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अनंत क्षितिज की ओर

एक छोटे से गाँव में मदन नाम का एक युवक रहता था, जिसे पेंटिंग का बहुत शौक था। उसके पास महंगे रंग खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वह प्राकृतिक रंगों जैसे हल्दी, कोयला और फूलों के रस से चित्र बनाता था। गाँव के लोग उसका मखौल उड़ाते थे कि इन साधारण चीज़ों से कभी कोई महान कलाकार नहीं बन सकता। मदन किसी की बात पर ध्यान दिए बिना अपनी कला में लीन रहता था। एक दिन, शहर से एक प्रसिद्ध कला पारखी उस गाँव से गुजरे और मदन की एक झोपड़ी की दीवार पर बनी पेंटिंग को देखा। वह उसकी सृजनात्मकता और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मदन को शहर की एक बड़ी प्रदर्शनी में अपनी कला दिखाने का मौका दिया। वह मोड़ मदन के जीवन का सबसे बड़ा बदलाव साबित हुआ, जहाँ उसकी साधारण सी कला को पूरी दुनिया ने सराहा।

पुरानी खिड़की

दादी जी के कमरे की वह पुरानी लकड़ी की खिड़की सालों से बंद पड़ी थी क्योंकि उसका पल्ला जाम हो चुका था। आज पोते ने हिम्मत करके उसे खोलने की सोची। जैसे ही खिड़की खुली, बाहर का भूला-बिसरा नज़ारा सामने आ गया। सामने वाला आंगन अब एक सुंदर बगीचे में बदल चुका था जहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। दादी जी की नम आँखें उस बदलाव को देखकर चमक उठीं। उन्हें एहसास हुआ कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, बदलाव हमेशा जीवन में नई सुंदरता और उम्मीद लेकर आता है, बस उसे देखने का नजरिया चाहिए।

बंजर ज़मीन और उम्मीद का बीज

गांव के पास फैली वह बंजर जमीन किसी के काम नहीं आती थी। सब लोग कहते थे कि यहाँ कभी कुछ नहीं उग सकता। पर मोहन ने ठान लिया था कि वह इस जमीन को हरा-भरा करके दिखाएगा। उसने दिन-रात एक करके कुआं खोदा और पौधे लगाए। महीनों तक पानी सींचने के बाद भी जब कोई बदलाव नहीं दिखा, तो गाँव वाले उसका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन एक दिन अचानक नन्हे पत्तों ने जमीन को चीरकर बाहर झांका। मोहन की मेहनत रंग लाई थी और वह बंजर ज़मीन अब लहलहाते खेतों में बदल चुकी थी, जो सबको विश्वास का पाठ पढ़ा रही थी।

खिड़की पर बैठा परिंदा

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अलोक अपने काम में इतना उलझ चुका था कि उसे प्रकृति की खूबसूरती देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। पिछले कुछ दिनों से उसकी दफ्तर वाली खिड़की के पास एक घायल कबूतर आकर बैठ जाता था। शुरुआत में अलोक ने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी बेबस आँखें देखकर अलोक का दिल पिघल गया। वह रोज सुबह उस परिंदे के लिए दाना और पानी रखने लगा। धीरे-धीरे उस परिंदे के पंख ठीक होने लगे और वह थोड़ी देर उड़कर वापस उसी खिड़की पर आने लगा। इस रोजमर्रा के सिलसिले ने अलोक के अकेलेपन को पूरी तरह से मिटा दिया। उसे महसूस हुआ कि यह बेजुबान परिंदा उसे यह सिखाने आया था कि जिंदगी सिर्फ काम का नाम नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे जीवों की देखभाल करने में ही असली सुकून छुपा हुआ है।

लोहे की पुरानी जंजीर

एक पुराने कारखाने के कोने में लोहे की एक भारी और जंग लगी जंजीर पड़ी थी, जिसे सबने बेकार मानकर छोड़ दिया था। एक दिन एक नया वेल्डर उस कारखाने में आया और उसने उस जंग लगी जंजीर को देखकर एक नया सपना देखा। उसने उसे पिघलाया, साफ किया और उससे एक मजबूत और सुंदर गेट के लिए कलात्मक डिजाइन तैयार कर दिया। जो जंजीर कल तक कचरे का ढेर लग रही थी, वह अब कारखाने की शान बन चुकी थी। इस बदलाव ने वहाँ काम करने वाले सभी मजदूरों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि पुरानी परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, यदि सुधारने का इरादा पक्का हो तो कुछ भी नया और बेहतर बनाया जा सकता है।

खोई हुई चाबी और नया दरवाज़ा

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक बढ़ई रहता था। वह अपनी पुरानी कार्यशैली से तंग आ चुका था क्योंकि लोग अब आधुनिक डिज़ाइन पसंद करने लगे थे। सोहन को लगा कि उसकी कला का अंत आ गया है और उसने अपनी दुकान की चाबी एक पुराने संदूक में हमेशा के लिए बंद कर दी। कुछ दिनों तक वह निराश बैठा रहा, लेकिन फिर उसने सोचा कि क्यों न समय के साथ बदला जाए। उसने आधुनिक औजार चलाना सीखा और नए जमाने के फर्नीचर बनाने का अभ्यास शुरू किया। कुछ ही महीनों में उसकी मेहनत रंग लाई और उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ फिर से जुटने लगी। सोहन समझ गया कि पुरानी चाबी खोने से दरवाजे बंद नहीं होते, बल्कि नए दरवाजों की तलाश शुरू होती है। असफलता केवल एक पड़ाव है, अंत नहीं।

