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मिट्टी के खिलौने और बचपन की खुशबू

सावन का महीना था और चारों तरफ गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली हुई थी। गाँव के एक छोटे से कोने में रामू भैया चाक पर बैठ कर बड़े चाव से मिट्टी के खिलौने बना रहे थे। उनके हाथ बिना किसी मशीन के जादू की तरह चलते थे और देखते ही देखते घोड़ी, हाथी और सुंदर गुड़िया तैयार हो जाती थी। बच्चे हमेशा उनकी दुकान के बाहर जमा रहते थे, आँखों में चमक लिए। रामू कभी किसी बच्चे को खाली हाथ नहीं लौटाते थे, भले ही उसके पास पैसे हों या न हों। एक दिन एक शहर से आया अमीर व्यक्ति उनकी दुकान पर रुका। उसने उन खिलौनों की सादगी देखकर हैरानी जताई और सारे खिलौने एकमुश्त खरीदने की इच्छा जताई। उसने रामू को मुंहमांगी कीमत देनी चाही ताकि वह उन्हें शहर के बड़े शोरूम में बेच सके। रामू कुछ पल के लिए शांत हो गए। उन्होंने अपने गंदे और थके हाथों को देखा, फिर उन बच्चों के चेहरों को जो दूर खड़े होकर डरे हुए थे कि अब वे कभी खिलौने नहीं देख पाएंगे। रामू ने शहर वाले व्यक्ति को मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये खिलौने सिर्फ मिट्टी के नहीं हैं, इन पर इन बच्चों की मासूम हंसी और मेरे बरसों का सुकून टिका है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता। शहर वाला व्यक्ति हैरान लौट गया और रामू के चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान बिखर गई।

समुद्र का संदेश

लहरें जब बार-बार किनारे से आकर टकराती थीं, तो ऐसा लगता था मानो वे रेत को कुछ समझाना चाह रही हों। रमित रोज़ शाम को समुद्र किनारे टहलने जाता और इन लहरों को देखता। उसके जीवन में उथल-पुथल मची हुई थी और वह अपने व्यापार में भारी नुकसान के कारण पूरी तरह टूट चुका था। उसने समुद्र की ओर देखकर सोचा कि यह अंतहीन पानी कभी हार नहीं मानता, फिर वह क्यों इतनी जल्दी घबरा गया। उसने अपनी पुरानी गलतियों से सीख लेने का फैसला किया और नए सिरे से शुरुआत करने की योजना बनाई। कुछ महीनों की कड़ी मेहनत के बाद उसका व्यवसाय फिर से पटरी पर लौट आया। आज जब वह समुद्र तट पर खड़ा था, तो उसे लहरों का शोर किसी संगीत जैसा मधुर लग रहा था जिसने उसके जीवन को एक नई दिशा दी थी।

भोर का संगीत

पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होती थी। अनिरुद्ध शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी से तंग आकर कुछ दिनों के लिए इसी शांत गाँव में आया था। पहले दो दिन उसे यहाँ का सन्नाटा बहुत खला, क्योंकि वह शहर के कोलाहल का आदी हो चुका था। लेकिन तीसरे दिन भोर होते ही जब उसने खिड़की खोली, तो ताज़ी हवा के झोंके के साथ उसे प्रकृति का एक अलग ही संगीत सुनाई दिया। पेड़ों के पत्तों की सरसराहट और दूर बहते झरने की कलकल ने उसके मन के सारे तनाव को जैसे धो डाला। उसने महसूस किया कि असली सुकून भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में बसता है। उस सुबह उसने अपनी डायरी निकाली और बिना किसी जल्दी के प्रकृति की सुंदरता को शब्दों में पिरोना शुरू कर दिया। शहर लौटने का उसका अब बिल्कुल मन नहीं था क्योंकि उसे अपनी खोई हुई आंतरिक शांति आखिरकार मिल चुकी थी।

टूटे हुए कांच का टुकड़ा

एक महानगर की व्यस्त सड़क पर एक नायाब शीशे का शोरूम था। एक दिन एक सफाईकर्मी सफाई करते समय अनजाने में एक कीमती शोपीस से टकरा गया और वह नीचे गिरकर टूट गया। शोरूम का मालिक गुस्से से लाल होकर बाहर आया और उसने उस गरीब कर्मचारी को नौकरी से निकालने की धमकी दी। सहमा हुआ कर्मचारी अपने बचाव में कुछ नहीं बोल पा रहा था तभी एक अन्य वरिष्ठ ग्राहक ने आगे आकर मालिक को रोका। ग्राहक ने कहा कि गलती अनजाने में हुई है और वस्तु का बीमा होता है, लेकिन किसी गरीब की रोजी-रोटी छीनना सही नहीं है। मालिक को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने गुस्से पर काबू पाते हुए कर्मचारी को माफ कर दिया और उसे गले लगा लिया। उस दिन मालिक को समझ आया कि इंसानियत और क्षमा का भाव किसी भी वस्तु से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।

