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रेगिस्तान में खिलता हुआ गुलाब

रमेश बाबू ने अपनी जिंदगी के पचास साल एक वीरान रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हुए बिता दिए थे। उनके दोनों पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। वह हर महीने अपनी कमाई का आधा हिस्सा पास के अनाथालय में दान कर देते थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे अपने बुढ़ापे के लिए क्यों नहीं बचाते, तो रमेश ने कहा कि दूसरों के चेहरों पर खुशी देखना ही उनका असली बैंक बैलेंस है। एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ा अधिकारी उतरा, जिसने बचपन में रमेश के दिए पैसों से ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस अधिकारी ने रमेश को गले लगाया और उनकी सालों की मेहनत रंग लाई। रमेश की आंखें भर आईं और उन्हें महसूस हुआ कि उनका जीवन वास्तव में सार्थक हो गया था।

बचपन की वह नीली साइकिल

गरीबी के दिनों में सोहन का एकमात्र सपना एक नीली साइकिल खरीदने का था। उसके पिता ने दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे पैसे जोड़े और उसके जन्मदिन पर उसे वही साइकिल तोहफे में दी। सोहन की खुशी का ठिकाना नहीं था, उसने उस साइकिल को हमेशा अपनी जान से ज्यादा संभाला। वक्त बदला, सोहन बड़ा हुआ और शहर की एक नामी कंपनी में अफसर बन गया। आज उसके पास बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन जब भी वह पुरानी साइकिल को गैराज में देखता है, उसे अपने पिता के माथे का वह पसीना याद आ जाता है जो उन्होंने उसकी खुशी के लिए बहाया था। भौतिक सुखों से परे उस साइकिल में उसके पिता का आशीर्वाद और त्याग बसता था।

पुरानी डायरी और अधूरा खत

बरसों बाद जब अमित ने अपने पुराने बक्से को टटोला, तो उसे कॉलेज के दिनों की एक भूली-बिसरी डायरी मिली। पन्ने पलटते ही एक सूखा हुआ गुलाब और कागज का मुड़ा हुआ टुकड़ा नीचे गिर गया। वह किसी और का नहीं, बल्कि उसकी बचपन की मित्र का लिखा हुआ अंतिम संदेश था, जिसे वह कभी पढ़ नहीं पाया था। उस वक्त की गलतफहमी ने दोनों को हमेशा के लिए अलग कर दिया था। आज उम्र के इस पड़ाव पर जब अतीत की परछाइयां धुंधली हो चुकी हैं, उस खत के हर एक शब्द ने अमित की आंखें नम कर दीं। उसने महसूस किया कि वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, सिवाय उन अनकहे एहसासों के जो दिल के किसी कोने में आज भी जिंदा रहते हैं।

अधूरा मिट्टी का खिलौना

कुम्हार मदन लाल अपनी मिट्टी की दुकान में अकेले बैठकर चाक चला रहा था। उसने रात में एक अजीब सी आकृति को मिट्टी से खुद-ब-खुद आकार लेते देखा। उसे लगा कि शायद यह उसका भ्रम है, इसलिए उसने नजरअंदाज कर दिया और दुकान बंद करने लगा। तभी एक छोटे बच्चे की रोने की आवाज गूंजी और टेबल पर रखा वो अधूरा मिट्टी का खिलौना अपने आप चलने लगा। मदन ने डरते हुए उस खिलौने के पास जाकर देखा तो उसके रोंगटे खड़े हो गए, क्योंकि वह खिलौना बिल्कुल उसके अपने बचपन के उस खिलौने जैसा था जो तीस साल पहले खो गया था।

अधूरा चित्र और विश्वास

नितिन बचपन से ही एक बेहतरीन चित्रकार बनना चाहता था, लेकिन एक दुर्घटना में उसका दायां हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। डॉक्टरों ने कह दिया कि अब वह कभी ब्रश नहीं पकड़ पाएगा। नितिन अंदर से टूट गया और उसने अपने सारे रंग और कैनवास तहखाने में फेंक दिए। कई साल बीत गए, एक दिन उसके छोटे भाई ने उसे बाएं हाथ से कोशिश करने की चुनौती दी। पहले तो नितिन हंसा, पर फिर भाई के जिद करने पर उसने बाएं हाथ से तूलिका उठाई। शुरुआत में रेखाएं टेढ़ी-मेढ़ी थीं, लेकिन निरंतर अभ्यास से उसका हाथ सधने लगा। एक साल बाद उसकी पेंटिंग ने राज्य स्तर की कला प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार जीता।

