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"अहंकार" के लिए परिणाम

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कुल 11 परिणाम मिले खोज शब्द: अहंकार

रेलवे स्टेशन का वह अंतिम पत्र

प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी गूंज रही थी और आलोक के हाथ में एक मुड़ा हुआ लिफाफा था। यह लिफाफा उसकी छोटी बहन ने उसे तब दिया था जब वह सालों पहले घर छोड़कर शहर आया था। उस समय गुस्से में उसने इसे पढ़ा तक नहीं था और अपनी बैग की सबसे निचली तह में दबा दिया था। आज जब वह अपने पैतृक घर लौट रहा था, पुरानी अलमारी समेटते वक्त उसे यह पत्र मिला। जैसे ही उसने लिफाफा फाड़ा, अंदर से कुछ सूखे हुए चमेली के फूल और बहन के सुंदर अक्षरों में लिखा संदेश निकला। बहन ने लिखा था कि चाहे रास्ते कितने भी अलग क्यों न हो जाएं, भाई का दरवाजा हमेशा उसके लिए खुला रहेगा। उस एक पन्ने ने आलोक की आंखें खोल दी और उसका सारा अहंकार एक पल में पिघल गया। वह ट्रेन से उतरते ही सीधा अपनी बहन के घर की तरफ दौड़ पड़ा, जहां सदियों का सूनापन प्यार की एक झप्पी में बदल गया।
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समुद्र किनारे रेत पर लिखा हुआ नाम

अनंत ने अपनी जिंदगी के कई साल सिर्फ पैसे कमाने की अंधी दौड़ में बिता दिए थे। इस दौड़ में वह अपने पुराने दोस्तों और परिवार से दूर हो गया था। जब वह तनाव से घिर गया, तो वह शहर छोड़कर समुद्र के शांत किनारे पर चला गया। वहाँ उसने गीली रेत पर अपने बचपन के सबसे अच्छे दोस्त का नाम लिखा, जिससे उसकी अनबन हो गई थी। लहरें आईं और उस नाम को अपने साथ बहा ले गईं। उस पल उसे समझ आया कि जिद और अहंकार से कुछ नहीं मिलता, रिश्ते रेत की तरह होते हैं जिन्हें बहुत संभाल कर रखना पड़ता है। उसने तुरंत अपने फोन से अपने दोस्त को फोन मिलाया।
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बचपन की गुल्लक और पुराना कर्ज

दुकान के कोने में धूल फांक रही पुरानी लकड़ी की गुल्लक देखकर मदन को अपने बचपन के वे दिन याद आ गए जब उसने एक-एक सिक्का जोड़कर अपनी बहन की शादी के लिए पैसे बचाए थे। आज मदन खुद एक बड़े बैंक का मैनेजर था, जिसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह अंदर से बहुत अकेला हो चुका था। उसने जब उस गुल्लक को खोला, तो उसके अंदर से बचपन की एक पर्ची निकली जिस पर लिखा था- मेरा सबसे बड़ा धन मेरा परिवार है। इस एक वाक्य ने उसकी आंखों से अहंकार का पर्दा हटा दिया। उसी रात उसने अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकाला और फोन उठाकर अपने बिछड़े हुए भाई को गले मिलने के लिए आमंत्रित किया।
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दीवार पर टंगी तस्वीर

घर के ड्राइंग रूम की दीवार पर बरसों से धूल फांक रही उस तस्वीर को आज मैंने साफ करने की सोची। वह तस्वीर मेरे कॉलेज के दिनों के सबसे पक्के दोस्त की थी, जिससे किसी छोटी सी गलतफहमी के कारण सालों पहले अनबन हो गई थी। तस्वीर पोछते हुए उसकी आंखें जैसे मुझसे कुछ कह रही थीं। अहंकार और जिद के इन लंबे सालों में हमने न जाने कितनी खूबसूरत शामें गंवा दी थीं। मैंने बिना एक पल गंवाए फोन उठाया और उसका नंबर डायल किया। घंटी बजी और दूसरी तरफ से वही जाना-पहचाना स्वर गूंजा। पुरानी कड़वाहट एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई और सिर्फ दोनों की पुरानी हँसी बाकी रह गई।
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माँ के हाथ की आखिरी चाय

