खयालों का शहर

खयालों का शहर

“
अपनी ही धुन में बहता चला जा रहा हूँ मैं, अनजाने सफर में कुछ कहता जा रहा हूँ मैं। भीड़ बहुत है इस दुनिया के मेलों में मगर, खुद को ही ढूंढता हुआ रहता जा रहा हूँ मैं।
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कदमों के निशान छोड़ कर आगे बढ़ चले हम, जिंदगी के हर एक इम्तिहान से लड़ चले हम। जीत की चाहत में अपनों को जो खोया कभी, उसी कसक के साथ आगे बढ़ चले हम।

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वक़्त की चाल को कौन भला पहचान पाया है, यहाँ हर शख्स ने बस सबक ही नया पाया है। जो आज पास है कल शायद नजर न आए, इसी का नाम तो शायद असल में माया है।