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लोहे के पुल पर खड़ा संगीतकार

शहर के पुराने लोहे के पुल पर हर शाम एक बूढ़ा संगीतकार अपने फटे पुराने हारमोनियम के साथ आकर बैठ जाता था। उसके सुरों में एक ऐसा जादू था जो राह चलते लोगों के कदम रोक लेता था। उस शाम आसमान में काले बादल घिरे थे और तेज ठंडी हवा चल रही थी। संगीतकार की उंगलियां ठंड से कांप रही थीं, फिर भी उसने अपना वाद्य यंत्र नहीं छोड़ा। तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और उसने अपनी गुल्लक से निकाले गए कुछ सिक्के संगीतकार की झोली में डाल दिए। बच्चे की आंखों में एक अनोखी चमक थी जो संगीतकार के सूनेपन को चीर गई। उस पल बूढ़े कलाकार को ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी बरसों की साधना सफल हो गई हो। उसने अपनी आंखें बंद कीं और पुल के सन्नाटे में एक नया, जीवंत राग छेड़ दिया, जिसने उस सर्द शाम को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

कागज का हवाई जहाज

बचपन के दिनों में रोहन और सोहन पन्ने फाड़कर खूबसूरत कागज के हवाई जहाज बनाते थे और उन्हें छत से आसमान की तरफ उड़ाते थे। दोनों ने मिलकर यह सपना देखा था कि वे बड़े होकर एक दिन सचमुच के विमान के पायलट बनेंगे। वक्त का पहिया घूमा और रोहन एक व्यस्त कॉर्पोरेट दफ्तर में कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने उलझ कर रह गया, जबकि सोहन का सपना अधूरा ही छूट गया। एक दिन सफाई करते समय रोहन के हाथ धूल से सना हुआ वही पुराना कागज का जहाज लगा, जिसे उन्होंने बचपन में साथ मिलकर बनाया था। उस कागज के टुकड़े को देखते ही रोहन को अपनी असली मंजिल और बचपन का वो बेफिक्र उत्साह याद आ गया। उसने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और अपने सपनों को नई उड़ान देने के लिए विमानन क्षेत्र की ओर कदम बढ़ा दिए।

सुनहरी धूप का अहसास

सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो सोहन की आँख खुली। उसने देखा कि उसका प्यारा कुत्ता टॉम उसके बिस्तर के पास बैठा उसकी तरफ टकटकी लगाए देख रहा था। सोहन पिछले कुछ महीनों से एक गंभीर बीमारी के कारण बिस्तर पर था और उसका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट चुका था। टॉम का यह रोजाना का नियम था कि वह सूरज उगते ही सोहन को जगाता और उसे बाहर बगीचे में जाने के लिए प्रेरित करता था। उस दिन सोहन نے हिम्मत जुटाई, टॉम का सहारा लिया और धीरे-धीरे कदमों से घर के आंगन में रखे चबूतरे तक पहुँचा। चबूतरे पर पड़ी सुनहरी धूप ने जैसे ही उसके चेहरे को छुआ, उसके भीतर एक नई ऊर्जा और जीने की चाह जाग उठी। उसे समझ आ गया कि जीवन की हर सुबह एक नया अवसर लेकर आती है।

पहाड़ की चोटी पर

सुबह की पहली किरण के साथ ही राहुल ने अपने सफर की शुरुआत कर दी थी। लक्ष्य था उस विशाल पहाड़ की चोटी तक पहुँचना, जिसे आज तक कोई अकेला नहीं चढ़ पाया था। रास्ते में कंकड़-पत्थर और तेज ठंडी हवाएं उसका रास्ता रोक रही थीं। कई बार उसके पैर फिसले और उसे लगा कि अब आगे बढ़ना नामुमकिन है। लेकिन उसने पीछे मुड़कर देखने से इनकार कर दिया। हर कदम के साथ उसकी सांसें तेज हो रही थीं, पर हौसला और बुलंद होता जा रहा था। आखिरकार, सूरज ढलने से ठीक पहले वह चोटी पर जा पहुँचा। उसने चारों तरफ नजर घुमाई, नीचे बादलों का समंदर फैला हुआ था और ठंडी हवा उसके माथे को चूम रही थी। उस ऊंचाई पर खड़े होकर उसने महसूस किया कि कठिनाइयां सिर्फ हमें मजबूत बनाने के लिए आती हैं। मंजिल की वह जीत सारे दर्दों को पल भर में भुला देने के लिए काफी थी।

गुमशुदा चाबी

रमेश बाबू पिछले दस साल से अपनी पुरानी अलमारी की चाबी तलाश रहे थे। हर कोने को छान मारा, लेकिन चाबी का कहीं अता-पता नहीं था। उस अलमारी में उनके बचपन की यादें और कुछ खास दस्तावेज बंद थे। आज जब वे घर की सफाई कर रहे थे, तो अचानक रसोई के एक पुराने डिब्बे से वह जंक लगी चाबी हाथ लग गई। उनके चेहरे पर खुशी की एक चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अलमारी की तरफ कदम बढ़ाया और ताले में चाबी घुमाई। ताला खुल गया और बरसों पुरानी धूल उड़ने लगी। लेकिन जब उन्होंने भीतर झांका, तो उनका दिल बैठ गया। समय के दीमक ने सब कुछ कागजों को कुतर डाला था। जो खजाना वे सहेज कर रखना चाहते थे, वह अब सिर्फ राख और टुकड़ों में बदल चुका था। रमेश बाबू समझ गए कि कुछ चीजें खो जाने के बाद दोबारा मिलने पर भी उनका कोई अर्थ नहीं बचता।

