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"टूटा दिल" के लिए परिणाम

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कुल 119 परिणाम मिले खोज शब्द: टूटा दिल

पुरानी लकड़ी की बेंच और खामोश निगाहें

शहर के बीचों-बीच बने इस पार्क की पुरानी लकड़ी की बेंच पर रोज एक बूढ़ा आदमी आकर बैठता था। वह घंटों खाली आसमान को देखता रहता, मानो किसी का इंतजार कर रहा हो। एक दिन एक छोटे बच्चे ने उसके पास आकर पूछा कि वह रोज यहाँ अकेले क्यों बैठते हैं। बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह बेंच वही जगह है जहाँ उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल बिताए थे। समय बीत गया, लोग बदल गए, लेकिन यादें आज भी यहीं टंगी हैं। उस बच्चे ने अपनी टॉफी उस बुजुर्ग के साथ बांटी, और अचानक उस बूढ़े चेहरे पर एक ऐसी राहत भरी मुस्कान आई जो महीनों से गायब थी।
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अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।
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आईने का दूसरा किनारा

नताशा ने अपने नए किराए के घर के हॉल में एक बहुत बड़ा प्राचीन आईना लगाया था। वह रोज़ रात को सोने से पहले अपने बाल उस आईने के सामने सँवारती थी। एक रात जब वह बाल झाड़ रही थी, तो उसने गौर किया कि आईने में उसका अक्स उसकी नकल नहीं कर रहा था। बल्कि उसका अक्स उसकी तरफ देखकर एक भयानक मुस्कान बिखेर रहा था। नताशा डर के मारे पीछे हटी, लेकिन आईने के अंदर से एक हाथ बाहर आया और उसने उसका गला कसकर पकड़ लिया। अगली सुबह जब मकान मालिक आया, तो नताशा का शरीर गायब था और आईने पर खून से उसका नाम लिखा हुआ था।
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ईमानदार कुम्हार और राजा का पुरस्कार

किसी राज्य में एक साधारण कुम्हार रहता था जिसका नाम मदन था। मदन अपनी कला में अत्यंत निपुण था और वह हमेशा मजबूत और सुंदर मिट्टी के बर्तन बनाता था। एक बार राजा ने अपने दरबार के लिए कुछ विशेष कलात्मक बर्तनों की मांग की। मदन ने महीनों की कड़ी मेहनत के बाद राजा के लिए सबसे उत्कृष्ट बर्तन तैयार किए। जब वह उन्हें राजमहल ले जा रहा था, तब रास्ते में एक गरीब भूखाया यात्री मिला जो ठंड से कांप रहा था। मदन का दिल पसीज गया और उसने अपनी कमाई का कुछ हिस्सा और भोजन उस यात्री को दे दिया। राजदरबार में जब उसने बर्तन प्रस्तुत किए, तो राजा उसकी कला से बहुत प्रभावित हुए। राजा ने उसे भारी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार के रूप में दीं। लेकिन मदन ने केवल उतनी ही राशि स्वीकार की जितने उसके बर्तनों का वास्तविक मूल्य था, और बाकी धन राज्य के गरीबों के कल्याण के लिए वापस कर दिया। राजा उसकी इस परम ईमानदारी और परोपकार की भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे राज्य का मुख्य शिल्कार घोषित किया। मदन ने साबित कर दिया कि ईमानदारी और दयालुता से बढ़कर इस दुनिया में कोई दूसरा आभूषण नहीं है।
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रेलवे स्टेशन का आखिरी डिब्बा

सांध्यकालीन वेला में जब स्टेशन पर एक्सप्रेस ट्रेन की सीटी गूंजी, तो राधिका की धड़कनें तेज हो गईं। वह पिछले पाँच सालों से इस प्लेटफार्म पर कबीर का इंतज़ार कर रही थी। कबीर एक चित्रकार था जो कला की तलाश में शहर छोड़कर किसी दूर पहाड़ी वादी में बस गया था। दोनों के बीच कभी कोई वादा नहीं हुआ था, बस एक मौन समझौता था कि एक दिन सफर यहीं आकर थमेगा। ट्रेन रुकी और भीड़ के बीच से एक शख्स बाहर निकला, जिसके कंधे पर वही पुराना भूरा झोला था। कबीर ने जब राधिका को देखा, तो उसके चेहरे पर बरसों पुरानी थकान एक पल में गायब हो गई। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी डायरी निकाली, जिसके पन्नों पर राधिका के अनदेखे चित्र उकेरे हुए थे। उस शाम हवा में पुरानी यादों की महक थी और दोनों की नम आँखें बिना कुछ कहे सब कुछ कह रही थीं। जीवन के इस सफर में अब कोई बिछड़ने का डर नहीं बचा था, क्योंकि मंजिल खुद उनके सामने आकर खड़ी हो गई थी।
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सफर का हमसफर

ट्रेन की खड़खड़ाहट और खिड़की से बाहर भागते पेड़ों के बीच राघव अपनी ही धुन में खोया हुआ था। सामने वाली सीट पर बैठी अनायरा अपनी किताब पढ़ने में व्यस्त थी, लेकिन बीच-बीच में उसकी नज़रें राघव पर टिक जाती थीं। जब सफर लंबा हो और मंजिल का पता न हो, तो रास्ते खुद-ब-खुद कहानियां बुनने लगते हैं। अनायरा की थर्मस से छलकी चाय की कुछ बूँदें जब राघव की गोद में गिरीं, तो एक अनपेक्षित संवाद शुरू हो गया। चाय की चुस्कियों के साथ शुरू हुई वह बातचीत सफर के अंत तक आते-आते दिल की गहराइयों तक उतर चुकी थी। जब ट्रेन अपने अंतिम स्टेशन पर रुकी, तो दोनों समझ चुके थे कि उनका यह सफर किसी एक मंजिल के लिए नहीं बल्कि पूरी जिंदगी के लिए था।
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दिल की बात

हर बात जुबान पर लाई नहीं जाती,
कुछ भावनाएं यूं ही समझी जाती हैं।
तुम जो पास हो तो डर कैसा,
यह दुनिया तो बस यूंही कही जाती है।
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दर्द-ए-दिल

खामोशी से टूट जाने का हुनर सीख लिया,
हमने खुद से ही खुद को जुदा कर लिया।
कोई गिला नहीं इस बेरुखी ज़माने से,
हमने तन्हाई को अपना हमसफर बना लिया।
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