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कुल 3 परिणाम मिले खोज शब्द: दया

ईमानदार कुम्हार और राजा का पुरस्कार

किसी राज्य में एक साधारण कुम्हार रहता था जिसका नाम मदन था। मदन अपनी कला में अत्यंत निपुण था और वह हमेशा मजबूत और सुंदर मिट्टी के बर्तन बनाता था। एक बार राजा ने अपने दरबार के लिए कुछ विशेष कलात्मक बर्तनों की मांग की। मदन ने महीनों की कड़ी मेहनत के बाद राजा के लिए सबसे उत्कृष्ट बर्तन तैयार किए। जब वह उन्हें राजमहल ले जा रहा था, तब रास्ते में एक गरीब भूखाया यात्री मिला जो ठंड से कांप रहा था। मदन का दिल पसीज गया और उसने अपनी कमाई का कुछ हिस्सा और भोजन उस यात्री को दे दिया। राजदरबार में जब उसने बर्तन प्रस्तुत किए, तो राजा उसकी कला से बहुत प्रभावित हुए। राजा ने उसे भारी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार के रूप में दीं। लेकिन मदन ने केवल उतनी ही राशि स्वीकार की जितने उसके बर्तनों का वास्तविक मूल्य था, और बाकी धन राज्य के गरीबों के कल्याण के लिए वापस कर दिया। राजा उसकी इस परम ईमानदारी और परोपकार की भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे राज्य का मुख्य शिल्कार घोषित किया। मदन ने साबित कर दिया कि ईमानदारी और दयालुता से बढ़कर इस दुनिया में कोई दूसरा आभूषण नहीं है।
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संसार का अनमोल रत्न

एक छोटे से गाँव में मदन नाम का एक दयालु व्यक्ति रहता था। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए आगे रहता था, लेकिन लोग अक्सर उसकी इस सहजता को उसकी कमजोरी समझ लेते थे और उसका फायदा उठाते थे। एक दिन गाँव में एक अजनबी साधु आया और उसने मदन की परीक्षा लेने की सोची। साधु ने मदन से अपनी अंतिम पूंजी भी मांग ली। बिना एक पल सोचे मदन ने अपना सब कुछ साधु को सौंप दिया। तब साधु अपने असली रूप में आए और बोले कि असली धन तो दूसरों के प्रति दया और प्रेम है जो तुम्हारे पास प्रचुर मात्रा में है। उस दिन से गाँव वालों को भी समझ आ गया कि निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण होती है।
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बांटने से बढ़ती है ख़ुशी

एक समृद्ध नगर में रमन नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह स्वभाव से बहुत कंजूस था। वह किसी भी गरीब को एक फूटी कौड़ी भी नहीं देता था। एक बार नगर में भयानक सूखा पड़ा, जिससे लोग भूखों मरने लगे। रमन ने अपने तहखाने में अनाज का भारी भंडार छुपा लिया ताकि कोई मांग न सके। कुछ दिनों बाद रमन को एक गंभीर बीमारी हो गई और उसके सपने में एक फरिश्ता आया। फरिश्ता ने कहा कि जो धन तूने सिर्फ अपने लिए जोड़ा है, वह तेरी आत्मा को सुखा रहा है। डर के मारे रमन ने अगले ही दिन अपना सारा अनाज गरीबों में बांटना शुरू कर दिया। जैसे ही उसने भूखों को खाना खिलाया, उसके मन में एक असीम शांति और प्रसन्नता का अनुभव हुआ। उसकी तबियत भी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। रमन को समझ आ गया कि सच्चा सुख धन जमा करने में नहीं, बल्कि उसे जरूरतमंदों के साथ बांटने में है।
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