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कुल 61 परिणाम मिले खोज शब्द: प्रेम

शाम की ठंडी हवा और चाय की प्याली

दफ्तर से लौटते वक्त उस छोटी सी चाय की दुकान पर रुकना मेरा नियम बन गया था। वहाँ मिलने वाली कुल्हड़ की चाय से ज्यादा तुम्हारी मौजूदगी मुझे खींचती थी। हम दोनों अक्सर बिना कुछ कहे घंटों बैठे रहते थे, बस चाय की चुस्कियाँ और आसमान का रंग बदलते देखते थे। एक शाम तुमने बिना पूछे मेरी प्याली में थोड़ी सी चीनी और मिला दी, और तब मैंने समझ लिया कि मेरी जिंदगी का मीठापन अब तुम्हारे ही नाम है।
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पुरानी किताबों की महक और तुम

शहर के उस पुराने पुस्तकालय में किताबों की महक के बीच मेरी आँखें अक्सर एक पन्ने की तलाश में भटक जाती थीं। तुम रोज उस कोने वाली मेज पर बैठकर उपन्यास पढ़ा करती थीं और मैं तुम्हें छुपकर देखता था। एक दिन तुमने अपनी डायरी मेरे पास भूल दी, और उस डायरी ने हमारे बीच की खामोशी को हमेशा के लिए तोड़ दिया। आज हम दोनों साथ हैं, लेकिन जब भी किताबों के पन्ने पलटता हूँ, पहला दिन ताजा हो जाता है।
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रेलवे ट्रैक और तुम्हारी हँसी

स्टेशन का वह प्लेटफार्म हमेशा से भीड़भाड़ वाला था, लेकिन मेरे लिए वहाँ केवल एक ही आवाज़ गूँजती थी - तुम्हारी हँसी। ट्रेन आने में अभी एक घंटा बाकी था और हम दोनों प्लेटफॉर्म की आखिरी बेंच पर बैठकर भविष्य के सपने बुन रहे थे। तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में था और मुझे लग रहा था कि यह ट्रैक कभी खत्म न हो। आज जब भी इस स्टेशन से गुजरता हूँ, वह हँसी हवा में तैरती हुई मुझे आज भी थाम लेती है।
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नीले समुद्र की लहरों में छुपा प्यार

राघव हर साल उसी सुनसान तट पर आता था जहाँ उसने पहली बार मीरा को देखा था। लहरें आज भी वैसे ही रेत को छूकर लौट रही थीं जैसे कल की बात हो। मीरा अब इस शहर में नहीं थी, उसकी यादें ही इस हवा का हिस्सा बन चुकी थीं। अचानक उसे कंधे पर किसी के स्पर्श का अहसास हुआ। उसने मुड़कर देखा तो उसकी आँखें भर आईं। मीरा मुस्कुराते हुए उसके सामने खड़ी थी, वही पुराना विश्वास लिए हुए।
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कागज़ की नाव और सावन

सावन की पहली झड़ी लगते ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में पानी बहाने लगे। कबीर अपनी बालकनी में खड़ा होकर बस बारिश की बूंदों को देख रहा था, तभी नीचे से एक कागज़ की नाव तैरती हुई उसके घर के सामने आकर रुक गई। उस नाव पर एक छोटा सा संदेश लिखा था - क्या हम दोस्त बन सकते हैं? कबीर ने मुस्कुराते हुए उसी नाव पर जवाब लिखा और उसे पानी के तेज बहाव में आगे बढ़ा दिया। वह नाव किसी और की नहीं, बल्कि नीचे भीग रही मीरा की थी। उस बारिश ने दोनों को हमेशा के लिए एक ऐसा रिश्ता दे दिया, जो सावन की हर बूंद के साथ और अधिक गहरा होता चला गया।
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पुरानी घड़ी की टिक-टिक

दादी की विरासत में मिली वह बड़ी सी दीवार घड़ी अब टिक-टिक करना बंद कर चुकी थी। विक्रम उसे ठीक कराने के लिए शहर के सबसे पुराने घड़ीसाज के पास पहुंचा। वहां उसकी मुलाकात नैना से हुई, जो अपनी पुश्तैनी घड़ियों को ठीक करवाने आई थी। दोनों घंटों उस दुकान में पुरानी घड़ियों की आवाज़ सुनते रहे और वक्त के पहिये के साथ उनकी बातें भी आगे बढ़ने लगीं। घड़ीसाज ने जब कहा कि वक्त को वापस नहीं लाया जा सकता, तो विक्रम ने नैना की आँखों में देखते हुए कहा कि कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जो घड़ी की सुइयों को रोक देते हैं। उस दुकान की खामोशी में एक नया संगीत गूंज उठा था, जो ताउम्र उनके साथ रहने वाला था।
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गुलमोहर के लाल फूल

हर सुबह जब कॉलेज का रास्ता गुलमोहर के पेड़ों के नीचे से गुजरता था, तो जमीन लाल फूलों से पटी मिलती थी। अनिरुद्ध हमेशा इन फूलों को देखकर मुस्कुराता था, क्योंकि यही वह जगह थी जहाँ उसकी पहली नजर अनामिका पर पड़ी थी। अनामिका को प्रकृति से बहुत प्यार था और वह अक्सर इन गिरे हुए फूलों से कुछ न कुछ आकृति बनाती थी। एक दिन अनिरुद्ध ने हिम्मत करके एक सबसे सुंदर फूल उठाया और उसकी किताब के बीच रख दिया। उस छोटे से फूल ने बिना कुछ कहे वो सब कह दिया जो अनिरुद्ध कभी लबों से नहीं कह पाया था। आज भी वे दोनों हर साल उसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे मिलते हैं और अपनी यादों को ताजा करते हैं।
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अंधेरे कमरे में जलती मोमबत्ती

शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने और शांत इलाके में रोहन अकेला रहता था। उसकी जिंदगी एक ऐसी मोमबत्ती की तरह थी जो बिना हवा के भी कांपती रहती थी। एक शाम जब अचानक पूरे मोहल्ले की बिजली चली गई, तो उसने अपनी खिड़की पर एक छोटी सी मोमबत्ती जलाई। तभी पड़ोसी बालकनी से किसी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। वह सिमरन थी, जो हाल ही में उस मकान में शिफ्ट हुई थी। उस दिन बिना किसी बात के दोनों के बीच लंबी आँख मिचौली वाली बातें शुरू हो गईं। अंधेरे ने उनके दिल के दरवाजों पर दस्तक दे दी थी और मोमबत्ती की रोशनी ने उनके बीच की दूरियों को हमेशा के लिए मिटा दिया।
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दीवार पर टंगा अधूरा चित्र

चित्रकला की उस पुरानी कक्षा में रोहन और आद्या अक्सर साथ बैठते थे। रोहन को प्राकृतिक दृश्यों से प्यार था और आद्या पोर्ट्रेट्स बनाती थी। दोनों महीनों से एक कैनवास पर काम कर रहे थे लेकिन वह हमेशा अधूरा रह जाता क्योंकि दोनों में से कोई भी उस पर आखिरी ब्रश का स्ट्रोक नहीं लगाना चाहता था। उन्हें डर था कि चित्र पूरा होने का मतलब इस बहाने का खत्म होना होगा। एक दिन रोहन ने हिम्मत करके आद्या का चेहरा उस कैनवास के बीचों-बीच उकेर दिया और नीचे लिख दिया कि उसका सबसे खूबसूरत आर्त तो सामने ही बैठा है। आद्या ने मुस्कुराकर ब्रश उठाया और रोहन के हस्ताक्षर के पास अपना नाम भी जोड़ दिया। वह अधूरा चित्र अब उनकी पूरी जिंदगी का पहला पन्ना बन चुका था।
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कांच की खिड़की और बारिश की बूंदें

जब भी झमाझम बारिश होती, नयना अपनी खिड़की के पास बैठकर बाहर देखने लगती। सामने वाले घर की बालकनी में अक्सर कबीर अपनी गिटार के तारों को छेड़ता नजर आता था। दोनों के बीच कभी कोई सीधी बात नहीं हुई थी, बस खिड़कियों से होता हुआ एक खामोश संवाद था। एक दिन बारिश इतनी तेज थी कि बिजली चली गई और दोनों अपनी-अपनी बालकनी में आ गए। मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में कबीर ने गिटार पर वह धुन बजाई जो अक्सर वह नयना को देखते हुए गुनगुनाता था। नयना ने मुस्कुराते हुए अपनी खिड़की से ही एक फूल उसकी तरफ उछाल दिया। उस बारिश की रात ने दोनों के बीच की दूरी को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई।
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रेलवे ट्रैक के पास की चाय

छोटे से स्टेशन की उस छोटी सी टपरी पर मिलने वाली अदरक वाली चाय के स्वाद में कुछ तो खास बात थी, या शायद वह जादू कबीर और सिमरन की मुलाकातों का था। हर शाम ठीक पांच बजे ट्रेन गुजरने से पहले वे दोनों वहीं मिलते। कबीर अपनी डायरी में कुछ लिखता और सिमरन रेलवे ट्रैक के उस पार डूबते सूरज को देखती। एक दिन सिमरन ने बिना बताए जाने का फैसला किया क्योंकि उसका ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया था। आखिरी शाम उसने कबीर को चाय का कप देते हुए अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश की। कबीर ने उसका हाथ थामा और कहा कि दूरी चाहे जितनी हो, चाय की खुशबू उन्हें हमेशा जोड़े रखेगी। ट्रेन की सीटी बजी और दोनों की आंखें नम हो गईं, पर भरोसा मजबूत रहा।
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बरगद की छांव और पहला खत

बरगद के पुराने पेड़ के नीचे हर शाम आरव का इंतजार करना मीरा की आदत बन चुकी थी। वह हवा में उड़ते पत्तों को गिनती और सोचती कि क्या आज वह अपने दिल की बात कह पाएगा। पिछले तीन सालों से दोनों सिर्फ किताबों के आदान-प्रदान के बहाने मिलते थे, लेकिन खामोशियां बहुत कुछ कह जाती थीं। आज जब आरव आया, तो उसके हाथ में किताबों के साथ एक छोटा सा लिफाफा भी था। उसने वह लिफाफा मीरा की तरफ बढ़ाया और नजरें झुका लीं। मीरा ने कांपते हाथों से खत खोला, जिसमें बिना किसी प्रस्ताव के बस इतना लिखा था कि उसकी मौजूदगी ही आरव की दुनिया का सबसे खूबसूरत सच है। उस पल दोनों की आंखों में जो नमी थी, उसने सारे अधूरे शब्दों को पूरा कर दिया।
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