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कुल 81 परिणाम मिले खोज शब्द: खुशी

सपनों का नया सवेरा

सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से अंदर आई, तो राहुल की आँखें खुल गईं। आज उसका इंटरव्यू था, जिसके लिए उसने महीनों से रात-दिन एक कर दिए थे। उसके पिता की साइकिल की दुकान से लेकर इस शहर के बड़े दफ्तर तक का सफर आसान नहीं था। अचानक रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गई और उसे लगा कि आज सब खत्म हो गया है। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और दौड़कर समय पर दफ्तर पहुँच गया। जब इंटरव्यू के बाद उसे चयन का पत्र मिला, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और हर नई सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है।
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कागज की नाव और उम्मीद का समंदर

बरसात की पहली फुहार के साथ ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में कागज की नावें तैराने लगे थे। नन्हें हाथों द्वारा बनाई गई वे रंगबिरंगी नावें पानी के तेज बहाव के साथ आगे बढ़ रही थीं। एक कोने में खड़े होकर मैं अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा जब हर छोटी सी जीत पर दिल खुशी से झूम उठता था। तभी एक छोटी सी नाव भंवर में फंसकर डूबने लगी, जिसे देखकर मेरा दिल बैठ गया। लेकिन अगले ही पल पानी के एक शांत बहाव ने उसे फिर से उबार लिया। जीवन की कसौटी भी कुछ ऐसी ही है, जहां हार के डर के बाद ही असली जीत का रास्ता दिखाई देता है।
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अंतिम पन्नों की दास्तान

अमित को अपने दादा जी की अलमारी से एक डायरी मिली जिसके आखिरी पन्ने पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं। दादा जी हमेशा कम बोलते थे और अपने कमरे में अकेले रहना पसंद करते थे, इसलिए अमित उन्हें कभी समझ नहीं पाया था। जब उसने डायरी के वो पन्ने पढ़े, तो उसे पता चला कि दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ परिवार को संवारने के लिए अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपना पुश्तैनी मकान भी बच्चों की पढ़ाई के लिए बेच दिया था, पर कभी किसी को जुबान से शिकवा नहीं किया। अमित की आँखों से पछतावे के आंसू बहने लगे क्योंकि उसने कई बार अपने दादा जी से ऊंची आवाज में बात की थी। वह दौड़कर दादा जी के कमरे में गया, उन्हें कसकर गले लगा लिया और पहली बार उन्हें एहसास कराया कि वह उनसे कितना प्यार करता है।
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मिट्टी के दीये और उम्मीद की लौ

दीपावली की रात थी और पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। लेकिन शहर के एक कोने में बूढ़े मंगेश चाचा अभी भी अपनी टूटी हुई झोपड़ी के बाहर अंधेरे में बैठे मिट्टी के दीये बेच रहे थे। महंगाई के इस दौर में अब चाइनीज लड़ियों के आगे किसी को मिट्टी के दीये कहां भाते हैं। मंगेश चाचा की आँखें सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देख रही थीं कि शायद कोई तो उनके बनाए दीये खरीदेगा ताकि घर में चूल्हा जल सके। तभी वहां एक छोटा बच्चा अपने माता-पिता के साथ आया और उसने चाचा की टोकरी के सारे दीये खरीदने की जिद पकड़ ली। बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो इन्हीं दीयों से होती है। उस बच्चे की बात सुनकर मंगेश चाचा के बुझते हुए दिल में उम्मीद की एक नया दीया जल उठा और उनकी आँखें खुशी से छलक आईं।
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रेगिस्तान में खिलता हुआ गुलाब

रमेश बाबू ने अपनी जिंदगी के पचास साल एक वीरान रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हुए बिता दिए थे। उनके दोनों पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। वह हर महीने अपनी कमाई का आधा हिस्सा पास के अनाथालय में दान कर देते थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे अपने बुढ़ापे के लिए क्यों नहीं बचाते, तो रमेश ने कहा कि दूसरों के चेहरों पर खुशी देखना ही उनका असली बैंक बैलेंस है। एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ा अधिकारी उतरा, जिसने बचपन में रमेश के दिए पैसों से ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस अधिकारी ने रमेश को गले लगाया और उनकी सालों की मेहनत रंग लाई। रमेश की आंखें भर आईं और उन्हें महसूस हुआ कि उनका जीवन वास्तव में सार्थक हो गया था।
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बचपन की वह नीली साइकिल

गरीबी के दिनों में सोहन का एकमात्र सपना एक नीली साइकिल खरीदने का था। उसके पिता ने दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे पैसे जोड़े और उसके जन्मदिन पर उसे वही साइकिल तोहफे में दी। सोहन की खुशी का ठिकाना नहीं था, उसने उस साइकिल को हमेशा अपनी जान से ज्यादा संभाला। वक्त बदला, सोहन बड़ा हुआ और शहर की एक नामी कंपनी में अफसर बन गया। आज उसके पास बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन जब भी वह पुरानी साइकिल को गैराज में देखता है, उसे अपने पिता के माथे का वह पसीना याद आ जाता है जो उन्होंने उसकी खुशी के लिए बहाया था। भौतिक सुखों से परे उस साइकिल में उसके पिता का आशीर्वाद और त्याग बसता था।
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समुद्र तट पर बिखरे सीप