गाँव की धूल भरी सड़क पर कदम

शहर की चकाचौंध से थक कर सोहन पंद्रह साल बाद अपने पैतृक गाँव लौटा था। कंक्रीट के जंगलों में भागते-भागते वह अपनी जड़ों को भूल चुका था। जैसे ही उसने गाँव की सीमा में कदम रखा, वही पुरानी सोंधी मिट्टी की महक और दूर खेतों से आती बांसुरी की धुन ने उसका स्वागत किया। उसे डर था कि शायद अब उसे कोई पहचानेगा भी नहीं। लेकिन तभी पेड़ की छांव में बैठे ताऊजी ने उसे दूर से ही पहचान लिया और दौड़कर गले लगा लिया। गाँव के लोगों का वह अपनापन देखकर सोहन की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि दुनिया चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, असली सुकून अपने लोगों के बीच और अपनी मातृभूमि की गोद में ही मिलता है। उस शाम उसने चैन की सांस ली और शहर वापस जाने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया।

घर वापसी का अनचाहा सफर

सालों बाद जब सोहन अपने पैतृक गांव की धूल भरी पगडंडी पर उतरा, तो उसके कदम खुद-ब-खुद उस टूटे हुए घर की तरफ बढ़ गए जिसे वह कभी छोड़कर भागा था। शहर की चमक-धमक में उसने सब कुछ पा लिया था, सिवाय उस सुकून के जो उसे अपनी माँ के आंचल में मिलता था। जब उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो दिल जोर से धड़क रहा था। अंदर से बूढ़े हाथों ने दरवाजा खोला और सामने उसकी माँ खड़ी थी। बिना किसी उलाहना या शिकायत के, माँ ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। उस एक आलिगन में शहर की सारी थकान और वर्षों का अकेलापन पल भर में काफूर हो गया। सोहन को समझ आ गया कि सफलता की ऊंची इमारतें उस मिट्टी के घर के आगे बिल्कुल फीकी हैं जहाँ माँ का प्यार बसता है।

पुरानी छत और नए सपने

शहर की चकाचौंध से दूर जब मैं अपने पुस्तैनी घर लौटा, तो छत की ईंटें मुझे अपनी दास्तान सुनाने लगीं। यहीं बैठकर कभी मैंने खुले आसमान में ऊंचे उड़ने के सपने देखे थे। वक्त के साथ जिम्मेदारियों के बोझ ने उन सपनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। आज जब मैंने धूल जमी छत पर कदम रखा, तो बचपन की पतंगबाजी की यादें ताजा हो गईं। मेरे बेटे ने मेरे हाथ में एक कच्ची डोर थमाई और खुद पतंग आसमान में लहराने लगा। उस उड़ती हुई पतंग को देखकर मुझे एहसास हुआ कि सपने कभी मरते नहीं, बस उनका रंग बदल जाता है। पुरानी छत ने मुझे मेरे बचपन से दोबारा मिला दिया और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई।

गुमशुदा यादों का शहर

रमेश बाबू कई वर्षों बाद उस शहर लौटे थे जहाँ उन्होंने अपनी जवानी के सुनहरे दिन बिताए थे। शहर की हर गली बदल चुकी थी, ऊँची इमारतें और चौड़ी सड़कें बन चुकी थीं। उनके कदम खुद-ब-खुद उस पुराने बाजार की तरफ बढ़े जहाँ कभी उनकी चाय की दुकान हुआ करती थी। दुकान की जगह अब एक बड़ा शॉपिंग मॉल खड़ा था, जिसे देखकर उनका दिल भर आया। अचानक उनकी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी जो कोने में बैठकर पेंटिंग बेच रहे थे। वह और कोई नहीं, उनका कॉलेज के दिनों का जिगरी यार सोहन था, जिससे किसी गलतफहमी के कारण पचास साल पहले रिश्ता टूट गया था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे कसकर गले लग गए। समय ने उनके चेहरे पर झुर्रियाँ भले ही डाल दी थीं, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक और अपनेपन का एहसास आज भी जिंदा था।

रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।

पुरानी हवेली की परछाइयां

गांव के छोर पर बनी खंडहर नुमा हवेली में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था, लेकिन कबीर ने एक शर्त के तहत वहां जाने का फैसला किया। उसने हाथ में टॉर्च ली और लकड़ी के चरमराते दरवाजे को धक्का देकर अंदर कदम रखा। अंदर कदम रखते ही उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सैकड़ों आंखें एक साथ उसी को घूर रही हों। उसने टॉर्च की रोशनी दीवारों पर डाली, जहाँ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं और हर तस्वीर की आंखें उसकी तरफ घूम रही थीं। अचानक एक भारी आवाज गूंजी कि यहाँ से कभी कोई वापस नहीं गया, और दरवाजा अपने आप बंद हो गया।