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कुल 5 परिणाम मिले खोज शब्द: खजाना

गुमशुदा चाबी

रमेश बाबू पिछले दस साल से अपनी पुरानी अलमारी की चाबी तलाश रहे थे। हर कोने को छान मारा, लेकिन चाबी का कहीं अता-पता नहीं था। उस अलमारी में उनके बचपन की यादें और कुछ खास दस्तावेज बंद थे। आज जब वे घर की सफाई कर रहे थे, तो अचानक रसोई के एक पुराने डिब्बे से वह जंक लगी चाबी हाथ लग गई। उनके चेहरे पर खुशी की एक चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अलमारी की तरफ कदम बढ़ाया और ताले में चाबी घुमाई। ताला खुल गया और बरसों पुरानी धूल उड़ने लगी। लेकिन जब उन्होंने भीतर झांका, तो उनका दिल बैठ गया। समय के दीमक ने सब कुछ कागजों को कुतर डाला था। जो खजाना वे सहेज कर रखना चाहते थे, वह अब सिर्फ राख और टुकड़ों में बदल चुका था। रमेश बाबू समझ गए कि कुछ चीजें खो जाने के बाद दोबारा मिलने पर भी उनका कोई अर्थ नहीं बचता।
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लोहे का संदूक

गाँव के एक पुराने मकान के कोने में धूल फाँकता लोहे का एक भारी संदूक रखा था। रमेशन दादा ने कई दशकों से उसे नहीं खोला था। सब यही मानते थे कि उसमें केवल पुराने कागजात और बेकार का सामान भरा होगा। एक दिन जब घर की मरम्मत का काम शुरू हुआ, तो उस संदूक को हटाना जरूरी हो गया। रमेश ने जब संदूक की जंक लगी चाबी ताले में घुमाई, तो वह अजीब सी आवाज के साथ खुल गया। अंदर कोई खजाना नहीं था, बल्कि बचपन के कुछ धुंधले खिलौने, एक टूटी हुई बाँसुरी और उसकी दिवंगत माँ के हाथ की सिली हुई कुछ सुंदर पोटलियाँ थीं। उन चीजों को देखते ही रमेश के मन में बरसों पुरानी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा। वह समझ गया कि असली दौलत सोने-चांदी में नहीं, बल्कि अपनों के छोड़े गए स्पर्श में होती है।
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बंद बक्से का राज़

अमित को उसके दादाजी की अटारी से एक लोहे का पुराना बक्सा मिला था। बक्से पर कई ताले लगे थे और उस पर चेतावनी खुदी थी कि इसे कभी न खोला जाए। जिज्ञासा के वश में आकर अमित ने एक रात लोहे की रॉड से बक्से का मुख्य ताला तोड़ दिया। जैसे ही ढक्कन उठा, उसमें से एक ठंडी और सड़ी हुई हवा का झोंका निकला, जिसके साथ बच्चों के रोने की बहुत ही धीमी आवाज़ें आ रही थीं। बक्से के अंदर कोई खजाना नहीं था, बल्कि एक पुरानी तस्वीर थी जिस पर अमित का ही चेहरा बना हुआ था, और उसकी आँखें धीरे-धीरे खून से लाल हो रही थीं।
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संतोष का अनमोल उपहार

एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक बहुत ही गरीब किसान रहता था जो अपनी छोटी सी झोपड़ी में खुशहाल जीवन बिता रहा था। उसके पास धन-दौलत तो बिल्कुल नहीं थी, लेकिन उसके मन में हमेशा संतोष और शांति का वास रहता था। एक दिन एक धनवान व्यापारी उस गाँव से गुजर रहा था और उसने माधव को बहुत ही आनंदित मुद्रा में गाते हुए देखा। व्यापारी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतना गरीब इंसान भी इतना खुश कैसे रह सकता है जबकि उसके पास तो खाने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। व्यापारी ने माधव के पास जाकर उसे सोने के सिक्कों से भरी एक बड़ी थैली दी और कहा कि इन्हें रखो और अपनी गरीबी दूर करो। व्यापारी को लगा कि अब यह गरीब किसान और भी अधिक खुश हो जाएगा और उसका आभार मानेगा। लेकिन सोने के सिक्के मिलने के बाद माधव की रातों की नींद उड़ गई क्योंकि उसे हर वक्त उन सिक्कों के चोरी हो जाने का डर सताने लगा। कुछ दिनों बाद माधव ने वह सोने की थैली वापस व्यापारी को लौटा दी और कहा कि मुझे इस धन की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मेरा पुराना संतोष ही मेरा सबसे बड़ा खजाना था। व्यापारी हैरान रह गया और उसने यह समझ लिया कि असली सुख पैसों में नहीं बल्कि मन की संतुष्टि में ही निहित होता है।
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संतोष का असली खजाना

पुरानी हवेली के पास रहने वाला गोपाल हमेशा धनवान बनने के सपने देखता था। उसके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन और रहने के लिए घर था, फिर भी उसका मन हमेशा अशांत रहता था क्योंकि उसके पास विलासिता की वस्तुएं नहीं थीं। एक रात उसे सपने में एक परी ने एक जादुई थैली दी जिसमें से कभी सोना खत्म नहीं होता था। गोपाल खुशी से पागल हो गया और दिन-रात और अधिक सोना इकट्ठा करने में लग गया। कुछ दिनों बाद उसे अहसास हुआ कि सोने की चिंता में उसकी नींद और चैन दोनों छिन चुके हैं। उसने तुरंत वह थैली वापस लौटा दी और समझ गया कि मन का संतोष ही दुनिया का सबसे बड़ा धन है।
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