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बरगद की छांव

बरगद की छांव

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गांव के मुख्य चौराहे पर सदियों पुराना एक विशाल बरगद का पेड़ खड़ा था। उसकी घनी छांव में गर्मियों के दिनों में पूरा गांव इकट्ठा होता था। बूढ़े लोग चौपाल सजाते और बच्चे उसके आसपास लुकाछिपी खेलते थे। उसी गांव में मोहन नाम का एक युवक रहता था जो हमेशा आधुनिकता की दौड़ में भागता रहता था। उसे गांव की धीमी रफ्तार और ये पेड़ पुराने ख्यालों की निशानी लगते थे। एक दिन तेज आंधी आई और गांव के कई नए मकानों की टीन की छतें उड़ गईं। लोग दहशत में इधर-उधर भागने लगे। लेकिन वह विशाल बरगद का पेड़ अपनी गहरी जड़ों के बल पर चट्टान की तरह अटका रहा और उसने अपने आंचल में कई बेघर लोगों को शरण दी। जब आंधी थमी और मोहन ने उस पेड़ की सहनशक्ति को देखा, तो उसकी आंखें खुल गईं। उसे समझ आया कि जो जड़ें जमीन से गहराई से जुड़ी होती हैं, वे ही आंधियों का सामना कर सकती हैं। आधुनिकता अपनी जगह सही है, लेकिन अपनी संस्कृति और जड़ों को भूल जाना इंसान को कमजोर बना देता है।
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