#भावनात्मक कहानी
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बंजर ज़मीन और उम्मीद का बीज
“
गांव के पास फैली वह बंजर जमीन किसी के काम नहीं आती थी। सब लोग कहते थे कि यहाँ कभी कुछ नहीं उग सकता। पर मोहन ने ठान लिया था कि वह इस जमीन को हरा-भरा करके दिखाएगा। उसने दिन-रात एक करके कुआं खोदा और पौधे लगाए। महीनों तक पानी सींचने के बाद भी जब कोई बदलाव नहीं दिखा, तो गाँव वाले उसका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन एक दिन अचानक नन्हे पत्तों ने जमीन को चीरकर बाहर झांका। मोहन की मेहनत रंग लाई थी और वह बंजर ज़मीन अब लहलहाते खेतों में बदल चुकी थी, जो सबको विश्वास का पाठ पढ़ा रही थी।
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