह गया। हमने तो हर पल चाहा था भला जिसका, वही शख्स आज हमें रुला कर गया।

अपने पंख

हवाओं के भरोसे मत उड़ो, अपने पंखों की ताकत पर भरोसा रखो। मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके हौसलों में जान होती है।

किस्मत का खेल

किस्मत के भरोसे बैठने वाले हाथ मलते रह जाते हैं, जो खुद पर भरोसा करते हैं वे इतिहास रच जाते हैं। मेहनत का सिक्का हर जगह चलता है, इसे आजमाने से पीछे मत हट।