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कुल 40 परिणाम मिले खोज शब्द: दीवार

अनंत क्षितिज की ओर

एक छोटे से गाँव में मदन नाम का एक युवक रहता था, जिसे पेंटिंग का बहुत शौक था। उसके पास महंगे रंग खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वह प्राकृतिक रंगों जैसे हल्दी, कोयला और फूलों के रस से चित्र बनाता था। गाँव के लोग उसका मखौल उड़ाते थे कि इन साधारण चीज़ों से कभी कोई महान कलाकार नहीं बन सकता। मदन किसी की बात पर ध्यान दिए बिना अपनी कला में लीन रहता था। एक दिन, शहर से एक प्रसिद्ध कला पारखी उस गाँव से गुजरे और मदन की एक झोपड़ी की दीवार पर बनी पेंटिंग को देखा। वह उसकी सृजनात्मकता और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मदन को शहर की एक बड़ी प्रदर्शनी में अपनी कला दिखाने का मौका दिया। वह मोड़ मदन के जीवन का सबसे बड़ा बदलाव साबित हुआ, जहाँ उसकी साधारण सी कला को पूरी दुनिया ने सराहा।
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पुरानी घड़ी का टिक-टिक

दादी जी की अलमारी में रखी दीवार घड़ी बरसों से बंद पड़ी थी, जिसकी सुइयां किसी खास वक्त पर जाकर थम गई थीं। रोहन जब भी उस कमरे में जाता, उसे वह घड़ी पुरानी और बेकार सी लगती थी। एक दिन उसने उस घड़ी को साफ करने और ठीक करने की सोची। जैसे ही उसने चाबी भरी, अचानक से उसके भीतर का तंत्र जाग उठा और उसकी टिक-टिक गूंजने लगी। उस आवाज के साथ ही घर के पुराने और सुनहरे दिन रोहन की आंखों के सामने तैरने लगे। उसे अहसास हुआ कि बीता हुआ वक्त भले ही वापस न आए, लेकिन उसकी यादें हमेशा हमारे दिलों में धड़कती रहती हैं।
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घड़ीसाठ की दुकान

शहर के पुराने बाजार के कोने पर मदन लाल की घड़ियों की एक छोटी सी दुकान थी। लोग उन्हें प्यार से घड़ीसाठ चाचा कहते थे। उनकी दुकान में दीवारों पर टंगी सैकड़ों घड़ियाँ टिक-टिक करती रहती थीं, मानो समय खुद वहाँ आकर ठहर गया हो। मदन लाल हर टूटी हुई घड़ी को बहुत धैर्य से ठीक करते थे। एक दिन एक युवा लड़का अपनी दादाजी की पुरानी और बंद पड़ी घड़ी लेकर उनके पास आया। लड़के ने उदास मन से कहा कि यह अब कभी नहीं चल सकती क्योंकि इसके पूर्जे घिस चुके हैं। मदन लाल ने चश्मा चढ़ाकर घड़ी को ध्यान से देखा, मुस्कुराए और बोले बेटा, समय कभी रुकता नहीं, बस इसे दोबारा सही दिशा में घुमाने की जरूरत होती है। उन्होंने उस घड़ी के अंदर का एक छोटा सा जाम पहिया साफ किया और थोड़ा सा तेल डाला। चंद मिनटों में ही वह बंद घड़ी सुई हिलाने लगी और टिक-टिक की आवाज गूंज उठी। लड़के की आंखें चमक उठीं और उसे जीवन का एक नया सबक मिल गया कि मुश्किलें कितनी भी पुरानी हों, सुधार की गु हमेशा रहती है।
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दीवार पर टंगी पेंटिंग और खामोश रिश्ते

बैठक कक्ष की दीवार पर सजी वह अधूरी पेंटिंग बरसों से किसी के आने का इंतजार कर रही थी। पिता और पुत्र के बीच अनबन ऐसी थी कि दोनों एक छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जीते थे। बेटा कला में नाम कमाना चाहता था, जबकि पिता को लगता था कि यह सब वक्त की बर्बादी है। एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। जब बेटा उनके कमरे की सफाई कर रहा था, तब उसने मेज की दराज में अपनी बनाई हुई वे सारी तस्वीरें पाईं जिन्हें उसने बचपन में कभी फेंका था। हर तस्वीर के पीछे पिता ने गर्व से कुछ शब्द लिख रखे थे। उस पल बेटे को अहसास हुआ कि खामोशी के पीछे कितनी गहरी ममता छिपी थी। उसने अस्पताल जाकर पिता का हाथ थामा और दोनों की आंखें नम थीं, बिना कुछ कहे सब कुछ समझ चुकी थीं।
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अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।
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रेलवे ट्रैक के किनारे बसा आशियाना