सुबह की ठंडी हवा में एक बूढ़ा व्यक्ति समुद्र तट पर टहल रहा था और रेत पर बिखरे सीपों को ध्यान से देख रहा था। उसके साथ चल रहा युवा पोता यह सब देखकर हैरान था कि दादाजी हर साधारण सीप को उठाकर क्यों देख रहे हैं। तभी दादाजी को एक ऐसा सीप मिला जिसके भीतर एक चमकता हुआ मोती था, जिसे देखकर दोनों की आँखें खुशी से चमक उठीं। दादाजी ने पोते को बताया कि जैसे समुद्र की लहरें हर सीप को कीमती नहीं बनातीं, वैसे ही जीवन के थपेड़े हमें मजबूत और अनमोल बनाते हैं। इस सीख ने युवक की सोच को पूरी तरह बदल दिया और उसने अपने कठिन दिनों को एक अवसर के रूप में देखना शुरू कर दिया।
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अक्षरों का सफर और ज्ञान की रोशनी

गाँव की एक बुजुर्ग महिला राधा को हमेशा इस बात का पछतावा रहता था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाई और पढ़-लिख नहीं सकती। उसके पोते ने जब उसे उसकी असमर्थता पर उदास देखा, तो उसने अपनी दादी को पढ़ाने का जिम्मा उठाया। शुरुआत में राधा को अक्षर पहचानना बहुत कठिन लगता था और वह हार मानने लगी थी। पोते ने उसे समझाया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, बस इरादा पक्का होना चाहिए। धीरे-धीरे राधा ने स्लेट पर क ख ग लिखना शुरू किया और कुछ ही महीनों में वह अखबार पढ़ने लगी। जब उसने पहली बार खुद के हस्ताक्षर किए, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने साबित कर दिया कि अगर दिल में सीखने की ललक हो, तो हर नामुमकिन काम मुमकिन हो जाता है।
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संतोष का असली खजाना

पुरानी हवेली के पास रहने वाला गोपाल हमेशा धनवान बनने के सपने देखता था। उसके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन और रहने के लिए घर था, फिर भी उसका मन हमेशा अशांत रहता था क्योंकि उसके पास विलासिता की वस्तुएं नहीं थीं। एक रात उसे सपने में एक परी ने एक जादुई थैली दी जिसमें से कभी सोना खत्म नहीं होता था। गोपाल खुशी से पागल हो गया और दिन-रात और अधिक सोना इकट्ठा करने में लग गया। कुछ दिनों बाद उसे अहसास हुआ कि सोने की चिंता में उसकी नींद और चैन दोनों छिन चुके हैं। उसने तुरंत वह थैली वापस लौटा दी और समझ गया कि मन का संतोष ही दुनिया का सबसे बड़ा धन है।
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सच्चा मार्ग और कल्पवृक्ष

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक बहुत ही मेहनती युवक रहता था। वह दिन-रात अपने खेतों में कड़ी मेहनत करता था, लेकिन उसकी किस्मत उसका साथ नहीं दे रही थी। एक दिन उसे जंगल में एक जादुई पेड़ मिला, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह जो मांगो वही दे देता है। सोहन ने सबसे पहले अपार धन मांगा और कुछ ही पलों में वह अमीर बन गया। धन मिलते ही उसके सारे पुराने दोस्त और रिश्तेदार उससे दूर होने लगे और उसके मन में अहंकार और डर घर कर गया। कुछ समय बाद उसे यह समझ आ गया कि बिना मेहनत के मिला हुआ धन और सुख केवल भ्रम है और इससे इंसान का असली सुकून छिन जाता है। उसने उस वैभव को छोड़कर वापस अपने खेतों की मिट्टी में पसीना बहाना शुरू किया। इस बार उसे वास्तविक शांति और खुशी प्राप्त हुई, क्योंकि उसने समझ लिया कि पक्के परिश्रम से कमाया गया धन ही इंसान का सबसे बड़ा आभूषण होता है और शॉर्टकट कभी भी सच्ची सफलता नहीं दे सकते।
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अनोखा उपहार और सच्ची मुस्कान

सोनू बहुत ही अमीर घराने का बच्चा था जिसे उसके जन्मदिन पर हर साल महंगे खिलौने मिलते थे। इस बार उसने अपने जन्मदिन पर शहर के गरीब बच्चों के साथ अपनी खुशियाँ बांटने का अनोखा फैसला किया। उसने अपनी पुरानी मगर अच्छी किताबें और खिलौने उन जरूरतमंद बच्चों में बांट दिए। जब उसने एक छोटे बच्चे के चेहरे पर अपनी पुरानी खिलौना गाड़ी पाकर खुशी की चमक देखी, तो उसे जो सुकून मिला वह किसी भी नए खिलौने से नहीं मिल सकता था। उस दिन सोनू को समझ आया कि अपनी चीजें बांटने से मिलने वाली खुशी सबसे बड़ी होती है।
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सच्चा संतोष

पहाड़ियों की तलटी में एक गरीब कुम्हार रहता था जो मिट्टी के सुंदर बर्तन बनाकर अपना गुजारा करता था। वह जो भी कमाता, उसमें पूरी तरह संतुष्ट रहता था। एक दिन नगर का एक अमीर व्यापारी उसके पास आया। व्यापारी ने कुम्हार की सादगी और ख़ुशी को देखकर पूछा कि तुम इतने कम में कैसे खुश रह लेते हो? कुम्हार ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं कल की चिंता नहीं करता और आज में जीता हूँ। व्यापारी ने अपनी तिजोरी से सोने के सिक्कों की थैली निकालकर कुम्हार को दी और कहा कि इसे रखो और और अमीर बनो। कुम्हार ने पहले तो मना किया, फिर व्यापारी के ज्यादा जोर देने पर ले ली। उस रात कुम्हार को नींद नहीं आई। वह पूरी रात सोने के सिक्कों को चोरों से बचाने के लिए पहरा देता रहा। सुबह होते ही वह थक चुका था और उसकी ख़ुशी गायब हो चुकी थी। उसने तुरंत व्यापारी को सिक्के वापस लौटा दिए और कहा कि मुझे इस धन की नहीं, बल्कि उस सुकून की जरूरत है जो मेरी सादगी में था।
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