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भोर का संगीत

भोर का संगीत

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पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होती थी। अनिरुद्ध शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी से तंग आकर कुछ दिनों के लिए इसी शांत गाँव में आया था। पहले दो दिन उसे यहाँ का सन्नाटा बहुत खला, क्योंकि वह शहर के कोलाहल का आदी हो चुका था। लेकिन तीसरे दिन भोर होते ही जब उसने खिड़की खोली, तो ताज़ी हवा के झोंके के साथ उसे प्रकृति का एक अलग ही संगीत सुनाई दिया। पेड़ों के पत्तों की सरसराहट और दूर बहते झरने की कलकल ने उसके मन के सारे तनाव को जैसे धो डाला। उसने महसूस किया कि असली सुकून भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में बसता है। उस सुबह उसने अपनी डायरी निकाली और बिना किसी जल्दी के प्रकृति की सुंदरता को शब्दों में पिरोना शुरू कर दिया। शहर लौटने का उसका अब बिल्कुल मन नहीं था क्योंकि उसे अपनी खोई हुई आंतरिक शांति आखिरकार मिल चुकी थी।
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