अंधेरे कोने का दिया
दीवाली की रात पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। शहर के सबसे पुराने और वीरान कोने में एक छोटा सा घर था, जहाँ बुजुर्ग दीनानाथ अकेले रहते थे। उनके पास दीये खरीदने के भी पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने घर के कोने में सिर्फ एक पुराना मिट्टी का दीया जला रखा था। रास्ते से गुजरने वाले लोग उस वीरान घर को देखकर आगे बढ़ जाते थे। तभी पड़ोस के कुछ बच्चे हाथों में मिठाइयां और ढेरों दीये लेकर दीनानाथ के दरवाजे पर आ पहुंचे। उन्होंने न केवल उस बुजुर्ग के घर को रोशन किया, बल्कि उनके साथ बैठकर दीवाली की खुशियां भी बांटीं। उस छोटे से दीये की रोशनी अब पूरे घर में फैल चुकी थी और दीनानाथ की उदासी हमेशा के लिए दूर हो गई थी।
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