चाँदनी रात का वादा

शहर की भागदौड़ से दूर, एक शांत गाँव में आरव और मीरा की मुलाकात बचपन के मेलें में हुई थी। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे एक अटूट विश्वास में बदल गई। समय बीतता गया और पढ़ाई के सिलसिले में आरव को शहर जाना पड़ा। जुदाई के इन सालों में खत ही उनका एकमात्र सहारा थे। एक पूर्णिमा की रात, जब आसमान में चाँद अपनी पूरी चमक पर था, आरव अचानक गाँव वापस लौटा। उसने मीरा को उसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया जहाँ उन्होंने कभी साथ खेलने का वादा किया था। मीरा जब वहाँ पहुँची, तो आरव को अपने सामने देखकर उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उस रात चाँदनी की रोशनी में उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर उम्रभर साथ रहने का वचन लिया, जिसे समय की कोई भी दूरी कभी कम नहीं कर सकी।

पुरानी धुन का एहसास

एक पुराने रेडियो रिपेयरिंग सेंटर में कबीर को अपना बचपन का खोया हुआ ट्रांजिस्टर मिला। वह उसे ठीक कराने पहुँचा जहाँ उसकी मुलाकात राधिका से हुई, जो उस दुकान की नई कारीगर थी। राधिका ने न सिर्फ उस पुराने यंत्र को ठीक किया, बल्कि उसके अंदर बजने वाली पुरानी यादों को भी ताज़ा कर दिया। जब भी वह रेडियो ऑन होता, कमरे में एक अलग ही सुकून भर जाता। इस छोटे से यंत्र ने दो अलग पीढ़ियों के दिलों को आपस में जोड़ दिया और यह साबित कर दिया कि पुरानी यादें और सच्चा प्यार कभी पुराना नहीं होता, बस उन्हें सही धड़कन की ज़रूरत होती है।

नीले आसमान के नीचे

पहाड़ियों की ढलान पर बसा छोटा सा गाँव अपनी शांत फिज़ाओं के लिए जाना जाता था। यहीं कबीर और मीरा की बचपन की दोस्ती प्यार में तब्दील हुई थी। कबीर एक चित्रकार था जो रंगों के ज़रिए अपनी भावनाएं व्यक्त करता था, और मीरा गाँव के स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाती थी। दोनों का जीवन बड़ा सहज चल रहा था, तभी कबीर को एक राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी से बड़ा बुलावा आया। शहर की चकाचौंध और सफलता ने कबीर को धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर करना शुरू कर दिया। मीरा ने महसूस किया कि कबीर उसकी दुनिया से बहुत आगे निकल रहा है और उसने अपने कदम पीछे खींच लिए। एक दिन कबीर ने अपनी सबसे बड़ी पेंटिंग पूरी की और उसे लेकर सीधे मीरा के पास गाँव लौट आया। उस कैनवास पर शहर की कोई चमक नहीं थी, बल्कि गाँव का वही नीला आसमान और मीरा की मुस्कुराती हुई आकृति थी। कबीर समझ चुका था कि असली सुकून शोहरत में नहीं, बल्कि अपनों के साथ में है। मीरा की आँखें नम हो गईं और दोनों ने कभी न अलग होने का फैसला किया।

पुराने गाने

बचपन में लगता था कि हमारे घर के बड़े लोग कितने बोरिंग गाने सुनते हैं, और आज खुद उन गानों पर रील बनाते वक्त आँखें नम हो जाती हैं।

बचपन के सपने

बचपन में लगता था कि बड़े होकर हम अपनी मर्जी के मालिक बनेंगे, अब समझ आया कि हम तो सिर्फ बिल भरने के मालिक बने हैं।

टूटे अरमान

बचपन के खिलौनों की तरह संजोए थे कुछ हसीन सपने, जिन्हें हकीकत की आंधी ने पलभर में धूल बना दिया। अब तो कांच की तरह बिखर चुका है मेरा हर एक सपना।