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कुल 22 परिणाम मिले खोज शब्द: आदत

पुरानी लकड़ी की कलाकृति

एक बूढ़ा बढ़ई था जो लकड़ी के बेकार और टूटे-फूट टुकड़े उठाकर अपनी कार्यशाला के कोने में रख देता था। लोग उसकी इस आदत पर हंसते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वह कचरा इकट्ठा कर रहा है। लेकिन उस बूढ़े बढ़ई की नजर उन टुकड़ों की कमियों पर नहीं, बल्कि उनमें छुपी हुई कला पर होती थी। एक दिन गाँव में एक बड़ी प्रदर्शनी लगी, जहाँ बड़े-बड़े कलाकार अपनी शानदार मूर्तियाँ लेकर आए थे। उसी प्रदर्शनी में जब उस बूढ़े बढ़ई ने उन बेकार लकड़ियों से तराशकर एक अद्भुत सजीव मूर्ति सबके सामने रखी, तो सब देखते रह गए। उसने साबित कर दिया कि कोई भी चीज़ बेकार नहीं होती, बस उसे देखने और तराशने वाला सही कलाकार होना चाहिए। ठीक इसी प्रकार हमारे भीतर छिपी प्रतिभा को भी बस सही मार्गदर्शन और आत्म-विश्वास की आवश्यकता होती है, जिससे हम असाधारण बन सकते हैं।
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झूठ का कड़वा सच

राकेश अपने विद्यालय में हमेशा अपनी झूठी शान दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें किया करता था। उसके दोस्तों को उसकी इन बातों पर हंसी आती थी, पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आया। एक दिन उसने मजाक में एक बड़ी मुसीबत आने की झूठी अफवाह फैला दी, जिससे पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। जब लोगों को सच्चाई का पता चला, तो सबने राकेश से दूरी बना ली और उसकी बात पर विश्वास करना हमेशा के लिए बंद कर दिया। जब सचमुच एक दिन राकेश पर संकट आया, तो उसकी मदद करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया क्योंकि सब उसका झूठ समझ बैठे थे। तब उसे समझ आया कि झूठ की नींव पर कभी विश्वास का महल नहीं टिक सकता।
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समय का सदुपयोग

अमित और नमन दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। अमित हर काम समय पर करता था, जबकि नमन हमेशा हर काम को कल पर टालने की आदत रखता था। परीक्षा का समय नजदीक आ रहा था और नमन ने अभी तक एक भी पाठ याद नहीं किया था। वह सोचता था कि वह अंतिम रात में सब कुछ पढ़ लेगा। जब परीक्षा का दिन आया, तो नमन पर्चा देखकर घबरा गया क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था और उसका समय कम पड़ गया। दूसरी ओर, अमित ने शांत मन से सभी प्रश्नों के सही उत्तर दिए और कक्षा में प्रथम आया। उस दिन नमन को समझ आया कि जो व्यक्ति समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी कद्र नहीं करता है।
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मेहनत का सही फल

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक आलसी युवक रहता था। वह हमेशा शॉर्टकट की तलाश में रहता था ताकि बिना मेहनत के अमीर बन सके। एक दिन उसे एक पुराने साधु मिले जिन्होंने उसे एक जादुई बीज दिया। साधु ने कहा कि इसे बोने से सोने का पौधा उगेगा, बशर्ते इसे हर रोज सुबह उठकर शुद्ध जल से सींचा जाए और इसके सामने कोई नकारात्मक बात न बोली जाए। सोहन ने उत्साह में आकर बीज बो दिया और रोज पानी देने लगा। कुछ दिन बीते लेकिन पौधे की जगह केवल हरी पत्तियां ही निकलीं। निराश होकर सोहन साधु के पास पहुँचा और शिकायत की कि बीज नकली है। साधु ने मुस्कुराते हुए कहा कि बीज असली था, लेकिन सोने का मतलब उसकी मेहनत का सोना बनना था। उस नियमित दिनचर्या और सुबह जल्दी उठने की आदत ने सोहन को मेहनती और सफल बना दिया। सोहन समझ गया कि असली सोना परिश्रम ही है।
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बरगद की छांव और पहला खत

बरगद के पुराने पेड़ के नीचे हर शाम आरव का इंतजार करना मीरा की आदत बन चुकी थी। वह हवा में उड़ते पत्तों को गिनती और सोचती कि क्या आज वह अपने दिल की बात कह पाएगा। पिछले तीन सालों से दोनों सिर्फ किताबों के आदान-प्रदान के बहाने मिलते थे, लेकिन खामोशियां बहुत कुछ कह जाती थीं। आज जब आरव आया, तो उसके हाथ में किताबों के साथ एक छोटा सा लिफाफा भी था। उसने वह लिफाफा मीरा की तरफ बढ़ाया और नजरें झुका लीं। मीरा ने कांपते हाथों से खत खोला, जिसमें बिना किसी प्रस्ताव के बस इतना लिखा था कि उसकी मौजूदगी ही आरव की दुनिया का सबसे खूबसूरत सच है। उस पल दोनों की आंखों में जो नमी थी, उसने सारे अधूरे शब्दों को पूरा कर दिया।
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खुद की पहचान

भीड़ का हिस्सा बनना हमारी आदत में नहीं, हम अकेले ही काफी हैं महफिल की शान बढ़ाने के लिए। लोग नाम याद रखते हैं, हम सीधे दिल पर राज करते हैं।
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खामोश तेवर

शोर मचाना हमारी आदत में नहीं, हमारे तेवर ही काफी हैं आसमान को झुकाने के लिए। वक्त आने पर जवाब भी देंगे और हिसाब भी लेंगे।
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