पहाड़ की चोटी पर
सुबह की पहली किरण के साथ ही राहुल ने अपने सफर की शुरुआत कर दी थी। लक्ष्य था उस विशाल पहाड़ की चोटी तक पहुँचना, जिसे आज तक कोई अकेला नहीं चढ़ पाया था। रास्ते में कंकड़-पत्थर और तेज ठंडी हवाएं उसका रास्ता रोक रही थीं। कई बार उसके पैर फिसले और उसे लगा कि अब आगे बढ़ना नामुमकिन है। लेकिन उसने पीछे मुड़कर देखने से इनकार कर दिया। हर कदम के साथ उसकी सांसें तेज हो रही थीं, पर हौसला और बुलंद होता जा रहा था। आखिरकार, सूरज ढलने से ठीक पहले वह चोटी पर जा पहुँचा। उसने चारों तरफ नजर घुमाई, नीचे बादलों का समंदर फैला हुआ था और ठंडी हवा उसके माथे को चूम रही थी। उस ऊंचाई पर खड़े होकर उसने महसूस किया कि कठिनाइयां सिर्फ हमें मजबूत बनाने के लिए आती हैं। मंजिल की वह जीत सारे दर्दों को पल भर में भुला देने के लिए काफी थी।
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