रेलवे स्टेशन का वह अंतिम पत्र
प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी गूंज रही थी और आलोक के हाथ में एक मुड़ा हुआ लिफाफा था। यह लिफाफा उसकी छोटी बहन ने उसे तब दिया था जब वह सालों पहले घर छोड़कर शहर आया था। उस समय गुस्से में उसने इसे पढ़ा तक नहीं था और अपनी बैग की सबसे निचली तह में दबा दिया था। आज जब वह अपने पैतृक घर लौट रहा था, पुरानी अलमारी समेटते वक्त उसे यह पत्र मिला। जैसे ही उसने लिफाफा फाड़ा, अंदर से कुछ सूखे हुए चमेली के फूल और बहन के सुंदर अक्षरों में लिखा संदेश निकला। बहन ने लिखा था कि चाहे रास्ते कितने भी अलग क्यों न हो जाएं, भाई का दरवाजा हमेशा उसके लिए खुला रहेगा। उस एक पन्ने ने आलोक की आंखें खोल दी और उसका सारा अहंकार एक पल में पिघल गया। वह ट्रेन से उतरते ही सीधा अपनी बहन के घर की तरफ दौड़ पड़ा, जहां सदियों का सूनापन प्यार की एक झप्पी में बदल गया।
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