नीले गगन तले पहला अहसास

शहर के शोरगुल से दूर वह नीला गगन हमेशा से मुझे अपनी ओर खींचता था। एक दिन जब मैं ढलते सूरज को निहार रहा था, तभी वहां रिया आई। उसके हाथ में एक छोटी सी डायरी थी जिसके पन्ने हवा में लहरा रहे थे। मैंने आगे बढ़कर वह डायरी पकड़ी और यहीं से हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे हम दोनों घंटों पार्क की बेंच पर बैठकर अपने सपनों और ख्यालों को साझा करने लगे। वह शाम हमारे जीवन की एक ऐसी शुरुआत थी जिसने सारे गिले-शिकवे मिटा दिए और दिलों के करीब आने का एक नया रास्ता दिखाया। आज भी जब मैं उस नीले गगन को देखता हूं, मुझे रिया की वो प्यारी सी मुस्कान साफ नजर आती है जो हमेशा के लिए मेरे दिल में बस चुकी है।

समुद्र की लहरें और सीपियों की खनक

समुद्र के शांत तट पर लहरें बार-बार आकर रेत पर लिखे नामों को मिटा रही थीं और रोहन चुपचाप बैठकर सीपियाँ बीन रहा था। तभी पास ही तान्या अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी और एक तेज़ हवा के झोंके से उसके कागज़ उड़कर रोहन के पास आ गए। जब रोहन ने कागज़ वापस किए तो उसने देखा कि उस पर समुद्र और प्रेम पर बहुत सुंदर कविताएँ लिखी थीं। दोनों की रुचि जब साहित्य और प्रकृति में मिली तो तट पर बिताया जाने वाला हर पल खास बन गया। लहरों के संगीत के बीच उन्होंने अपने दिल की बात एक दूसरे से कह दी और सीपियों में अपना भविष्य तलाशने लगे। अब वे दोनों हर शाम उसी तट पर मिलते हैं जहाँ लहरें उनके प्यार की दास्तां को हमेशा के लिए अमर कर देती हैं।

घड़ीसाज़ की दुकान और पुरानी टिक-टिक

शहर के एक कोने में बनी उस छोटी सी घड़ीसाज़ की दुकान में समय जैसे ठहर सा गया था। दीवारों पर टंगी सैंकड़ों घड़ियाँ एक साथ टिक-टिक करती थीं, लेकिन उनकी आवाज़ शोर नहीं बल्कि एक सुकून भरा संगीत लगती थी। रघुकुल बूढ़ा हो चला था और अपनी इस पुश्तैनी दुकान में बैठकर पुरानी घड़ियों को ठीक करना ही उसकी दुनिया थी। एक दिन दुकान के दरवाजे की घंटी बजी और भीतर आई सिमरन, जिसके हाथ में उसके दादाजी की एक बेहद पुरानी और बंद पड़ी घड़ी थी। सिमरन की आँखें नम थीं क्योंकि वह घड़ी उसके लिए किसी अनमोल विरासत से कम नहीं थी। रघुकुल ने चश्मा ठीक किया, घड़ी को अपने हाथ में लिया और मुस्कुराते हुए कहा कि यह ठीक हो जाएगी। अगले कुछ दिनों तक सिमरन रोज शाम को दुकान पर आती और रघुकुल को घड़ियों के पुर्जे जोड़ते हुए देखती। धीरे-धीरे दोनों के बीच खामोश बातचीत का एक सिलसिला शुरू हो गया, जहाँ शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। उम्र के फासले होने के बावजूद दोनों के दिल एक ही धड़कन पर चलने लगे थे। जिस दिन वह पुरानी घड़ी ठीक होकर फिर से टिक-टिक करने लगी, सिमरन की खुशी का ठिकाना नहीं था। रघुकुल ने घड़ी उसे थमाते हुए कहा कि समय भले ही आगे बढ़ जाए, लेकिन सच्चे रिश्ते कभी पुराने नहीं होते। सिमरन ने अपनी उँगली रघुकुल के हाथों पर रखी और समझ गई कि जीवन की असली घड़ी अब सही दिशा में चल रही है।

सिक्कों की खनक

सिक्के आवाज करते हैं पर नोट हमेशा खामोश रहते हैं, इसलिए हमने भी शोर मचाना छोड़ दिया है। हमारी मौजूदगी ही विरोधियों के होश उड़ाने के लिए काफी है।

खामोश चीखें

अंदर का शोर बाहर आने से डरता है,
यह जमाना सिर्फ तमाशा करना जानता है।
रो लेते हैं छुपकर रातों की चादर ओढ़कर,
ये दिल रोज अपनों से ही हारता रहता है।