अक्षरों का सफर और ज्ञान की रोशनी
गाँव की एक बुजुर्ग महिला राधा को हमेशा इस बात का पछतावा रहता था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाई और पढ़-लिख नहीं सकती। उसके पोते ने जब उसे उसकी असमर्थता पर उदास देखा, तो उसने अपनी दादी को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। शुरुआत में राधा को अक्षर पहचानना बहुत कठिन लगता था और वह हार मानने लगी थी। पोते ने उसे समझाया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, बस इरादा पक्का होना चाहिए। धीरे-धीरे राधा ने स्लेट पर क ख ग लिखना शुरू किया और कुछ ही महीनों में वह अखबार पढ़ने लगी। जब उसने पहली बार खुद के हस्ताक्षर किए, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने साबित कर दिया कि अगर दिल में सीखने की ललक हो, तो हर नामुमकिन काम मुमकिन हो जाता है।
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