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कागज का हवाई जहाज

बचपन के दिनों में रोहन और सोहन पन्ने फाड़कर खूबसूरत कागज के हवाई जहाज बनाते थे और उन्हें छत से आसमान की तरफ उड़ाते थे। दोनों ने मिलकर यह सपना देखा था कि वे बड़े होकर एक दिन सचमुच के विमान के पायलट बनेंगे। वक्त का पहिया घूमा और रोहन एक व्यस्त कॉर्पोरेट दफ्तर में कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने उलझ कर रह गया, जबकि सोहन का सपना अधूरा ही छूट गया। एक दिन सफाई करते समय रोहन के हाथ धूल से सना हुआ वही पुराना कागज का जहाज लगा, जिसे उन्होंने बचपन में साथ मिलकर बनाया था। उस कागज के टुकड़े को देखते ही रोहन को अपनी असली मंजिल और बचपन का वो बेफिक्र उत्साह याद आ गया। उसने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और अपने सपनों को नई उड़ान देने के लिए विमानन क्षेत्र की ओर कदम बढ़ा दिए।

स्टेशन की बेंच पर भूला हुआ छाता

बारिश की वह मूसलाधार शाम किसी को भी घरों में दुबकने पर मजबूर कर रही थी, सिवाय कबीर के जो आखिरी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। स्टेशन का वह पुराना शेड पानी की बौछार से पूरी तरह सुरक्षित नहीं था, फिर भी कबीर अपनी किताब में खोया हुआ था। तभी वहाँ एक लड़की आई, जिसके हाथ में एक नीला छाता था और चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री। उसने बिना कुछ कहे कबीर के पास वाली बेंच पर जगह ली और अपना गीला बैग ठीक करने लगी। ट्रेन आने में अभी एक घंटा बाकी था और दोनों के बीच चुप्पी पसरी हुई थी। अचानक जब ट्रेन की सिटी बजी, तो हड़बड़ी में लड़की अपना वही नीला छाता वहीं बेंच पर भूला कर डिब्बे में चढ़ गई। कबीर ने छाता उठाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन चल पड़ी थी। अगले दिन कबीर उसी समय उसी बेंच पर बैठा था, शायद इस उम्मीद में कि वह लड़की अपना छाता लेने जरूर आएगी। और वाकई, थोड़ी देर बाद वही लड़की परेशान सी स्टेशन पर नजर आई। जब कबीर ने मुस्कुराते हुए उसे उसका छाता वापस किया, तो उसकी आँखों में जो राहत और चमक थी, उसने कबीर के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। उस एक छाते ने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक अटूट रिश्ते में बांध दिया, जो बारिश की हर बूंद के साथ और गहरा होता चला गया।

पुरानी हवेली की खिड़की

गाँव के छोर पर स्थित वह पुरानी हवेली सदियों पुरानी कहानियों की गवाह थी। कोई वहां जाने की हिम्मत नहीं करता था, सिवाय अक्षित के, जो उस हवेली के जीर्णोद्धार का काम संभाल रहा था। एक दिन काम के दौरान उसे धूल से सनी एक पुरानी डायरी मिली, जिसके पन्नों पर अंजलि नाम की किसी लड़की के खूबसूरत खत लिखे थे। वे खत आज से पचास साल पुराने थे, जो किसी ऐसे शख्स के लिए थे जो कभी उन तक पहुँच ही नहीं पाया। अक्षित उन खतों के शब्दों में इस तरह खो गया कि उसे हवेली से ज्यादा उन भावनाओं की फिक्र होने लगी। तभी एक दिन एक वृद्ध महिला अपनी पोती नैना के साथ उस हवेली को देखने आईं। वह महिला कोई और नहीं बल्कि उसी अंजलि की बेटी थीं, जो अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने आई थीं। नैना और अक्षित जब मिले, तो दोनों को लगा कि वे सदियों से एक-दूसरे को जानते हैं। अतीत के उन पन्नों ने वर्तमान में दो अजनबी दिलों को हमेशा के लिए एक अटूट बंधन में बांध दिया।

रौशन सवेरा

रात कितनी भी लंबी हो, सुबह जरूर आती है,
हर नई किरण एक नई उम्मीद जगा जाती है।
छोड़ दो कल की फिक्र मेरे नादान दोस्त,
आज की यह सुबह नई सफलता लाती है।

बेफिक्र लम्हे

चलो फिर से वही पुराना दौर लाते हैं, बैठकर यार सब मिलकर मुस्कुराते हैं। दुनिया की फिक्र को छोड़ो एक तरफ, आज फिर से बचपन की यादें दोहराते हैं।