मंजिल की तलाश

मंजिल की तलाश

“
रास्ते खुद ब खुद बनते गए सफर में,
हम चले थे अकेले ही इस नगर में।
👁️ 1 बार पढ़ा गया ❤️ लोगों ने पसंद किया

टिप्पणियाँ

अभी कोई स्वीकृत टिप्पणी नहीं है।

लॉगिन करके टिप्पणी करें। प्रकाशित होने से पहले हर टिप्पणी की समीक्षा होती है।

संबंधित शायरी (Related Shayari)

खयालों का शहर

अपनी ही धुन में बहता चला जा रहा हूँ मैं, अनजाने सफर में कुछ कहता जा रहा हूँ मैं। भीड़ बहुत है इस दुनिया के मेलों में मगर, खुद को ही ढूंढता हुआ रहता जा रहा हूँ मैं।

बदलाव की बयार

पत्ते गिरते हैं तो शाखों को नया रंग मिलता है, हर अंधेरे के बाद ही तो नया उमंग मिलता है। यूं ही नहीं बिखरती है जिंदगी कभी यारों, संवरने का मौका भी बस तंगियों के संग मिलता है।

अंझाना मोड़

कदमों के निशान छोड़ कर आगे बढ़ चले हम, जिंदगी के हर एक इम्तिहान से लड़ चले हम। जीत की चाहत में अपनों को जो खोया कभी, उसी कसक के साथ आगे बढ़ चले हम।