साधारण दिन

साधारण दिन

“
कोई बड़ा वाक्य नहीं चाहिए,
एक साफ़ दिन भी काफ़ी किस्सा है।
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धड़कनों की भाषा

तुम्हारी एक मुस्कान से संवर जाती है दुनिया मेरी, तुम पास न होकर भी हर पल साथ लगते हो। आँखों में तेरी छुप जाते हैं सारे ख़्वाब मेरे, तुम दिल से निकले वो खूबसूरत एहसास लगते हो।

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खयालों का शहर

अपनी ही धुन में बहता चला जा रहा हूँ मैं, अनजाने सफर में कुछ कहता जा रहा हूँ मैं। भीड़ बहुत है इस दुनिया के मेलों में मगर, खुद को ही ढूंढता हुआ रहता जा रहा हूँ मैं।

बदलाव की बयार

पत्ते गिरते हैं तो शाखों को नया रंग मिलता है, हर अंधेरे के बाद ही तो नया उमंग मिलता है। यूं ही नहीं बिखरती है जिंदगी कभी यारों, संवरने का मौका भी बस तंगियों के संग मिलता है।

अंझाना मोड़

कदमों के निशान छोड़ कर आगे बढ़ चले हम, जिंदगी के हर एक इम्तिहान से लड़ चले हम। जीत की चाहत में अपनों को जो खोया कभी, उसी कसक के साथ आगे बढ़ चले हम।