रेडियो की पुरानी लहरें
गांव के एक छोटे से कोने में रामू काका का रेडियो रखा था, जो अपनी सुरीली आवाज से पूरे मोहल्ले को बांध लेता था। हर शाम लोग पुरानी धुनें और समाचार सुनने के लिए उनके बरामदे में इकट्ठा होते थे। समय बदला और तकनीक आगे बढ़ी, तो सभी ने अपने हाथों में आधुनिक स्मार्टफोन थाम लिए। रेडियो की वो गूंज धीरे-धीरे खामोशी में बदल गई और रामू काका का बरामदा सूना हो गया। एक दिन रामू काका ने जब बरसों पुराना वो रेडियो साफ किया और गलती से उसका स्विच ऑन हो गया, तो अचानक से वही पुरानी सिग्नल धुन गूंज उठी। उस एक आवाज ने गांव के सभी बुजुर्गों को फिर से उसी सुनहरे दौर में वापस खींच लिया और सब दौड़कर उस पुरानी महफिल में आ पहुंचे।
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