नौकरी के सिलसिले में महानगर आए रोहन को हमेशा से अपनी व्यस्त जीवनशैली पर गर्व था। माँ जब भी गांव से फोन करतीं, वह काम का बहाना बनाकर बात टाल देता था। एक दिन अचानक माँ का स्वास्थ्य बिगड़ने का समाचार मिला और वह तुरंत गांव के लिए रवाना हुआ। जब वह घर पहुंचा, तो माँ की सांसें थम चुकी थीं, लेकिन उनके पलंग के पास चायदानी और एक कप गरम चाय रखी थी, जिसे उन्होंने शायद बेटे के आने की आस में बनाया था। उस ठंडी हो चुकी चाय को देखकर रोहन का अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। उसे समझ आया कि सफलता की दौड़ में वह अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो चुका था।
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अंधेरे में जलता दीपक

घने जंगल के बीच एक छोटी सी कुटिया में एक संत रहते थे। उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। एक शाम एक अहंकारी विद्वान उनके पास आया और व्यंग्य से पूछा कि आपके इस छोटे से दीपक से इस विशाल जंगल का अंधेरा कैसे दूर हो सकता है। संत ने बिना किसी क्रोध के बड़े शांत भाव से उत्तर दिया कि यह दीपक पूरे जंगल का अंधेरा भले ही न मिटा पाए, लेकिन यह मेरे आसपास के रास्ते को तो रोशन कर ही रहा है, जिससे मैं ठोकर खाने से बच जाता हूं। विद्वान संत का यह उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। हमें दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने हिस्से का प्रकाश खुद फैलाना चाहिए, तभी समाज में वास्तविक बदलाव संभव हो पाता है।
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लोभी चरवाहा और जादुई पत्थर

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक चरवाहा रहता था। वह अपनी भेड़ों को चराने के लिए प्रतिदिन दूर जंगल में जाया करता था। एक दिन, उसे जंगल में एक चमकता हुआ पत्थर मिला जिसके बारे में मान्यता थी कि वह इच्छाएं पूरी कर सकता है। सोहन ने उस पत्थर से अपार धन और महल की मांग की। रातोंरात उसका जीवन बदल गया और वह बहुत अमीर बन गया। उसके पास सब कुछ था, लेकिन उसका लालच दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया। वह अपने पुराने मित्रों और परिवार से दूर हो गया और किसी पर भरोसा नहीं करता था। धीरे-धीरे उसका अहंकार और लोभ इतना बढ़ गया कि उसने गरीबों की मदद करना बिल्कुल बंद कर दिया। एक दिन अचानक एक बड़ी आपदा आई और उसका सारा वैभव एक ही झटके में नष्ट हो गया। महल ढह गया और धन भी समाप्त हो गया। तब सोहन को समझ आया कि अत्यधिक लालच हमेशा बर्बादी का कारण बनता है। वह अपनी गलतियों पर बहुत पछताया और उसने दोबारा मेहनत से ईमानदारी का जीवन जीने का संकल्प लिया। अंततः उसने सीखा कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है और सादा जीवन ही वास्तविक सुख देता है।
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बुद्धिमान शिल्पकार की मूर्ति

किसी नगर में एक बहुत ही प्रसिद्ध शिल्पकार रहता था जो बेहद सुंदर और जीवंत मूर्तियाँ बनाने के लिए जाना जाता था। उसकी बनाई हर मूर्ति में एक अद्भुत आकर्षण होता था जिससे लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। एक दिन उसके मन में अहंकार आ गया और उसे लगा कि उससे बेहतर कलाकार इस पूरी दुनिया में और कोई नहीं है। कुछ समय बाद एक वृद्ध साधु उसकी कार्यशाला में आए और उन्होंने शिल्पकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारी कला सचमुच अद्भुत है। लेकिन इसके साथ ही साधु ने यह भी कहा कि इन सुंदर मूर्तियों में एक छोटी सी कमी है जिसे केवल एक समझदार व्यक्ति ही पहचान सकता है। शिल्पकार को बहुत गुस्सा आया और उसने तुरंत पूछा कि मेरी कला में ऐसी कौन सी कमी हो सकती है। साधु मुस्कुराए और बोले कि अहंकार तुम्हारी इस कला की चमक को धीरे-धीरे खा रहा है। यह बात सुनकर शिल्पकार का घमंड चकनाचूर हो गया और उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने साधु के चरणों में झुककर क्षमा माँगी और अपनी कला में विनम्रता को अपना मुख्य गुण बना लिया। इस प्रकार उसने समझा कि कला और जीवन दोनों में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता।
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चित्रकार और दर्पण

