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हाल की खोजें: गुलाब
कुल 19 परिणाम मिले कीवर्ड: गुलाब

बगिया का आखिरी फूल

गांव के एक कोने में बने पुराने घर के आंगन में एक सुंदर सा गुलाब का पौधा था जिसकी देखभाल दादाजी वर्षों से करते थे। समय के साथ दादाजी की सेहत बिगड़ने लगी और वे उस पौधे को ज्यादा समय नहीं दे पाए, जिससे उस पर सिर्फ एक ही आखिरी फूल बचा था। सबको लगा कि अब यह पौधा सूख जाएगा और यह फूल भी मुरझा जाएगा। लेकिन पोते ने अपने दादाजी के प्यार को जीवित रखने के लिए उस पौधे की रोजाना खुद सिंचाई करनी शुरू कर दी। उसकी मेहनत रंग लाई और न केवल वह आखिरी फूल खिला रहा, बल्कि पौधे पर नए कोपल भी फूट पड़े।

शीशे की अलमारी में रखी किताब

लाइब्रेरी के एक कोने में शीशे की अलमारी के भीतर कैद वह लाल जिल्द वाली किताब धूल फांक रही थी। कोई भी पाठक पिछले कई दशकों से उसकी तरफ देखता तक नहीं था क्योंकि उसका कवर पूरी तरह फीका पड़ चुका था। मीना, जो किताबों की शौकीन थी, की नज़र एक दिन उस पर पड़ी। उसने लाइब्रेरियन से विशेष अनुमति लेकर उसे बाहर निकलवाया और पन्ने पलटने लगी। अंदर पहले ही पन्ने पर एक खूबसूरत हाथ से लिखा संदेश था जो किसी ने साठ साल पहले अपने किसी खास के लिए लिखा था। उस संदेश के साथ एक सूखा हुआ गुलाब का फूल भी दबा हुआ था जो अब कागज़ का हिस्सा बन चुका था। उस किताब ने मीना को अहसास कराया कि शब्द और भावनाएं कभी नहीं मरते, वे बस सही वक्त का इंतजार करते हैं।

बंजर ज़मीन पर खिला गुलाब

गाँव के बुजुर्ग मोहन लाल ने जब उस सूखी और बंजर ज़मीन पर पौधे लगाने की सोची, तो पूरे गाँव ने उसका मजाक उड़ाया। लोगों का कहना था कि इस कंकड़-पत्थर वाली ज़मीन पर घास का एक तिनका भी नहीं उग सकता। लेकिन मोहन लाल की जिद के आगे कुदरत को भी झुकना पड़ा, वह रोज सुबह मीलों दूर से पानी ढोकर लाता और पौधों को सींचता। साल बीत गए, मोहन लाल की उम्र ढलने लगी और उसकी पीठ झुक गई, लेकिन उसकी मेहनत में कोई कमी नहीं आई। एक दिन जब भीषण गर्मी के बाद पहली बारिश हुई, तो उसी बंजर ज़मीन के बीचों-बीच एक लाल गुलाब खिल उठा। उस लाल गुलाब को देखकर पूरा गाँव हैरान रह गया और जिन लोगों ने कभी उसका मजाक उड़ाया था, वे आज उसके सामने नतमस्तक थे। मोहन लाल ने मुस्कुराते हुए अपनी झुर्रियों भरे हाथों से उस फूल को छुआ और समझ गया कि पक्की श्रद्धा और अटूट मेहनत से कुछ भी संभव है।

गुलाब के पौधे की देखभाल करती वृद्धा

वृद्धा आश्रम के कोने में बनी छोटी सी क्यारी में कमला जी रोज सुबह पानी डाला करती थीं। उनके पास इस दुनिया में अपना कहने के लिए कोई नहीं था, सिवाय इन गुलाब के पौधों के जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। लोग कहते थे कि वे किस बात का इंतजार कर रही हैं, जब उनके अपने ही उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं। लेकिन कमला जी की आँखों में शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी उम्मीद थी कि शायद कभी कोई अपना उनसे मिलने आएगा। एक दिन जब एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उस क्यारी के पास आया और उसने एक फूल को छुआ, तो कमला जी के चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौटी जैसी कभी उनके अपने बच्चों के होने पर हुआ करती थी। उस एक पल ने उनके सूनेपन को इस तरह भर दिया कि उन्हें लगा जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।