हर गुजरती ट्रेन के साथ सोहन के घर की दीवारें कांप उठती थीं। वह सालों से रेलवे लाइन के ठीक पास बनी झुग्गी में रहता था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर इंसान बनाना था। दिनभर धूप में मजदूरी करने के बाद भी उसकी आँखों में एक चमक होती थी। एक दिन, जब उसकी बेटी ने राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया, तो सोहन की आँखें खुशी के आंसुओं से भर गईं। उसे अहसास हुआ कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर नीयत साफ हो और सपने सच्चे हों, तो गरीबी की दीवारें भी एक दिन ढह जाती हैं। उस शाम उसने अपनी बेटी के साथ बैठकर सूखी रोटियां खाईं, लेकिन वो खाना किसी दावत से कम नहीं था।
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खोया हुआ विश्वास

अमित और सोहन बचपन के पक्के यार थे। दोनों हर सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। कॉलेज के दिनों में एक गलतफहमी ने उनके बीच ऐसी दीवार खड़ी की कि दोनों ने दस साल तक एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखा। समय बीतता गया और दोनों अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। एक दिन शहर के एक पुराने बाजार में अचानक दोनों आमने-सामने आ गए। कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर सोहन ने आगे बढ़कर अमित को गले से लगा लिया। उस एक आलिंगन ने बरसों की कड़वाहट को एक पल में धो दिया और दोस्ती का रिश्ता फिर से जीवंत हो उठा।
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दीवार पर टंगी तस्वीर

घर के ड्राइंग रूम की दीवार पर बरसों से धूल फांक रही उस तस्वीर को आज मैंने साफ करने की सोची। वह तस्वीर मेरे कॉलेज के दिनों के सबसे पक्के दोस्त की थी, जिससे किसी छोटी सी गलतफहमी के कारण सालों पहले अनबन हो गई थी। तस्वीर पोछते हुए उसकी आंखें जैसे मुझसे कुछ कह रही थीं। अहंकार और जिद के इन लंबे सालों में हमने न जाने कितनी खूबसूरत शामें गंवा दी थीं। मैंने बिना एक पल गंवाए फोन उठाया और उसका नंबर डायल किया। घंटी बजी और दूसरी तरफ से वही जाना-पहचाना स्वर गूंजा। पुरानी कड़वाहट एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई और सिर्फ दोनों की पुरानी हँसी बाकी रह गई।
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पुरानी हवेली की परछाइयां

गांव के छोर पर बनी खंडहर नुमा हवेली में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था, लेकिन कबीर ने एक शर्त के तहत वहां जाने का फैसला किया। उसने हाथ में टॉर्च ली और लकड़ी के चरमराते दरवाजे को धक्का देकर अंदर कदम रखा। अंदर कदम रखते ही उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सैकड़ों आंखें एक साथ उसी को घूर रही हों। उसने टॉर्च की रोशनी दीवारों पर डाली, जहाँ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं और हर तस्वीर की आंखें उसकी तरफ घूम रही थीं। अचानक एक भारी आवाज गूंजी कि यहाँ से कभी कोई वापस नहीं गया, और दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
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नीली रोशनी का साया

रोहन ने जब अपने नए कमरे में प्रवेश किया, तो उसे दीवारों पर अजीब से नीले धब्बे दिखाई दिए। उसे लगा कि शायद यह सीलन का असर होगा, इसलिए उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। रात के ठीक बारह बजे, कमरे का तापमान अचानक बहुत कम हो गया और एक अजीब सी फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। रोहन ने उठकर देखा तो कोने में रखी पुरानी अलमारी अपने आप खुल रही थी। अलमारी के भीतर से कोई अदृश्य ताकत बाहर आई और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। उसने डरकर आंखें बंद कर लीं और जब सुबह हुई, तो वह कमरा पूरी तरह बदल चुका था।
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रेगिस्तान की सुनसान हवेली

राजस्थान के एक वीरान इलाके में बने पुराने किलेनुमा मकान में सोहन ने एक रात बिताने का फैसला किया। चारों तरफ सिर्फ रेत और खामोश रात का अंधेरा था। जब रात के दो बजे, तो अचानक भारी दरवाजों के अपने आप खुलने और बंद होने की आवाजें आने लगीं। सोहन ने टॉर्च जलाकर देखा, तो दीवार पर लटकी पुरानी पेंटिंग में बने राजा की आंखें जीवित हो उठी थीं और वह उसे घूर रहा था। कमरे का तापमान अचानक शून्य से नीचे गिर गया और पैरों तले रेत खिसकने लगी। वह किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागा, लेकिन पीछे से गूंजती हंसी आज भी उसके कानों में गूंजती है।
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पुरानी घड़ी की सुई

अजय को एंटीक घड़ियाँ जमा करने का शौक था। उसने शहर की एक पुरानी दुकान से एक ऐसी दीवार घड़ी खरीदी जिसकी सुइयां हमेशा उल्टी दिशा में घूमती थीं। रात के ठीक तीन बजे उस घड़ी से टिक-टिक की आवाज के साथ तेज सायरन जैसी आवाज आने लगी। अजय ने जब उसे उतारने की कोशिश की, तो दीवार पर एक परछाई उभर कर सामने आई जो बिल्कुल उसकी अपनी नकल थी लेकिन उसकी आँखें लाल थीं। परछाई ने दीवार से बाहर निकलकर अजय का गला पकड़ लिया और अगले दिन वह घड़ी फिर से अपनी सामान्य रफ्तार से चलने लगी।
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