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सांझ की हल्की फुहार

शाम का वक्त था और आसमान में काले बादल घिर आए थे। मीरा अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद ले रही थी, तभी अचानक बारिश की तेज बूंदें गिरने लगीं। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह ऐसे ही मौसम में कागज़ की नावें बनाकर पानी में तैराती थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसका पुराना मित्र कबीर खड़ा था, जिसके हाथ में गरम चाय के दो कप थे। कई सालों बाद हुई इस अचानक मुलाकात ने दोनों के चेहरों पर एक अनूठी खुशी ला दी। बारिश की उस फुहार ने उनके बीच की दूरी को मिटा दिया और पुरानी यादों को फिर से तरोताजा कर दिया। उन्होंने बैठकर पुरानी बातें की और महसूस किया कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ और भी ज्यादा गहरे हो जाते हैं।

बरसात की शाम

झमाझम बारिश हो रही थी और ऑफिस से घर लौटते वक्त विक्रम की गाड़ी अचानक बीच रास्ते में खराब हो गई। वह छाता भूल आया था और पूरी तरह भीग चुका था। पास ही एक छोटी सी चाय की टपरी खुली थी जहाँ उसने शरण ली। वहाँ एक बूढ़ा आदमी सुरीली आवाज में पुराना गजल गुनगुना रहा था और आने जाने वाले हर मुसाफिर को अदरक वाली गरमागरम चाय पिला रहा था। विक्रम ने जब चाय की चुस्की ली, तो उसकी सारी थकान और दिनभर का तनाव पल भर में गायब हो गया। बारिश की वो शाम उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।

बरसात की रात और पुरानी डायरी

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली चले जाने से कमरे में सिर्फ मोमबत्ती की पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। कबीर ने अपनी अलमारी से वह नीले जिल्द वाली पुरानी डायरी निकाली जो कई सालों से छुपी हुई थी। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, कॉलेज के दिनों की वो भूली-बिसरी यादें ताजा हो गई जब उसने और उसके सबसे पक्के दोस्त ने साथ मिलकर बड़े-बड़े सपने देखे थे। जिंदगी के उतार-चढ़ाव में वे दोनों ऐसे बिछड़े कि आज दोनों के बीच सिर्फ खामोश दूरियाँ बची थीं। कबीर ने डायरी के आखिरी पन्ने पर दोस्त के लिए कुछ शब्द लिखे और खिड़की के बाहर गिरती बारिश को देखने लगा। उसे लगा कि रिश्ते मोमबत्ती की लौ की तरह होते हैं, जो हवा के झोंकों से बुझ तो सकते हैं लेकिन उनकी गर्माहट बहुत लंबे समय तक दिलों में बसी रहती है। उसने राहत की साँस ली और डायरी को फिर से संभाल कर रख दिया।

कागज की नाव और उम्मीद का समंदर

बरसात की पहली फुहार के साथ ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में कागज की नावें तैराने लगे थे। नन्हें हाथों द्वारा बनाई गई वे रंगबिरंगी नावें पानी के तेज बहाव के साथ आगे बढ़ रही थीं। एक कोने में खड़े होकर मैं अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा जब हर छोटी सी जीत पर दिल खुशी से झूम उठता था। तभी एक छोटी सी नाव भंवर में फंसकर डूबने लगी, जिसे देखकर मेरा दिल बैठ गया। लेकिन अगले ही पल पानी के एक शांत बहाव ने उसे फिर से उबार लिया। जीवन की कसौटी भी कुछ ऐसी ही है, जहां हार के डर के बाद ही असली जीत का रास्ता दिखाई देता है।

सूखे तालाब की सुनहरी उम्मीद

गाँव के बाहर एक पुराना और विशाल तालाब था जो कई वर्षों की भयंकर सूखे के कारण पूरी तरह से सूख चुका था। गाँव के सभी लोगों ने उस तालाब की ओर देखना तक छोड़ दिया था क्योंकि उन्हें लगता था कि अब वहाँ कभी पानी नहीं आ सकता। लेकिन गाँव का एक बूढ़ा किसान प्रतिदिन सुबह उठकर उस सूखे तालाब के बीच में जाता और थोड़ी सी मिट्टी खोदकर बाहर फेंकता था। बाकी लोग उसकी इस अजीब हरकत पर हंसते और उसे पागल कहते, लेकिन किसान चुपचाप अपने काम में लगातार जुटा रहता था। एक दिन जब आसमान काले बादलों से घिर गया और मूसलाधार बारिश हुई, तो किसान की उस निरंतर मेहनत का कमाल दिखाई दिया। सूखे तालाब की गहराई बढ़ चुकी थी जिसके कारण इस बार गाँव का सारा बरसाती पानी उसी तालाब में आकर एकत्र हो गया। देखते ही देखते वह सूखा तालाब फिर से लबालब भर गया और पूरे इलाके में हरियाली छा गई। इस घटना ने सबको सिखाया कि निरंतर प्रयास और धैर्य से किसी भी बदतर स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है।

एकता की शक्ति और नन्हीं चीटियां

बरसात के दिनों में एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे चीटियों का एक छोटा सा परिवार रहता था। एक दिन तेज आंधी के कारण खाने का एक बड़ा दाना उनके रास्ते में आकर गिर गया, जिसे अकेली चींटी हिला भी नहीं सकती थी। रानी चींटी ने हार मानने के बजाय अपनी पूरी फौज को इकट्ठा किया और सबने मिलकर एक साथ ताकत लगाई। कुछ ही पलों में वह भारी दाना अपनी मंजिल तक पहुँच गया। इस घटना को पास की डाल पर बैठा एक कबूतर देख रहा था, जिसे एकता का असली मतलब समझ आ गया। उसने सोचा कि जब ये नन्हीं चीटियां मिलकर बड़े से बड़ा काम कर सकती हैं, तो हम मिलकर समाज में क्यों नहीं सुधार ला सकते।

कागज़ की कश्तियाँ

बरसात की पहली बूँद ने सूखी मिट्टी को महका दिया था। कॉलेज के गलियारे में अहान और मीरा अपने नोट्स बचाते हुए एक कैंटीन के शेड के नीचे आकर खड़े हो गए। दोनों के बीच ज़्यादा बातचीत नहीं थी, बस एक अनकही सी खामोश पहचान थी जो पिछले कुछ महीनों से पनप रही थी। अचानक अहान ने अपनी जेब से एक पुराना कागज़ निकाला और फुर्ती से एक छोटी सी नाव बना डाली। उसने उसे पानी की बहती धारा में छोड़ते हुए कहा कि हमारी उम्मीदें भी इसी नाव जैसी हैं, जो हर लहर से लड़कर आगे बढ़ती हैं। मीरा मुस्कुराई और उसने अपनी किताब से एक सूखा पत्ता निकालकर उस नाव पर रख दिया। उस छोटे से पल ने दोनों के दिलों के फासलों को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की खूबसूरत शुरुआत हुई।

बरसात की बूंदें

आसमान से गिरती ये बारिश की बूंदें, मिट्टी की खुशबू से महका देती हैं तन-मन। जिंदगी में भी गम के बाद आती है ऐसी खुशी, जो भिगो जाती है एक पल में सारा जीवन।