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"मिट्टी" के लिए परिणाम

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कुल 31 परिणाम मिले खोज शब्द: मिट्टी

सच्चा मार्ग और कल्पवृक्ष

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक बहुत ही मेहनती युवक रहता था। वह दिन-रात अपने खेतों में कड़ी मेहनत करता था, लेकिन उसकी किस्मत उसका साथ नहीं दे रही थी। एक दिन उसे जंगल में एक जादुई पेड़ मिला, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह जो मांगो वही दे देता है। सोहन ने सबसे पहले अपार धन मांगा और कुछ ही पलों में वह अमीर बन गया। धन मिलते ही उसके सारे पुराने दोस्त और रिश्तेदार उससे दूर होने लगे और उसके मन में अहंकार और डर घर कर गया। कुछ समय बाद उसे यह समझ आ गया कि बिना मेहनत के मिला हुआ धन और सुख केवल भ्रम है और इससे इंसान का असली सुकून छिन जाता है। उसने उस वैभव को छोड़कर वापस अपने खेतों की मिट्टी में पसीना बहाना शुरू किया। इस बार उसे वास्तविक शांति और खुशी प्राप्त हुई, क्योंकि उसने समझ लिया कि पक्के परिश्रम से कमाया गया धन ही इंसान का सबसे बड़ा आभूषण होता है और शॉर्टकट कभी भी सच्ची सफलता नहीं दे सकते।
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सच्चा संतोष

पहाड़ियों की तलटी में एक गरीब कुम्हार रहता था जो मिट्टी के सुंदर बर्तन बनाकर अपना गुजारा करता था। वह जो भी कमाता, उसमें पूरी तरह संतुष्ट रहता था। एक दिन नगर का एक अमीर व्यापारी उसके पास आया। व्यापारी ने कुम्हार की सादगी और ख़ुशी को देखकर पूछा कि तुम इतने कम में कैसे खुश रह लेते हो? कुम्हार ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं कल की चिंता नहीं करता और आज में जीता हूँ। व्यापारी ने अपनी तिजोरी से सोने के सिक्कों की थैली निकालकर कुम्हार को दी और कहा कि इसे रखो और और अमीर बनो। कुम्हार ने पहले तो मना किया, फिर व्यापारी के ज्यादा जोर देने पर ले ली। उस रात कुम्हार को नींद नहीं आई। वह पूरी रात सोने के सिक्कों को चोरों से बचाने के लिए पहरा देता रहा। सुबह होते ही वह थक चुका था और उसकी ख़ुशी गायब हो चुकी थी। उसने तुरंत व्यापारी को सिक्के वापस लौटा दिए और कहा कि मुझे इस धन की नहीं, बल्कि उस सुकून की जरूरत है जो मेरी सादगी में था।
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रेगिस्तान की सुनहरी रेत और दूर क्षितिज

धूप में चमकती रेत के समंदर के बीच एक छोटा सा तंबू था जहाँ आरव अपनी मिट्टी की कलाकृतियों को सहेज रहा था। तभी वहाँ मीरा पहुँची जो शहर की भागदौड़ से दूर शांति की तलाश में आई थी। मीरा ने जब एक अधूरे बर्तन को छुआ तो आरव की उंगलियाँ उसके हाथ से टकरा गईं। इस अनचाहे स्पर्श ने दोनों के बीच एक अनोखा सेतु बना दिया जो बिना शब्दों के बहुत कुछ कह रहा था। रेगिस्तान की सर्द रातों में अलाव के पास बैठकर दोनों घंटों बातें करने लगे और एक दूसरे के अधूरेपन को अपनी कला से पूरा करने का संकल्प लिया। समय बीतता गया और जब मीरा के जाने का दिन आया तो आरव ने उसे मिट्टी का एक विशेष दिया भेंट किया जिसमें उनका अनकहा प्रेम समाहित था।
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बंजर ज़मीन पर खिलता गुलाब

