🔍 सर्च इंजन

"विदाई" के लिए खोज परिणाम

हिंदी, हिंग्लिश या इंग्लिश में शायरी, ग़ज़लें, शायर या विषय खोजें

हाल की खोजें: विदाई आँखें
कुल 5 परिणाम मिले कीवर्ड: विदाई

अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।

रेलवे स्टेशन का आखिरी फेरा

शाम ढल रही थी और प्लेटफार्म नंबर दो पर लोगों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। राघव पिछले दस सालों से इसी स्टेशन पर एक छोटी सी चाय की दुकान चला रहा था। हर शाम ठीक साढ़े सात बजे एक लड़की आती थी, एक कप ब्लैक टी लेती थी और खिड़की से बाहर दूर तक देखती थी। राघव कभी उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया, बस उसकी पसंद की चाय बना देता था। आज जब वह लड़की आई, तो उसके हाथ में एक लिफाफा था। उसने चाय की चुस्की ली और लिफाफा राघव की तरफ बढ़ा दिया। राघव ने हैरानी से देखा तो उस पर लिखा था, 'शुक्रिया, मेरी तन्हाई बांटने के लिए।' ट्रेन की सीटी बजी और वह चल दी। राघव ने लिफाफा खोला तो उसके भीतर एक पुरानी तस्वीर और एक छोटा सा नोट था, जिसमें लिखा था कि अब वह शहर छोड़कर हमेशा के लिए जा रही है। राघव की आँखें भर आईं।

कांच के बक्से में बंद गुलाब

कॉलेज के आखिरी दिन विदाई समारोह के दौरान राहुल ने मुझे एक कांच के बक्से में बंद लाल गुलाब तोहफे में दिया था। उस समय मुझे लगा कि यह सिर्फ एक औपचारिक विदाई का तोहफा है, लेकिन उस गुलाब की महक ने मेरे दिल में कुछ अलग ही हलचल पैदा कर दी थी। सालों बीत गए, हम दोनों अलग शहरों में अपनी नौकरियां करने लगे और संपर्क भी लगभग टूट गया था। एक दिन अचानक एक कैफे में राहुल बिल्कुल वैसे ही मुस्कुराते हुए सामने आ गया जैसे कॉलेज के दिनों में आता था। उसने वही कांच का बक्सा मुझे दिखाया जिसे उसने आज तक संभाल कर रखा था। उस पल मुझे महसूस हुआ कि दूरियां भले ही बढ़ गई हों, लेकिन दिलों की गहराई में छिपा प्यार कभी कम नहीं होता।

घड़ी की टिक-टिक

रेलवे स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा की तरह भीड़भाड़ से भरा हुआ था। आलोक की ट्रेन छूटने में बस कुछ ही मिनट बाकी थे और स्नेहा अपनी भावनाओं को आंसुओं में छिपाने की कोशिश कर रही थी। दोनों ने कभी अपने दिल की बात एक-दूसरे को नहीं बताई थी, और आज विदाई का वक्त आ चुका था। ट्रेन ने सीटी बजाई और पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे। तभी आलोक ने खिड़की से झुककर अपना हाथ बढ़ाया और स्नेहा के हाथ में एक छोटी सी घड़ी रख दी जिस पर लिखा था कि वक्त कभी भी हमें अलग नहीं कर सकता। स्नेहा मुस्कुराई और समझ गई कि शब्दों के बिना भी प्यार का इजहार मुमकिन है।

अंतिम विदाई

बिना कुछ कहे, बिना किसी शोर के चुपचाप जिंदगी से रुखसत हो गए वो, और हम पीछे छूट गए सिर्फ उनकी मीठी यादों और अनगिनत सवालों के सहारे।