नगर के प्रसिद्ध चित्रकार विक्रम अपनी कला के लिए पूरे राज्य में जाने जाते थे। वह जब भी किसी का चित्र बनाते, तो उसकी खामियों को छिपाकर उसे और भी सुंदर बना देते थे। एक दिन एक गरीब और साधारण दिखने वाला वृद्ध उनके पास आया और अपना चित्र बनवाने की इच्छा जताई। विक्रम ने उसे देखा और सोचा कि इसका चित्र बनाने से कोई ख्याति नहीं मिलेगी, इसलिए उसने जानबूझकर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और एक साधारण सी तस्वीर थमा दी। वृद्ध ने तस्वीर ली और मुस्कुराते हुए कहा कि असली चित्रकार वही है जो बाहरी रूप के साथ-साथ भीतर की सच्चाई को भी कैनवास पर उतार सके। उसने विक्रम को एक जादुई दर्पण दिया जिसमें इंसान का असली चरित्र दिखाई देता था। उस दर्पण में देखने पर विक्रम को अपनी कला का अहंकार साफ नजर आया। उसे अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने कसम खाई कि वह कभी भी किसी इंसान को उसकी बाहरी स्थिति से नहीं आंकेगा।
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सच्चा मार्ग और कल्पवृक्ष

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक बहुत ही मेहनती युवक रहता था। वह दिन-रात अपने खेतों में कड़ी मेहनत करता था, लेकिन उसकी किस्मत उसका साथ नहीं दे रही थी। एक दिन उसे जंगल में एक जादुई पेड़ मिला, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह जो मांगो वही दे देता है। सोहन ने सबसे पहले अपार धन मांगा और कुछ ही पलों में वह अमीर बन गया। धन मिलते ही उसके सारे पुराने दोस्त और रिश्तेदार उससे दूर होने लगे और उसके मन में अहंकार और डर घर कर गया। कुछ समय बाद उसे यह समझ आ गया कि बिना मेहनत के मिला हुआ धन और सुख केवल भ्रम है और इससे इंसान का असली सुकून छिन जाता है। उसने उस वैभव को छोड़कर वापस अपने खेतों की मिट्टी में पसीना बहाना शुरू किया। इस बार उसे वास्तविक शांति और खुशी प्राप्त हुई, क्योंकि उसने समझ लिया कि पक्के परिश्रम से कमाया गया धन ही इंसान का सबसे बड़ा आभूषण होता है और शॉर्टकट कभी भी सच्ची सफलता नहीं दे सकते।
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घमंड का परिणाम

घने जंगल में एक बहुत ही तेज दौड़ने वाला हिरण रहता था। उसे अपनी गति पर बड़ा घमंड था। वह अक्सर कछुए और अन्य धीमे जीवों का मजाक उड़ाया करता था। एक दिन जंगल में एक चुनौती प्रतियोगिता रखी गई। हिरण ने सबसे पहले अपना नाम लिखवाया और कछुए को दौड़ के लिए ललकारा। सभी जानवर इस अनोखी प्रतियोगिता को देखने के लिए एकत्रित हुए। दौड़ शुरू होते ही हिरण हवा से बातें करने लगा और बहुत आगे निकल गया। रास्ते में एक घना पेड़ देखकर उसने सोचा कि कछुए को आने में अभी बहुत देर है, इसलिए थोड़ी देर आराम कर लिया जाए। हिरण पेड़ की छांव में गहरी नींद सो गया। दूसरी ओर कछुआ बिना रुके धीरे-धीरे अपनी चाल से चलता रहा और निर्धारित समय पर फिनिश लाइन तक पहुँच गया। जब हिरण की आँख खुली तो कछुआ जीत चुका था। हिरण का घमंड चूर-चूर हो गया और उसे समझ आ गया कि अहंकार हमेशा पतन की ओर ले जाता है।
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