मद्धम रोशनी का दिया
दीवाली की जगमगाती शाम में पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ था, लेकिन तरुण के छोटे से मिट्टी के बर्तन की दुकान पर सन्नाटा पसरा था। इस बार उसकी बनाई गई दीये की कलाकृतियां बिक नहीं पाई थीं, जिससे उसका मन बहुत उदास था। वह अपनी अधूरी किस्मत को कोस रहा था कि तभी दुकान पर एक युवा लड़की ईशा आई। ईशा ने न सिर्फ तरुण के सारे दीये खरीद लिए, बल्कि उसकी कला की दिल खोलकर तारीफ भी की। तरुण की आँखों में चमक लौट आई और उसने ईशा को धन्यवाद देने के लिए एक विशेष दीया उपहार में दिया। अगले साल उसी दीवाली पर ईशा फिर से उस दुकान पर आई, लेकिन इस बार वह अकेلی नहीं थी, बल्कि तरुण के जीवन की हमसफर बनकर आई थी। दोनों ने मिलकर उस छोटी सी दुकान को एक बड़े हस्तशिल्प केंद्र में बदल दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि सच्चे प्यार का दिया जब एक बार जल जाए, तो उसकी रोशनी कभी फीकी नहीं पड़ती और हर अंधेरे को आसानी से हरा सकती है।
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