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सांझ की हल्की फुहार

शाम का वक्त था और आसमान में काले बादल घिर आए थे। मीरा अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद ले रही थी, तभी अचानक बारिश की तेज बूंदें गिरने लगीं। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह ऐसे ही मौसम में कागज़ की नावें बनाकर पानी में तैराती थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसका पुराना मित्र कबीर खड़ा था, जिसके हाथ में गरम चाय के दो कप थे। कई सालों बाद हुई इस अचानक मुलाकात ने दोनों के चेहरों पर एक अनूठी खुशी ला दी। बारिश की उस फुहार ने उनके बीच की दूरी को मिटा दिया और पुरानी यादों को फिर से तरोताजा कर दिया। उन्होंने बैठकर पुरानी बातें की और महसूस किया कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ और भी ज्यादा गहरे हो जाते हैं।

रेलवे ट्रैक के किनारे बसा आशियाना

हर गुजरती ट्रेन के साथ सोहन के घर की दीवारें कांप उठती थीं। वह सालों से रेलवे लाइन के ठीक पास बनी झुग्गी में रहता था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर इंसान बनाना था। दिनभर धूप में मजदूरी करने के बाद भी उसकी आँखों में एक चमक होती थी। एक दिन, जब उसकी बेटी ने राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया, तो सोहन की आँखें खुशी के आंसुओं से भर गईं। उसे अहसास हुआ कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर नीयत साफ हो और सपने सच्चे हों, तो गरीबी की दीवारें भी एक दिन ढह जाती हैं। उस शाम उसने अपनी बेटी के साथ बैठकर सूखी रोटियां खाईं, लेकिन वो खाना किसी दावत से कम नहीं था।

अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।

सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

झूठ का कड़वा सच

राकेश अपने विद्यालय में हमेशा अपनी झूठी शान दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें किया करता था। उसके दोस्तों को उसकी इन बातों पर हंसी आती थी, पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आया। एक दिन उसने मजाक में एक बड़ी मुसीबत आने की झूठी अफवाह फैला दी, जिससे पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। जब लोगों को सच्चाई का पता चला, तो सबने राकेश से दूरी बना ली और उसकी बात पर विश्वास करना हमेशा के लिए बंद कर दिया। जब सचमुच एक दिन राकेश पर संकट आया, तो उसकी मदद करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया क्योंकि सब उसका झूठ समझ बैठे थे। तब उसे समझ आया कि झूठ की नींव पर कभी विश्वास का महल नहीं टिक सकता।

कांच की खिड़की और बारिश की बूंदें

जब भी झमाझम बारिश होती, नयना अपनी खिड़की के पास बैठकर बाहर देखने लगती। सामने वाले घर की बालकनी में अक्सर कबीर अपनी गिटार के तारों को छेड़ता नजर आता था। दोनों के बीच कभी कोई सीधी बात नहीं हुई थी, बस खिड़कियों से होता हुआ एक खामोश संवाद था। एक दिन बारिश इतनी तेज थी कि बिजली चली गई और दोनों अपनी-अपनी बालकनी में आ गए। मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में कबीर ने गिटार पर वह धुन बजाई जो अक्सर वह नयना को देखते हुए गुनगुनाता था। नयना ने मुस्कुराते हुए अपनी खिड़की से ही एक फूल उसकी तरफ उछाल दिया। उस बारिश की रात ने दोनों के बीच की दूरी को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई।

रेलवे ट्रैक के पास की चाय

छोटे से स्टेशन की उस छोटी सी टपरी पर मिलने वाली अदरक वाली चाय के स्वाद में कुछ तो खास बात थी, या शायद वह जादू कबीर और सिमरन की मुलाकातों का था। हर शाम ठीक पांच बजे ट्रेन गुजरने से पहले वे दोनों वहीं मिलते। कबीर अपनी डायरी में कुछ लिखता और सिमरन रेलवे ट्रैक के उस पार डूबते सूरज को देखती। एक दिन सिमरन ने बिना बताए जाने का फैसला किया क्योंकि उसका ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया था। आखिरी शाम उसने कबीर को चाय का कप देते हुए अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश की। कबीर ने उसका हाथ थामा और कहा कि दूरी चाहे जितनी हो, चाय की खुशबू उन्हें हमेशा जोड़े रखेगी। ट्रेन की सीटी बजी और दोनों की आंखें नम हो गईं, पर भरोसा मजबूत रहा।

चाँदनी रात का वादा

शहर की भागदौड़ से दूर, एक शांत गाँव में आरव और मीरा की मुलाकात बचपन के मेलें में हुई थी। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे एक अटूट विश्वास में बदल गई। समय बीतता गया और पढ़ाई के सिलसिले में आरव को शहर जाना पड़ा। जुदाई के इन सालों में खत ही उनका एकमात्र सहारा थे। एक पूर्णिमा की रात, जब आसमान में चाँद अपनी पूरी चमक पर था, आरव अचानक गाँव वापस लौटा। उसने मीरा को उसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया जहाँ उन्होंने कभी साथ खेलने का वादा किया था। मीरा जब वहाँ पहुँची, तो आरव को अपने सामने देखकर उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उस रात चाँदनी की रोशनी में उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर उम्रभर साथ रहने का वचन लिया, जिसे समय की कोई भी दूरी कभी कम नहीं कर सकी।

रेत पर लिखे नाम

समुद्र की लहरें किनारे को बार-बार छू रही थीं और सूरज डूबने की तैयारी में था। कबीर और मीरा हर साल इस समुद्री तट पर आते थे क्योंकि यहीं उनकी पहली मुलाकात हुई थी। इस बार माहौल थोड़ा अलग था क्योंकि कबीर शहर छोड़कर विदेश जाने वाला था और दूरी उनके रिश्ते की परीक्षा लेने वाली थी। मीरा चुपचाप रेत पर कबीर का नाम लिख रही थी और लहरें उसे मिटा रही थीं। कबीर ने मीरा का हाथ थाम लिया और कहा कि नाम भले ही रेत से मिट जाए, लेकिन दिल पर लिखा रिश्ता कभी नहीं मिटेगा। उस शाम दोनों ने वादा किया कि समुद्र की दूरियों के बावजूद उनका प्यार हमेशा अमर रहेगा।

चाय और पुरानी डायरी

सर्दियों की एक शांत सुबह जब रिया अपने पुराने बक्से को साफ कर रही थी, तब उसे कॉलेज के दिनों की एक भूली-बिसरी डायरी मिली। पन्ने पलटने पर उसमें सूखे हुए गुलाब के फूल और राघव के हाथ की कुछ अनकही कविताएँ नजर आईं। कई साल पहले गलतफहमियों के कारण दोनों अलग हो गए थे और शहर छूट गए थे। उस डायरी ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया। रिया ने बिना सोचे-समझे राघव के पुराने नंबर पर एक संदेश भेज दिया। कुछ ही मिनटों बाद फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ राघव की वही जानी-पहचानी आवाज गूंजी। उस एक फोन कॉल ने वर्षों की दूरी को पलभर में मिटा दिया और दोनों ने फिर से मिलने का फैसला किया।

अंतिम पन्ना

किताब-ए-जिंदगी का एक और पन्ना मुड़ गया,
जो कल तक अपना था आज वो पीछे छूट गया।
ढूंढते रहे हम वजह इस दूरी की यारों,
वक्त बदला और हमारा हर सपना रूठ गया।