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"पारिवारिक रिश्ते" के लिए परिणाम

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कुल 25 परिणाम मिले खोज शब्द: पारिवारिक रिश्ते

दीवार पर टंगी पेंटिंग और खामोश रिश्ते

बैठक कक्ष की दीवार पर सजी वह अधूरी पेंटिंग बरसों से किसी के आने का इंतजार कर रही थी। पिता और पुत्र के बीच अनबन ऐसी थी कि दोनों एक छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जीते थे। बेटा कला में नाम कमाना चाहता था, जबकि पिता को लगता था कि यह सब वक्त की बर्बादी है। एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। जब बेटा उनके कमरे की सफाई कर रहा था, तब उसने मेज की दराज में अपनी बनाई हुई वे सारी तस्वीरें पाईं जिन्हें उसने बचपन में कभी फेंका था। हर तस्वीर के पीछे पिता ने गर्व से कुछ शब्द लिख रखे थे। उस पल बेटे को अहसास हुआ कि खामोशी के पीछे कितनी गहरी ममता छिपी थी। उसने अस्पताल जाकर पिता का हाथ थामा और दोनों की आंखें नम थीं, बिना कुछ कहे सब कुछ समझ चुकी थीं।
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अल्मारी के कोने में रखी पुरानी घड़ी

दीपावली की सफाई के दौरान जब अनाहिता ने घर के पुराने स्टोर रूम की सफाई शुरू की, तो उसकी नजर लकड़ी की एक पुरानी संदूकची पर पड़ी। उसने धूल झाड़कर उसे खोला तो अंदर उसके दादाजी की कलाई पर बंधने वाली वह पुरानी टिक-टिक करती घड़ी मिली, जो सालों पहले बंद हो गई थी। अनाहिता ने उसे उठाया और जैसे ही उसने उसकी चाबी घुमाने की कोशिश की, अचानक से घड़ी की सुइयां हिलने लगीं और उसकी पुरानी टिक-टिक की आवाज गूंज उठी। उस आवाज के साथ ही बचपन की वे तमाम यादें ताजा हो गईं जब दादाजी उसे पार्क ले जाया करते थे और अपनी कलाई की घड़ी दिखाकर उससे समय पूछा करते थे। अनाहिता की पलकें नम हो गईं और उसने घड़ी को अपने सीने से लगा लिया। उस एक पल में बीता हुआ पूरा बचपन जैसे फिर से लौट आया हो।
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समुद्र किनारे की एक शाम

मुंबई की समंदर किनारे वाली मरीन ड्राइव पर हर शाम हजारों लोग आते थे, लेकिन कबीर और सिमरन के लिए यह जगह रूहानी सुकून का जरिया थी। कबीर एक पेंटर था जो रंगों के जरिए जज्बात बयां करता था, और सिमरन एक शास्त्रीय गायिका थी जो सुरों से दिल जीत लेती थी। दोनों की पहली मुलाकात एक आर्ट गैलरी में हुई थी जहाँ कबीर सिमरन का पोर्ट्रेट बना रहा था। धीरे-धीरे कला के प्रति उनका यह आकर्षण गहरे प्रेम में बदल गया। एक शाम, जब सूरज समंदर में डूब रहा था और आसमान नारंगी हो रहा था, कबीर ने अपना कैनवास सिमरन की तरफ घुमाया। उस पेंटिंग पर लिखा था क्या तुम मेरी जिंदगी का स्थायी सुर बनोगी? सिमरन मुस्कुराई और उसने अपनी सहमति जताते हुए कबीर के कंधे पर अपना सिर रख दिया। वह शाम उनके जीवन की सबसे हसीन शाम बन गई।
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किताबों की दुकान का कोना

शहर के एक पुराने कोने में बनी उस छोटी सी किताबों की दुकान में रोज शाम को अनमोल और सिमरन की मुलाकात होती थी। दोनों हमेशा एक ही किताब पर हाथ रखते और फिर हंसकर एक-दूसरे को पढ़ने के लिए वह पन्ना सौंप देते थे। कई महीनों तक यह सिलसिला खामोशी से चलता रहा और दोनों के बीच एक अनजाना सा रिश्ता बन गया। एक दिन दुकान के मालिक ने बताया कि यह दुकान अब बंद होने वाली है, जिससे दोनों मायूस हो गए। उस अंतिम शाम को अनमोल ने अपनी जेब से एक अंगूठी निकाली और सिमरन से पूछा कि क्या वह इस किताब के पन्नों से बाहर भी उसकी जिंदगी का हिस्सा बनेगी। सिमरन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और उसने तुरंत हां कह दिया।
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रेत पर लिखे नाम

समुद्र की लहरें किनारे को बार-बार छू रही थीं और सूरज डूबने की तैयारी में था। कबीर और मीरा हर साल इस समुद्री तट पर आते थे क्योंकि यहीं उनकी पहली मुलाकात हुई थी। इस बार माहौल थोड़ा अलग था क्योंकि कबीर शहर छोड़कर विदेश जाने वाला था और दूरी उनके रिश्ते की परीक्षा लेने वाली थी। मीरा चुपचाप रेत पर कबीर का नाम लिख रही थी और लहरें उसे मिटा रही थीं। कबीर ने मीरा का हाथ थाम लिया और कहा कि नाम भले ही रेत से मिट जाए, लेकिन दिल पर लिखा रिश्ता कभी नहीं मिटेगा। उस शाम दोनों ने वादा किया कि समुद्र की दूरियों के बावजूद उनका प्यार हमेशा अमर रहेगा।
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टूटा हुआ विश्वास

कुछ रिश्ते वक्त के साथ ऐसे छूटे, जैसे पतझड़ में पेड़ से सूखे पत्ते टूटते हैं। अब तो खुद की आवाज से भी डर लगने लगा है, क्योंकि हर खुशी के पीछे एक छिपा हुआ धोखा नजर आता है।
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बदले रिश्ते

वक़्त के साथ लोगों के बदलते रंग देखकर अब हैरानी नहीं होती, बस खुद पर तरस आता है कि हमने गैरों को अपना समझने में उम्र गुजार दी।
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जीवन की अनमोल सीख

वक्त बदलता है तो अपने भी बदल जाते हैं,
सूप में कचरा पीछे और दाने आगे आ जाते हैं।
सफर लंबा है संभल कर चलना मेरे दोस्त,
यहां मतलब के रिश्ते बहुत जल्दी ढल जाते हैं।
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