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रात का पहरा और जलता हुआ दिया

अंधेरी रात चारों तरफ अपनी चादर फैला चुकी थी और गांव की सूनी सड़क पर केवल एक ही घर की खिड़की रोशन थी। अंदर एक बूढ़ी मां अपनी पलकें बिछाए दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी थीं। शहर गए उनके बेटे को लौटेत-लौटते आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी और आंधी-तूफान के कारण फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह ठप था। मां के मन में अजीबोगरीब आशंकाएं घर कर रही थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दीया देहरी से बुझने नहीं दिया। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और बेटे को सीने से लगाते ही मां की आंखों से राहत के आंसू छलक पड़े।

सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

पीले कागजों का बंडल

गांव के बाहरी हिस्से में स्थित पुराने डाकघर की सफाई करते समय रमित को पीले पड़ चुके कागजों का एक पुराना बंडल मिला। जब उसने उन पत्रों को पढ़ना शुरू किया, तो पाया कि वे सभी उसी पते पर लिखे गए थे जहाँ वह खुद रहता है और भेजने वाले का नाम भी वही था जो उसका अपना था। पत्रों पर दर्ज तारीखें आने वाले कल की थीं। हैरान होकर उसने रात के ठीक बारह बजे अपने नाम से आए उस नए लिफाफे को खोला, जिसके अंदर एक पन्ना था जिस पर लिखा था कि अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं बचा है। तभी डाकघर के दरवाजे पर जोर से दस्तक गूंजी और ठंडी हवा का एक झोंका उसकी रीढ़ में सिहरन पैदा कर गया।

खिड़की पर दस्तक देती उंगलियां

चौथी मंजिल के फ्लैट में रहने वाली निकिता अक्सर रात को खिड़की के बाहर किसी के होने का अहसास करती थी। उसका फ्लैट सड़क से बहुत ऊपर था, इसलिए वहां किसी इंसान का पहुंचना नामुमकिन था। एक तूफानी रात को जब बिजली गुल हो चुकी थी, तब खिड़की के कांच पर किसी ने हल्के से नाखून से खरोंचना शुरू किया। निकिता ने डरते हुए टॉर्च जलाई और खिड़की की तरफ देखा। कांच के उस पार एक औरत लटकी हुई थी जिसके बाल बिखरे हुए थे और वह अजीब सी मुस्कान के साथ उसे घूर रही थी। उस औरत ने अचानक खिड़की का कांच जोर से पीटना शुरू कर दिया ताकि वह अंदर आ सके। निकिता चीख पड़ी और अपनी चाची के कमरे की तरफ भागी। अगली सुबह जब खिड़की खोली गई, तो वहां कांच पर ताजे खून के निशान बने हुए थे और कोई नहीं था।

अंधेरे कमरे में जलती मोमबत्ती

शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने और शांत इलाके में रोहन अकेला रहता था। उसकी जिंदगी एक ऐसी मोमबत्ती की तरह थी जो बिना हवा के भी कांपती रहती थी। एक शाम जब अचानक पूरे मोहल्ले की बिजली चली गई, तो उसने अपनी खिड़की पर एक छोटी सी मोमबत्ती जलाई। तभी पड़ोसी बालकनी से किसी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। वह सिमरन थी, जो हाल ही में उस मकान में शिफ्ट हुई थी। उस दिन बिना किसी बात के दोनों के बीच लंबी आँख मिचौली वाली बातें शुरू हो गईं। अंधेरे ने उनके दिल के दरवाजों पर दस्तक दे दी थी और मोमबत्ती की रोशनी ने उनके बीच की दूरियों को हमेशा के लिए मिटा दिया।

धीमी सी आहट

दरवाजे पर दस्तक किसी की जो हुई, लगा मेरा यार मुझे मिलने आया है। बरसों की जुदाई का दर्द पल में मिटा, देखो आज फिर से अपनापन लौट आया है।