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पुरानी खिड़की

पुरानी खिड़की

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दादी जी के कमरे की वह पुरानी लकड़ी की खिड़की सालों से बंद पड़ी थी क्योंकि उसका पल्ला जाम हो चुका था। आज पोते ने हिम्मत करके उसे खोलने की सोची। जैसे ही खिड़की खुली, बाहर का भूला-बिसरा नज़ारा सामने आ गया। सामने वाला आंगन अब एक सुंदर बगीचे में बदल चुका था जहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। दादी जी की नम आँखें उस बदलाव को देखकर चमक उठीं। उन्हें एहसास हुआ कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, बदलाव हमेशा जीवन में नई सुंदरता और उम्मीद लेकर आता है, बस उसे देखने का नजरिया चाहिए।
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शहर के पुराने लोहे के पुल पर हर शाम एक बूढ़ा संगीतकार अपने फटे पुराने हारमोनियम के साथ आकर बैठ जाता था। उसके सुरों में एक ऐसा जादू था जो राह चलते लोगों के कदम रोक लेता था। उस शाम आसमान में काले बादल घिरे थे और तेज ठंडी हवा चल रही थी। संगीतकार की उंगलियां ठंड से कांप रही थीं, फिर भी उसने अपना वाद्य यंत्र नहीं छोड़ा। तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और उसने अपनी गुल्लक से निकाले गए कुछ सिक्के संगीतकार की झोली में डाल दिए। बच्चे की आंखों में एक अनोखी चमक थी जो संगीतकार के सूनेपन को चीर गई। उस पल बूढ़े कलाकार को ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी बरसों की साधना सफल हो गई हो। उसने अपनी आंखें बंद कीं और पुल के सन्नाटे में एक नया, जीवंत राग छेड़ दिया, जिसने उस सर्द शाम को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

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बगिया का आखिरी फूल

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