शहर से दूर उस धूलभरी बंजर ज़मीन पर कोई भी पेड़ उगने की उम्मीद नहीं करता था, सिवाय आलोक के। आलोक एक ऐसा शख्स था जो असंभव को संभव बनाने की जिद रखता था। रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले वह पानी की दो बाल्टियाँ लेकर वहाँ पहुँच जाता और उस सूखी मिट्टी को सींचता। लोग उसे पागल कहते, पर उसकी आँखों में एक अजीब सा सपना था। एक दिन उस वीरान रास्ते से गुजरते हुए मीरा की नजर उस पर पड़ी। मीरा एक पर्यावरणविद् थी और उसकी आँखों में भी प्रकृति के प्रति वही अगाध प्रेम था। मीरा ने जब आलोक को अकेले मेहनत करते देखा, तो वह खुद को रोक नहीं पाई और उसकी मदद करने के लिए आगे आ गई। शुरुआत में दोनों के बीच सिर्फ काम को लेकर बातें होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे सूखी मिट्टी में पौधे की तरह उनके दिलों में भी भावनाएँ पनपने लगीं। वे दोनों घंटों पौधे लगाने और भविष्य के हरे-भरे जंगलों के सपने देखने लगे। कुछ महीनों की कड़ी मेहनत और दोनों के साझा प्यार का नतीजा यह हुआ कि वह बंजर ज़मीन छोटे-छोटे हरे पौधों से लहलहा उठी। पौधे बड़े हुए और उनमें लाल गुलाब के फूल खिल गए। उस दिन मीरा ने आलोक के हाथ में अपना हाथ रखा और समझ गई कि असली प्यार वही है जो मुश्किलों में भी जीवन सींचना जानता है।
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मिट्टी के दीये और साँझ का पहरा

दीपावली की शाम थी और पूरा गाँव रोशनी से जगमगा रहा था। सुमित अपने हाथों से बनाए मिट्टी के दीये बाज़ार में बेच रहा था, लेकिन उसकी उदासी इस बात से थी कि इस बार एक भी दीया नहीं बिका। तभी वहाँ अनघा आई, जिसने सुमित की आँखों में छिपी निराशा को भांप लिया। उसने बिना मोलभाव किए सारे दीये खरीद लिए और कहा कि असली रोशनी तो कला की कद्र करने में है। अनघा की इस सादगी ने सुमित के वीरान दिल में उम्मीद के कई दीये एक साथ जला दिए। उस शाम से अंधेरा दोनों की जिंदगी से हमेशा के लिए विदा हो गया और एक नया रिश्ता आकार लेने लगा।
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कागज़ की कश्तियाँ

बरसात की पहली बूँद ने सूखी मिट्टी को महका दिया था। कॉलेज के गलियारे में अहान और मीरा अपने नोट्स बचाते हुए एक कैंटीन के शेड के नीचे आकर खड़े हो गए। दोनों के बीच ज़्यादा बातचीत नहीं थी, बस एक अनकही सी खामोश पहचान थी जो पिछले कुछ महीनों से पनप रही थी। अचानक अहान ने अपनी जेब से एक पुराना कागज़ निकाला और फुर्ती से एक छोटी सी नाव बना डाली। उसने उसे पानी की बहती धारा में छोड़ते हुए कहा कि हमारी उम्मीदें भी इसी नाव जैसी हैं, जो हर लहर से लड़कर आगे बढ़ती हैं। मीरा मुस्कुराई और उसने अपनी किताब से एक सूखा पत्ता निकालकर उस नाव पर रख दिया। उस छोटे से पल ने दोनों के दिलों के फासलों को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की खूबसूरत शुरुआत हुई।
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मद्धम रोशनी का दिया

दीवाली की जगमगाती शाम में पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ था, लेकिन तरुण के छोटे से मिट्टी के बर्तन की दुकान पर सन्नाटा पसरा था। इस बार उसकी बनाई गई दीये की कलाकृतियां बिक नहीं पाई थीं, जिससे उसका मन बहुत उदास था। वह अपनी अधूरी किस्मत को कोस रहा था कि तभी दुकान पर एक युवा लड़की ईशा आई। ईशा ने न सिर्फ तरुण के सारे दीये खरीद लिए, बल्कि उसकी कला की दिल खोलकर तारीफ भी की। तरुण की आँखों में चमक लौट आई और उसने ईशा को धन्यवाद देने के लिए एक विशेष दीया उपहार में दिया। अगले साल उसी दीवाली पर ईशा फिर से उस दुकान पर आई, लेकिन इस बार वह अकेلی नहीं थी, बल्कि तरुण के जीवन की हमसफर बनकर आई थी। दोनों ने मिलकर उस छोटी सी दुकान को एक बड़े हस्तशिल्प केंद्र में बदल दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि सच्चे प्यार का दिया जब एक बार जल जाए, तो उसकी रोशनी कभी फीकी नहीं पड़ती और हर अंधेरे को आसानी से हरा सकती है।
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