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हाल की खोजें: मंज़िल
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कागज का हवाई जहाज

बचपन के दिनों में रोहन और सोहन पन्ने फाड़कर खूबसूरत कागज के हवाई जहाज बनाते थे और उन्हें छत से आसमान की तरफ उड़ाते थे। दोनों ने मिलकर यह सपना देखा था कि वे बड़े होकर एक दिन सचमुच के विमान के पायलट बनेंगे। वक्त का पहिया घूमा और रोहन एक व्यस्त कॉर्पोरेट दफ्तर में कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने उलझ कर रह गया, जबकि सोहन का सपना अधूरा ही छूट गया। एक दिन सफाई करते समय रोहन के हाथ धूल से सना हुआ वही पुराना कागज का जहाज लगा, जिसे उन्होंने बचपन में साथ मिलकर बनाया था। उस कागज के टुकड़े को देखते ही रोहन को अपनी असली मंजिल और बचपन का वो बेफिक्र उत्साह याद आ गया। उसने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और अपने सपनों को नई उड़ान देने के लिए विमानन क्षेत्र की ओर कदम बढ़ा दिए।

पुरानी मीनार की ऊपरी मंजिल

शहर के बीचों-बीच बनी वह ऐतिहासिक मीनार पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र थी, लेकिन उसकी सबसे ऊपरी मंजिल पर जाने की सख्त मनाही थी। इतिहास के छात्र राहुल को इस प्रतिबंध के पीछे का राज़ जानना था। वह चुपचाप रात के समय मीनार के अंदर घुस गया और सीढ़ियां चढ़ने लगा। ऊपर पहुंचते ही उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे हवा का तापमान बहुत कम हो गया हो। उसने अपनी टॉर्च जलाई और सामने देखा कि एक परछाई दीवार पर लिख रही थी। जब उसने पास जाकर देखा, तो वह शब्द उसकी अपनी ही मौत की तारीख थी। तभी पीछे से दरवाजे के भारी ताले के बंद होने की आवाज गूंजी और मीनार की घड़ी ने रात के ठीक बारह बजा दिए।

दूसरी मंजिल की खाली खिड़की

रोहित अपने परिवार के साथ एक नए किराए के मकान में रहने आया था। मकान का किराया बहुत कम था क्योंकि उसके बारे में मोहल्ले में कई तरह की बातें मशहूर थीं। घर की दूसरी मंजिल पर एक खिड़की थी जिस पर हमेशा काले रंग का पर्दा पड़ा रहता था। रोहित के लाख मना करने के बावजूद उसके छोटे बेटे ने एक दिन जिज्ञासावश वह पर्दा हटा दिया। उस पल के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रात को उस खिड़की के शीशे पर बाहर से किसी के नाखून खुरचने की आवाजें आने लगीं और घर के सभी नल अपने आप खुलने लगे। जब उन्होंने मकान मालिक से पूछा, तो पता चला कि उस खिड़की के सामने खड़े होकर किसी ने आत्महत्या की थी और उसकी रूह आज भी वहीं भटकती है।

खिड़की पर दस्तक देती उंगलियां

चौथी मंजिल के फ्लैट में रहने वाली निकिता अक्सर रात को खिड़की के बाहर किसी के होने का अहसास करती थी। उसका फ्लैट सड़क से बहुत ऊपर था, इसलिए वहां किसी इंसान का पहुंचना नामुमकिन था। एक तूफानी रात को जब बिजली गुल हो चुकी थी, तब खिड़की के कांच पर किसी ने हल्के से नाखून से खरोंचना शुरू किया। निकिता ने डरते हुए टॉर्च जलाई और खिड़की की तरफ देखा। कांच के उस पार एक औरत लटकी हुई थी जिसके बाल बिखरे हुए थे और वह अजीब सी मुस्कान के साथ उसे घूर रही थी। उस औरत ने अचानक खिड़की का कांच जोर से पीटना शुरू कर दिया ताकि वह अंदर आ सके। निकिता चीख पड़ी और अपनी चाची के कमरे की तरफ भागी। अगली सुबह जब खिड़की खोली गई, तो वहां कांच पर ताजे खून के निशान बने हुए थे और कोई नहीं था।

सफर की रोशनी

पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर सफर करते हुए नयन की गाड़ी अचानक एक सुनसान मोड़ पर खराब हो गई। रात घनी हो रही थी और चारों तरफ कोहरा छाया हुआ था, तभी एक छोटी सी कुटिया से डिबिया की रोशनी आती दिखाई दी। वहां तारा रहती थी जिसने बिना किसी झिझक के नयन को आश्रय दिया और खाने के लिए गरमा-गरम भोजन परोसा। उस रात दोनों ने पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर लंबी बातें कीं। सुबह जब धूप खिली, तो नयन को महसूस हुआ कि उसकी मंज़िल अब वह रास्ता नहीं बल्कि यह छोटी सी कुटिया और तारा का साथ बन चुकी है।

अधूरा सफर

मंजिल भी करीब थी और हम भी साथ थे, फिर ना जाने क्यों ये फासले बन गए। जो कभी हमारी दुनिया हुआ करते थे, आज वही अजनबी रास्ते बन गए।