पहली बारिश का पहला खत

आसमान में काले बादल छाए थे और मिट्टी की सौंधी खुशबू हवा में घुल रही थी। कॉलेज के दिनों में लिखी गई एक पुरानी डायरी के पन्नों को पलटते समय अनामिका को एक मोड़ पर मिला वह गुलाब का सूखा हुआ फूल मिल गया। उसके साथ एक खत था जो उसने कभी किसी को नहीं भेजा था, डर था कि कहीं रिश्ता न टूट जाए। आज जिंदगी के इस पड़ाव पर जब सब कुछ पा लेने के बाद भी कुछ अधूरा सा लगता था, उसने उस खत को दोबारा पढ़ा। उसने सोचा कि क्यों न आज अपने पुराने मित्र को फोन करके हालचाल पूछा जाए जिसके बिना कभी एक पल भी नहीं कटता था। जैसे ही उसने नंबर मिलाया, दूसरी तरफ से वही पुरानी जानी-पहचानी आवाज गूंजी, मानो वक्त वहीं का वहीं ठहर गया हो।

रेगिस्तान में खिलता हुआ गुलाब

रमेश बाबू ने अपनी जिंदगी के पचास साल एक वीरान रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हुए बिता दिए थे। उनके दोनों पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। वह हर महीने अपनी कमाई का आधा हिस्सा पास के अनाथालय में दान कर देते थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे अपने बुढ़ापे के लिए क्यों नहीं बचाते, तो रमेश ने कहा कि दूसरों के चेहरों पर खुशी देखना ही उनका असली बैंक बैलेंस है। एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ा अधिकारी उतरा, जिसने बचपन में रमेश के दिए पैसों से ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस अधिकारी ने रमेश को गले लगाया और उनकी सालों की मेहनत रंग लाई। रमेश की आंखें भर आईं और उन्हें महसूस हुआ कि उनका जीवन वास्तव में सार्थक हो गया था।

पुरानी डायरी और अधूरा खत

बरसों बाद जब अमित ने अपने पुराने बक्से को टटोला, तो उसे कॉलेज के दिनों की एक भूली-बिसरी डायरी मिली। पन्ने पलटते ही एक सूखा हुआ गुलाब और कागज का मुड़ा हुआ टुकड़ा नीचे गिर गया। वह किसी और का नहीं, बल्कि उसकी बचपन की मित्र का लिखा हुआ अंतिम संदेश था, जिसे वह कभी पढ़ नहीं पाया था। उस वक्त की गलतफहमी ने दोनों को हमेशा के लिए अलग कर दिया था। आज उम्र के इस पड़ाव पर जब अतीत की परछाइयां धुंधली हो चुकी हैं, उस खत के हर एक शब्द ने अमित की आंखें नम कर दीं। उसने महसूस किया कि वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, सिवाय उन अनकहे एहसासों के जो दिल के किसी कोने में आज भी जिंदा रहते हैं।

कांच के बक्से में बंद गुलाब

कॉलेज के आखिरी दिन विदाई समारोह के दौरान राहुल ने मुझे एक कांच के बक्से में बंद लाल गुलाब तोहफे में दिया था। उस समय मुझे लगा कि यह सिर्फ एक औपचारिक विदाई का तोहफा है, लेकिन उस गुलाब की महक ने मेरे दिल में कुछ अलग ही हलचल पैदा कर दी थी। सालों बीत गए, हम दोनों अलग शहरों में अपनी नौकरियां करने लगे और संपर्क भी लगभग टूट गया था। एक दिन अचानक एक कैफे में राहुल बिल्कुल वैसे ही मुस्कुराते हुए सामने आ गया जैसे कॉलेज के दिनों में आता था। उसने वही कांच का बक्सा मुझे दिखाया जिसे उसने आज तक संभाल कर रखा था। उस पल मुझे महसूस हुआ कि दूरियां भले ही बढ़ गई हों, लेकिन दिलों की गहराई में छिपा प्यार कभी कम नहीं होता।

