रात का पहरा और जलता हुआ दिया
अंधेरी रात चारों तरफ अपनी चादर फैला चुकी थी और गांव की सूनी सड़क पर केवल एक ही घर की खिड़की रोशन थी। अंदर एक बूढ़ी मां अपनी पलकें बिछाए दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी थीं। शहर गए उनके बेटे को लौटेत-लौटते आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी और आंधी-तूफान के कारण फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह ठप था। मां के मन में अजीबोगरीब आशंकाएं घर कर रही थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दीया देहरी से बुझने नहीं दिया। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और बेटे को सीने से लगाते ही मां की आंखों से राहत के आंसू छलक पड़े।
0