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पुरानी हवेली की खिड़की

गाँव के छोर पर स्थित वह पुरानी हवेली सदियों पुरानी कहानियों की गवाह थी। कोई वहां जाने की हिम्मत नहीं करता था, सिवाय अक्षित के, जो उस हवेली के जीर्णोद्धार का काम संभाल रहा था। एक दिन काम के दौरान उसे धूल से सनी एक पुरानी डायरी मिली, जिसके पन्नों पर अंजलि नाम की किसी लड़की के खूबसूरत खत लिखे थे। वे खत आज से पचास साल पुराने थे, जो किसी ऐसे शख्स के लिए थे जो कभी उन तक पहुँच ही नहीं पाया। अक्षित उन खतों के शब्दों में इस तरह खो गया कि उसे हवेली से ज्यादा उन भावनाओं की फिक्र होने लगी। तभी एक दिन एक वृद्ध महिला अपनी पोती नैना के साथ उस हवेली को देखने आईं। वह महिला कोई और नहीं बल्कि उसी अंजलि की बेटी थीं, जो अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने आई थीं। नैना और अक्षित जब मिले, तो दोनों को लगा कि वे सदियों से एक-दूसरे को जानते हैं। अतीत के उन पन्नों ने वर्तमान में दो अजनबी दिलों को हमेशा के लिए एक अटूट बंधन में बांध दिया।
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रेलवे स्टेशन का आखिरी बेंच

शहर के मुख्य रेलवे स्टेशन के आखिरी बेंच पर हर शाम रोहन अपनी ट्रेन का इंतज़ार करता था, हालांकि उसे कहीं जाना नहीं होता था। यह वह जगह थी जहाँ एक साल पहले उसकी मुलाक़ात सिमरन से हुई थी। सिमरन अपने सपनों की तलाश में दूसरे शहर जा रही थी और उस छोटे से पल ने रोहन की पूरी दुनिया बदल दी थी। दोनों ने वादा किया था कि वे हर परिस्थिति में जुड़े रहेंगे। महीनों तक खतों और संदेशों का सिलसिला चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे दूरियां बढ़ती गईं और संवाद कम होने लगे। रोहन को लगा कि शायद सब खत्म हो चुका है और सिमरन उसे भूल चुकी है। लेकिन आज जब उसने उसी बेंच पर बैठकर उदास होना चाहा, तो किसी ने पीछे से उसकी आँखों को अपने हाथों से ढक लिया। वह खुशबू सिमरन की थी। सिमरन ने अपनी नौकरी छोड़कर हमेशा के लिए वापस लौटने का फैसला कर लिया था। उस शाम स्टेशन की भीड़भाड़ में दोनों की खामोश आँखें सब कुछ कह गईं और अधूरा लगने वाला किस्सा एक खूबसूरत शुरुआत में बदल गया।
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घड़ी की टिक-टिक

रेलवे स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा की तरह भीड़भाड़ से भरा हुआ था। आलोक की ट्रेन छूटने में बस कुछ ही मिनट बाकी थे और स्नेहा अपनी भावनाओं को आंसुओं में छिपाने की कोशिश कर रही थी। दोनों ने कभी अपने दिल की बात एक-दूसरे को नहीं बताई थी, और आज विदाई का वक्त आ चुका था। ट्रेन ने सीटी बजाई और पहिए धीरे-धीरे घूमने लगे। तभी आलोक ने खिड़की से झुककर अपना हाथ बढ़ाया और स्नेहा के हाथ में एक छोटी सी घड़ी रख दी जिस पर लिखा था कि वक्त कभी भी हमें अलग नहीं कर सकता। स्नेहा मुस्कुराई और समझ गई कि शब्दों के बिना भी प्यार का इजहार मुमकिन है।
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रौशन सवेरा

रात कितनी भी लंबी हो, सुबह जरूर आती है,
हर नई किरण एक नई उम्मीद जगा जाती है।
छोड़ दो कल की फिक्र मेरे नादान दोस्त,
आज की यह सुबह नई सफलता लाती है।
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सांसों की उलझन

तेरी यादों का साया आज भी साथ चलता है,
अकेलेपन में हर जख्म चुपचाप जलता है।
जाने क्या बात थी उस जुदाई के लम्हे में,
कि आज भी हर लम्हा आंखों में आंसू भरता है।
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पुराने गाने

बचपन में लगता था कि हमारे घर के बड़े लोग कितने बोरिंग गाने सुनते हैं, और आज खुद उन गानों पर रील बनाते वक्त आँखें नम हो जाती हैं।
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