पुरानी हवेली और महकती हुई अलमारी

शहर के एक कोने में खड़ी सदियों पुरानी हवेली के जीर्णोद्धार का जिम्मा मयंक को मिला था जो इतिहास और वास्तुकला से प्यार करता था। काम के दौरान उसे हवेली के एक गुप्त कमरे में लकड़ी की पुरानी अलमारी मिली जिस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी। जब मयंक ने उसे खोला तो अंदर से पुराने खतों का एक बंडल और सूखे गुलाब के फूल मिले जिन पर किसी अनजान जोड़े के प्रेम के किस्से दर्ज थे। उन खतों को पढ़ते-पढ़ते मयंक अतीत की दुनिया में खो गया और उसे महसूस हुआ कि दीवारें भले ही पुरानी हो जाएं लेकिन सच्चा प्रेम कभी नहीं मिटता। उसी शाम हवेली के बगीचे में उसे अहाना मिली जो इस हवेली के इतिहास पर शोध करने आई थी। खतों की उस विरासत ने दोनों को एक ऐसा सूत्र में बांध दिया जहाँ इतिहास और वर्तमान मिलकर एक नई प्रेम गाथा लिखने लगे।

बंजर ज़मीन पर खिलता गुलाब

शहर से दूर उस धूलभरी बंजर ज़मीन पर कोई भी पेड़ उगने की उम्मीद नहीं करता था, सिवाय आलोक के। आलोक एक ऐसा शख्स था जो असंभव को संभव बनाने की जिद रखता था। रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले वह पानी की दो बाल्टियाँ लेकर वहाँ पहुँच जाता और उस सूखी मिट्टी को सींचता। लोग उसे पागल कहते, पर उसकी आँखों में एक अजीब सा सपना था। एक दिन उस वीरान रास्ते से गुजरते हुए मीरा की नजर उस पर पड़ी। मीरा एक पर्यावरणविद् थी और उसकी आँखों में भी प्रकृति के प्रति वही अगाध प्रेम था। मीरा ने जब आलोक को अकेले मेहनत करते देखा, तो वह खुद को रोक नहीं पाई और उसकी मदद करने के लिए आगे आ गई। शुरुआत में दोनों के बीच सिर्फ काम को लेकर बातें होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे सूखी मिट्टी में पौधे की तरह उनके दिलों में भी भावनाएँ पनपने लगीं। वे दोनों घंटों पौधे लगाने और भविष्य के हरे-भरे जंगलों के सपने देखने लगे। कुछ महीनों की कड़ी मेहनत और दोनों के साझा प्यार का नतीजा यह हुआ कि वह बंजर ज़मीन छोटे-छोटे हरे पौधों से लहलहा उठी। पौधे बड़े हुए और उनमें लाल गुलाब के फूल खिल गए। उस दिन मीरा ने आलोक के हाथ में अपना हाथ रखा और समझ गई कि असली प्यार वही है जो मुश्किलों में भी जीवन सींचना जानता है।

गुलाब की पंखुड़ियाँ

यूनिवर्सिटी के बोटैनिकल गार्डन में अध्ययन करते हुए रोहन और अनन्या अक्सर एक-दूसरे से टकरा जाते थे। रोहन को पेड़-पौधों और फूलों से बहुत लगाव था, जबकि अनन्या बॉटनी में रिसर्च कर रही थी। शुरुआत में उनकी बातें केवल पौधों की प्रजातियों और प्रोजेक्ट्स तक सीमित थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे की पसंद और नापसंद जानने लगे। एक दिन अनन्या ने देखा कि उसके लैब की टेबल पर एक खास लाल गुलाब रखा है जिसके साथ एक छोटी सी पर्ची पर उसकी पसंदीदा कविता की पंक्तियाँ लिखी थीं। रोहन की इस खामोश मोहब्बत ने अनन्या के दिल में एक अलग ही हलचल पैदा कर दी। अगले दिन जब वे गार्डन में मिले, तो अनन्या ने बिना कुछ कहे रोहन को वही गुलाब वापस लौटाते हुए अपने दिल का हाल बयां कर दिया।

अनकही मुलाक़ातें

शहर के व्यस्त बाज़ार में एक छोटी सी फूलों की दुकान थी जहाँ आरव हर रोज़ सुबह एक गुलाब खरीदने आता था। दुकान पर काम करने वाली मीरा चुपचाप उसे वो गुलाब थमा देती थी, बिना किसी शब्द के। महीनों बीत गए और उनके बीच केवल नज़रों का संवाद रहा, कोई औपचारिकता नहीं, कोई सवाल नहीं। एक दिन अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और आरव दुकान की आड़ में रुक गया। मीरा ने उसे गर्म चाय का कुल्हड़ आगे बढ़ाया और धीरे से मुस्कुराई। उस छोटी सी मुस्कान ने उनके बीच के सारे अनकहे फासले मिटा दिए और दिल की बात बिना कहे ही एक-दूसरे तक पहुँच गई।