अंधेरे में जलता दीपक

घने जंगल के बीच एक छोटी सी कुटिया में एक संत रहते थे। उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। एक शाम एक अहंकारी विद्वान उनके पास आया और व्यंग्य से पूछा कि आपके इस छोटे से दीपक से इस विशाल जंगल का अंधेरा कैसे दूर हो सकता है। संत ने बिना किसी क्रोध के बड़े शांत भाव से उत्तर दिया कि यह दीपक पूरे जंगल का अंधेरा भले ही न मिटा पाए, लेकिन यह मेरे आसपास के रास्ते को तो रोशन कर ही रहा है, जिससे मैं ठोकर खाने से बच जाता हूं। विद्वान संत का यह उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। हमें दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने हिस्से का प्रकाश खुद फैलाना चाहिए, तभी समाज में वास्तविक बदलाव संभव हो पाता है।

अंधेरे में जलती मशाल

एक दूरदराज के पहाड़ी इलाके में बिजली की कोई सुविधा नहीं थी। सर्दियों की एक ठंडी रात में गाँव के सभी लोग एक बड़े कमरे में जमा हुए और इस बात पर चर्चा करने लगे कि इस अंधेरे से कैसे निपटा जाए। सभी अपनी-अपनी समस्याओं का रोना रो रहे थे कि तभी एक छोटा लड़का अपने हाथ में एक छोटी सी मोमबत्ती लेकर आगे आया। उसने कहा कि दूसरों को कोसने से बेहतर है कि हम खुद एक छोटा सा दिया जलाएं। लोगों ने उसकी बात पर पहले तो हंसी उड़ाई, लेकिन जब उसने अपनी मोमबत्ती से एक बड़ा लालटेन जलाया और उससे पूरे कमरे में रोशनी फैल गई, तो सबकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उस लड़के ने सभी को सिखाया कि संकट के समय केवल शिकायत करने से कुछ नहीं होता, बल्कि अपनी क्षमतानुसार छोटा सा प्रयास भी बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकता है।

नन्ही चिड़िया और विशाल पर्वत

एक विशाल पर्वत की चोटी पर एक बहुत बड़ा पत्थर गिरने वाला था, जिससे नीचे बसा पूरा गाँव खतरे में था। सभी बड़े जानवर और पक्षी डरकर भाग गए, लेकिन एक नन्ही सी चिड़िया ने उस भारी संकट को टालने का बीड़ा उठाया। उसने अपनी चोंच में पानी की एक-एक बूंद भरकर पर्वत की दरारों में डालनी शुरू की ताकि कड़ाके की ठंड में पानी जमकर चट्टान को रोक सके। बाकी सब उसका मजाक उड़ा रहे थे कि इतनी छोटी सी कोशिश से क्या होगा। लेकिन चिड़िया बिना रुके लगातार जुटी रही। उसकी इस अदम्य निष्ठा और निरंतर प्रयास को देखकर मौसम ने भी साथ दिया और पानी बर्फ बनकर दरार में जम गया, जिससे पत्थर का खिसकना रुक गया। छोटी सी चिड़िया ने साबित कर दिया कि यदि हौसला बुलंद हो, तो छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

अंधेरे कमरे में जलता हुआ दीया

एक पुराने खंडहर नुमा घर में एक छोटा सा दीया रहता था जो रोज रात को अपनी रोशनी से उस अंधेरे कोने को रोशन करता था। एक दिन हवा के तेज झोंके ने उससे कहा कि तुम अकेले इस बड़े अंधेरे को कभी हरा नहीं सकते, इसलिए तुम्हें बुझ जाना चाहिए। दीया मुस्कुराया और बोला कि मेरा काम बस जलते रहना है, चाहे अंधेरा कितना भी बड़ा क्यों न हो। उसकी इस जिद्द को देखकर आसपास के अन्य छोटे दीये भी हिम्मत जुटाकर जल उठे और पूरा कमरा रोशनी से जगमगा उठा। छोटी सी कोशिश भी बड़ा बदलाव ला सकती है।

लालच का अंतिम् परिणाम

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह अपनी मेहनत से जो भी कमाता था, उससे संतुष्ट रहता था। एक दिन उसे खेत में काम करते समय एक चमकीला पत्थर मिला, जो कोई साधारण पत्थर नहीं बल्कि एक जादुई मणिका था। सोहन उस मणिका को पाकर बहुत अमीर बनने के सपने देखने लगा। उसने दूसरों की मदद करना छोड़ दिया और सिर्फ और सिर्फ धन जमा करने की धुन में लग गया। धीरे-धीरे उसका स्वभाव पूरी तरह बदल गया और वह अपनों से भी दूर हो गया। एक दिन वह मणिका अचानक गायब हो गई और सोहन के पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचा। उसे समझ आ गया कि जो लोग लालच के रास्ते पर चलते हैं, वे अंत में सब कुछ खो देते हैं।