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कांच का चमकता टुकड़ा

सड़क के किनारे पड़े कांच के एक साधारण टुकड़े पर जब सूरज की रोशनी पड़ी, तो वह किसी हीरे की तरह जगमगाने लगा। राह चलते कई लोग उसे कीमती हीरा समझकर उठाने के लिए दौड़े। एक लालची व्यापारी ने उसे झपट लिया और अपने घर ले जाकरजोरी में रख दिया। लेकिन सुबह होते ही उसकी चमक गायब हो गई क्योंकि वह केवल कांच का एक आम टुकड़ा था, जिसे धूप ने कुछ पलों के लिए खास बना दिया था। व्यापारी को तब समझ आया कि हर चमकती हुई चीज कीमती नहीं होती, और असली मूल्य तो आंतरिक गुणों का होता है, बाहरी दिखावे का नहीं।

पीले कागजों का बंडल

गांव के बाहरी हिस्से में स्थित पुराने डाकघर की सफाई करते समय रमित को पीले पड़ चुके कागजों का एक पुराना बंडल मिला। जब उसने उन पत्रों को पढ़ना शुरू किया, तो पाया कि वे सभी उसी पते पर लिखे गए थे जहाँ वह खुद रहता है और भेजने वाले का नाम भी वही था जो उसका अपना था। पत्रों पर दर्ज तारीखें आने वाले कल की थीं। हैरान होकर उसने रात के ठीक बारह बजे अपने नाम से आए उस नए लिफाफे को खोला, जिसके अंदर एक पन्ना था जिस पर लिखा था कि अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं बचा है। तभी डाकघर के दरवाजे पर जोर से दस्तक गूंजी और ठंडी हवा का एक झोंका उसकी रीढ़ में सिहरन पैदा कर गया।

पुराने कुएं का सच

गाँव के बाहर बने एक सुनसान खेत में एक पुराना कुआँ था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसमें से रात को संगीत की आवाजें आती हैं। राहुल और उसके दोस्तों ने इस बात की सच्चाई जानने के लिए रात के समय उस कुएं के पास जाने की योजना बनाई। जब वे वहां पहुंचे, तो वास्तव में कुएं के भीतर से घुंघरू की छनक और मधुर संगीत सुनाई दे रहा था। राहुल ने जैसे ही टॉर्च की रोशनी कुएं के अंदर डाली, पानी में तैरता हुआ एक चेहरा दिखाई दिया जो जोर-जोर से हंस रहा था। उसी पल राहुल के दोस्तों के पैर जमीन में धंस गए और कुएं से एक लंबा हाथ बाहर निकल आया।

दो कलाकारों की अनूठी प्रतियोगिता

एक राज्य के राजा ने कला प्रेमियों के लिए एक अनोखी प्रतियोगिता रखी। दो महान चित्रकारों को एक ही विषय पर अपनी कला का प्रदर्शन करना था। पहले चित्रकार ने महीनों की मेहनत के बाद एक ऐसा महल बनाया जिसमें हर एक ईंट और चमकती धूप को बेहद बारीकी से दर्शाया गया था। दूसरे चित्रकार ने केवल एक बड़ा सा आईना लगाया और उसके सामने एक सुंदर बगीचा लगा दिया। जब राजा ने पहले चित्रकार की पेंटिंग देखी तो वह बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन जब वह दूसरे चित्रकार के पास गया तो उसने आईने में खुद को और अपने आसपास की जनता को मुस्कुराते हुए देखा। राजा समझ गया कि सच्ची कला वह होती है जो इंसान को खुद से जोड़े और समाज की वास्तविक सुंदरता को दर्शाए।

झूठ का कड़वा सच

राकेश अपने विद्यालय में हमेशा अपनी झूठी शान दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें किया करता था। उसके दोस्तों को उसकी इन बातों पर हंसी आती थी, पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आया। एक दिन उसने मजाक में एक बड़ी मुसीबत आने की झूठी अफवाह फैला दी, जिससे पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। जब लोगों को सच्चाई का पता चला, तो सबने राकेश से दूरी बना ली और उसकी बात पर विश्वास करना हमेशा के लिए बंद कर दिया। जब सचमुच एक दिन राकेश पर संकट आया, तो उसकी मदद करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया क्योंकि सब उसका झूठ समझ बैठे थे। तब उसे समझ आया कि झूठ की नींव पर कभी विश्वास का महल नहीं टिक सकता।

चित्रकार और दर्पण

नगर के प्रसिद्ध चित्रकार विक्रम अपनी कला के लिए पूरे राज्य में जाने जाते थे। वह जब भी किसी का चित्र बनाते, तो उसकी खामियों को छिपाकर उसे और भी सुंदर बना देते थे। एक दिन एक गरीब और साधारण दिखने वाला वृद्ध उनके पास आया और अपना चित्र बनवाने की इच्छा जताई। विक्रम ने उसे देखा और सोचा कि इसका चित्र बनाने से कोई ख्याति नहीं मिलेगी, इसलिए उसने जानबूझकर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और एक साधारण सी तस्वीर थमा दी। वृद्ध ने तस्वीर ली और मुस्कुराते हुए कहा कि असली चित्रकार वही है जो बाहरी रूप के साथ-साथ भीतर की सच्चाई को भी कैनवास पर उतार सके। उसने विक्रम को एक जादुई दर्पण दिया जिसमें इंसान का असली चरित्र दिखाई देता था। उस दर्पण में देखने पर विक्रम को अपनी कला का अहंकार साफ नजर आया। उसे अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने कसम खाई कि वह कभी भी किसी इंसान को उसकी बाहरी स्थिति से नहीं आंकेगा।

सच्ची ईमानदारी की कीमत

रमेश शहर के बाजार में एक छोटी सी फलों की दुकान चलाता था। वह बहुत गरीब था लेकिन उसकी ईमानदारी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। एक दिन एक अमीर व्यापारी उसकी दुकान पर फल खरीदने आया और गलती से मोहरों से भरा एक कीमती थैला वहीं छोड़ गया। रमेश ने जब थैला देखा, तो कुछ पल के लिए उसके मन में लालच आया कि वह इससे अपनी सारी गरीबी दूर कर सकता है। लेकिन उसके संस्कारों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। उसने अगले दिन व्यापारी को ढूंढकर उसका थैला ससम्मान वापस कर दिया। व्यापारी रमेश की ईमानदारी देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे एक बड़ा पुरस्कार दिया। रमेश को पता चल गया कि ईमानदारी ही इंसान की सबसे बड़ी पूंजी होती है।

वक़्त के साए

वक़्त की चाल को कौन भला पहचान पाया है, यहाँ हर शख्स ने बस सबक ही नया पाया है। जो आज पास है कल शायद नजर न आए, इसी का नाम तो शायद असल में माया है।

बदलते मौसम

वक्त के साथ चेहरों के नकाब उतर जाते हैं,
जो अपने थे कभी, वो आज गैर नजर आते हैं।
बदलती दुनिया का बस इतना सा दस्तूर है,
यहां भरोसे के रास्ते बहुत दूर नजर आते हैं।